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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

वक़्त सिर्फ आज और अभी है।


रेत कितनी भी कसलो, 

हाथ कुछ नहीं रहता। 

सच केवल आज है,कल का सच, 

सच नहीं रहता।       

आज मिल लो, कुछ कह लो, 

कुछ सुन लो,   

जो गुजर गया पल,

वो फिर वही नहीं रहता।  

कभी तो मिलेंगे हम,

ये हो तो सकता है,

पर फिर जो पल आज है,

वो कल नहीं रहता। 

आइना सच कहता होगा,  

कहता रहे,

मेरा आज वाला चेहरा,

कभी कल नहीं रहता।

तुम कभी मिलोगे,

तो बतियांगे उस कभी में,

मेरे पास आज ही रहता है,

मेरे पास वो "कभी", नहीं रहता। 

मुहब्बत है तुमसे बेपनाह,

अभी बता दे रहा हूँ।         

आज ही वक़्त है 'अक्स' मेरे पास,

कल के लिए कभी,

मेरे पास कभी वक़्त नहीं रहता।

        -अतुल सती 'अक्स   


  


    


सोमवार, 15 जनवरी 2018

महीने के मुश्किल दिन

तुम कह रहे थे कल हँसते हुए,
मेरा मजाक उड़ाते हुए,
कि लो फिर से आ गये तुम्हारे,
महीने के मुश्किल दिन।

तुम भी तो कमाल हो,
अजीब सी खवाहिश रखते हो,
तुम चाहते हो कि वो आते भी रहे,
सोचो,
गर एक दिन कहीं वो आने बंद हुए तो....
तो,
तुम्हारी साँस अटक जाएगी,
एक पन्ने की माफिक,
तुम्हारी,
कान की झिल्ली फट जाएगी,
जो मैं कह दूँ किसी सुबह,
के कुछ दिनों से आये नहीं हैं,
महीने के मुश्किल दिन।
तुम भी तो कमाल हो,
न आएं वो दिन तो डर जाते हो,
और गर आजाएं तो,
तुम रूठ जाते हो,
तनतनाते हुए ताने पर ताने मारते हो,
पांच-छह दिनों को सालों सा जताते हो,
मन ही मन कोसते हो और पूछते हो,
आखिर कब जायेंगें ये तुम्हारे,
महीने के मुश्किल दिन।
तुम खैर समझोगे नहीं शायद,
कि,
वाक़ई में बहुत मुश्किल होते हैं,
महीने के मुश्किल दिन।

सिर्फ इसीलिए नहीं कि मैं,
रिसती हूँ रक्त लगातार,
बल्कि इसलिए मुश्किल हैं,
क्योंकि उन दिनों झेलना पड़ता है,
एक नया जंजीरों से बंधा जीवन,
झेलना होता है परायापन हर अपने से,
अपने ही घर में अछूत हो जाती हूँ मैं,
बिलकुल ही मनहूस हो जाती हूँ मैं,
तुम्हारे मानसिक अपंगता से,
मैं अपाहिज सी हो जाती हूँ,
कमजोर कहते हो न तुम मुझको,
इतना रक्त तुम बहा कर तो देखो
बस एक दिन,
एक बार,
लगातार,
मेरी ही तरह,
बंदिशों में मरते मरते,
जी कर तो देखो,
देखो तो सही,
कैसे जीती हूँ मैं,
महीने के मुश्किल दिन।
-अक्स
     

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ओह मी ! या मैं ! हे मैं ! और निओ एंडरसन

एक दिन गॉड, अल्लाह और ईश्वर में ही जंग छिड़ गयी कि उनके अनुयायी, उनकी असली पहचान को आगे बढ़ा रहे हैं, और वो ये साबित कर सकते हैं, क्यूंकि उनके न्यूज़ चैनल में बताया जाता है कि उनके फॉलोवर एकदम सही काम कर रहे हैं और महामहिम सर्वोच्च ताकत के प्रतिनिधि के रूप में गॉड, अल्लाह और ईश्वर बहुत ही सही धर्म चला रहे हैं। (वो न्यूज़ चैनल और पत्रकार निष्पक्ष होते हैं ठीक हमारे न्यूज़ चैनल और पत्रकारों के ही तरह)

सबके सब अपनी अपनी दलीलें दे रहे थे, अपने अपने शिक्षाओं का बढ़ा चढ़ा कर गुणगान कर रहे थे लेकिन गौर से सुना तो पाया कि वो सब एक ही बात बोल रहे थे। और फिर उन्होंने पाया कि असल में वो कुछ बोल ही  नहीं रहे थे और न ही उन्होंने कभी कुछ बोला, न किसी से मिले कभी और न ही कभी कोई धर्म नाम की चीज़ का आविष्कार किया। वो सब के सब न्यूज़ चैनल वालों की बातों में आ गये थे। 

अब वो तीनों नीचे आये इस धरती पर और अपने अपने अनुयायों को पहली बार दर्शन दिए, बात करी और सो कॉल्ड रिलिजन या धर्म या सम्रदाय के करता-धर्ताओं को सुना और समझा। तीनों ने सिर्फ एक बात बोली अपने अनुयायों को कि "ये सब तो गलत है, ऐसा न तो मैंने कभी कहा न ही ऐसा मैं दिखता हूँ और न ही मैं तुम्हारे पापों से कोई सरोकार रखता हूँ न पुण्यों से। तुम जो भी कर रहे हो वो झूठ और फरेब से लबरेज़ है।" 
इतना सुनते ही सो कॉल्ड अनुयायी अपनी अपनी सोर्डस, शमशीरें और तलवारें ले कर उनके पीछे भागे मारने को और बोले  "हमको गलत बोलता है, हमको गॉड प्रॉमिस, अल्लाह हु अकबर, ईश्वर की शपथ है तुमको जिन्दा नहीं छोड़ेंगे !!!"          
पसीने से नहा गए तीनों और तब  भागते हुए इस धरा से गॉड बोले " ओह मी !!!"  अल्लाह बोले  " या मैं !!!" और ईश्वर बोले "हे मैं !!! 
ये इंसानों ने किसे भगवान बनाया है? किसे धर्म की संज्ञा दी है? कौन हैं ये?"
 
और ये कहते हुए तीनों एक जगह रुके और गौर से देखा कि वहां तीन शीशे थे और तीनों शीशों में तीन अक्स दिख रहे थे पर वास्तव में वहां कोई नहीं नहीं था। असल में वो एक मैट्रिक्स में फंसे हुए थे जहाँ उन्हें लगता था कि वो हैं, एक्सिस्ट करते हैं फिजिकली, जबकि उस मैट्रिक्स को इन्सानी दिमाग चला रहा था। और ये तीनों कोई निओ तो थे नहीं कि मैट्रिक्स को तोड़ देते। निओ याद है न?  "निओ एंडरसन" ?
                                      - अतुल सती 'अक्स'                          

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

नकलाकार कलाकार मेंढक

एक कहानी सुनाता हूँ बल जरा टक्क लगेकी सुनना वा। 

भोत पुरानी बथ है एक कुआँ था।  वहाँ पर बहुत ही सुन्दर सुन्दर मेंढक रहते थे और उस ज़माने में उनकी जबान "टर्र-टर्र" नहीं थी। उस टाइम पर वो मधुर सुमधुर आवाज़ के धनी थे। एक से एक टैलेंटेड थे।   
वो एकदम मस्त मौला थे और उसी कुएं से दिखने वाली रौशनी को आकाश समझते थे। उनकी सुबह और शाम मतलब दिन बहुत ही छोटे थे रात लम्बी थी बहुत। उन्हें तो ये भी नहीं पता था कि उस कुएँ के बाहर भी कोई दुनिया है, स्वछंद प्रकृति का एहसास है। वहां रहा भी जा सकता है और जिया भी जा सकता है।

अब कुछ बहुत ही सुरीले मेंढकों ने बहुत ही सूंदर तान लगाई।  अपनी मेहनत और साधना से वो उस कुँए से अलग अलग तरीकों से, साधनाओं से, किन्तु अपने खुद के प्रयासों से बाहर निकल गए। उस कुएँ से बाहर निकलने में उनकी अथक मेहनत थी। 
कुछ मेंढक दिन दोपहरी में निकल पाए पर एक मेंढक जिसकी आवाज़  बहुत सुरीली थी और जो सबसे ज्यादा चर्चित और यशश्वी था उसने जाते हुए एक राग आलापा। वो राग उसका खुद का बनाया हुआ था और वो था "टर्र टर्र" राग।

जिस वक़्त वो मेंढक निकल रहा था कुँए से ठीक उसी वक़्त पूनम का चाँद आसमान में उस कुएँ के ऊपर छाया हुआ था। टर्र टर्र अलाप करता हुआ जब वो मेंढक बाहर निकला जिसके चारों ओर धवल चाँद था और जिससे कुएं के तल से देखने पर वो घटना दैवीय सी लग रही थी। वो अकेला मेंढक था जो रात को बाहर निकल पाया। 

ये कहानी कथा का बाद क्या हुए वैते सुना अब।   

वैका बाद कुएँ के तली पर रहने वाले मेंढकों को जाने क्या हुआ बल सभी केवल "टर्र टर्र" राग का अलाप करते रहे और उस पहले मेंढक को कॉपी या कहिये उसके गीतों को कवर करने लगे। अपने राग अपने गानों की जगह बस "टर्र टर्र"  शॉर्टकट।   
अफ़सोस वो मेंढक बहुत से राग गा सकते थे अलग अलग और बहुत ही सुन्दर गीतों को रच सकते थे पर अफ़सोस आज भी वो मेंढक उसी कुएँ में हैं  बस अलग अलग तरीकों से "टर्र टर्र" करते हैं सब के सब।  जिसकी वजह से वो पहला "टर्र टर्र" गीत जो सुरीला था आज बस एक शोर बन कर रह गया है।  जब उन मेंढकों को बोला गया बल कुछ अफरु भी गाओ कब तक दूसरों के गानों को गाओगे? दुसरे की मेहनत को अपना बनाओगे? तो जानते हो उन मेंढकों ने टर्र टर्राते हुए क्या कहा?

"भैजी इसे बल टर्र-टर्र-टर्रवर कहते हैं, टर्र-टर्र-टर्रम्प्रोवाईजेशन कहते हैं इसे। हम बल फुन्दिआ मेंढक हैं आजकल की जनरेशन। तुम्हारा बल मैशप-टर्रशप करदेंगे। "

अब बोलो बल नक़ल नक़ल मार कर नकलाकार हैं ये और कलाकार कहते हैं खुद को बल। कण लगी बल ये कहानी बताना जरा।                                   
                          - अतुल सती 'अक्स'

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

अभी भी

सुन !!!
सुन ना !!!
बहुत वक़्त हुआ,
बहुत वक़्त से चाहा कि कहूँ,
कि  
बहुत सोचता हूँ मैं,
बहुत लिखता भी हूँ,
पर,
तमाम बातें सोचने पर भी,
      
आख़िरी एक ख़्याल है,  
अभी भी तू मेरे ख्यालों में। 

आज भी,
सच में,
दर-ब-दर भटकता हूँ,
अपने सवालों को लिए,
 पर,
तमाम जवाब सुनकर भी,

         
आखिरी जवाब है,
अभी भी तू मेरे सवालों में। 


बहुत,
बहुत खोजता हूँ तुझे,
तेरी खुशबू को,
लड़ता हूँ हवाओं से,
के क्यों???
लेकर नहीं आती खुशबू तेरी,


आखिरी महक-ए-इश्क़ है,
अभी भी तू मेरे रूमालों में।     
 
 @https://www.facebook.com/AtulSati.aks/

सोमवार, 27 नवंबर 2017

एक कहानी इंसानियत और धरती की

मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।


मैं कैसे तुमको प्यार करूँ?

कैसे मैं तुम्हारा दुलार करूँ?

अश्कों सी मायूस राख हूँ  मैं ,

कोई आग न अब मेरे अंदर है।


मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।


बीज जो मुझ में रोपा गया,

वो रूठ गया, वो सूख गया,

बस एक खाली गुब्बार हूँ  मैं,

कोई आब न अब मेरे अंदर है।


मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।

        -अक्स 


http://atulsati.blogspot.com/2017/11/blog-post_27.html


शनिवार, 18 नवंबर 2017

मि अर सट्टी

मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
जब भी जीणो मन करि,
जब भी मस्ती मा रेणौ मन करि,
त पैली बवल्दु छौ कि
बाद मा जीला, हँसला, खेलला, नचला, गाला,
अभी उम्र नि च,
फेर अब जब सब मिली त,
बोलदू छौं कि
अब उम्र नि रै,
त यन च दाज्यो भुल्ला, भुल्ली बैणी, बोड़ा बोड़ी, काका काकी,
जू भी यु वक़्त मिलणु च,
जी लिया जी भर की,
अभी उम्र नि, भोल उम्र नि राळी,
ये वास्ता जी लिया फटाफट।
निथर एक दिन तुम भी बोलला अक्सा जन,
बल,
मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
   - अतुल सती अक्स

सोमवार, 13 नवंबर 2017

प्रद्युम्न केस और दबाव!!!

प्रद्युम्न केस में जिस १६ साल के लड़के को आरोपी बनाया जा रहा है और जो कारण निकल के सामने आ रहे हैं वो चिंताजनक हैं। सिर्फ स्कूल के एग्जाम और पैरेंट टीचर मीटिंग कैंसिल करवाने के लिए किसी की हत्या करने जैसा ख्याल से ज्यादा चिंताजनक उसके पीछे के कारण हैं।

हो सकता है कि ये सिर्फ एक मिथ्या कथा हो, या फिर उस बालक की कोई व्यक्तिगत समस्या ही हो लेकिन ये बात एक चिंताजनक समस्या की ओर इशारा तो करती ही है। 
और वो है,
दबाव!!!    
कितना ज्यादा दबाव है आजकल के स्कूल में,समाज में। स्टेटस, एजुकेशन, मार्क्स, रेपुटेशन, आगे निकलने की होड़, पीछे रह जाने का डर, बचपन का ख़तम हो जाना ये ही सब तो जिम्मेदार हैं इस दबाव के पीछे।
खुद निकम्मे रहे मातापिता को बच्चा चाहिए आइंस्टीन और साथ में अमिताभ और सचिन का मिश्रण। जब गाये तो सोनू शान किशोर रफ़ी लता आशा, जब नाचे तो ऋतिक, खाना पकाये तो संजीव कपूर सब कुछ एक ही में हो। 
आल इन वन। 
आजकल छोटे छोटे बच्चे डिप्रेशन में हैं, आप देखते ही होंगे वो कहते हैं कि वो बोर हो रहे हैं, 
अखबार उठा कर पढ़िए कितने ही केस हैं जहाँ रेप कर रहे हैं नाबालिग, नशा करना उनकी जीवन शैली है,  
लेकिन हमें क्या? बच्चा खराब तो स्कूल जिम्मेदार, समाज जिम्मेदार हम थोड़े न?

क्यों?
             
हमारी दीमक लगी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ढाँचा जहाँ सिर्फ अकैडमिक्स में ध्यान दिया जाता है और उसमे भी केवल फर्स्ट आना है, बाकी के लिए कोई जगह नहीं, 
वहां, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का कोई स्थान नहीं वहाँ ये ही तो होगा। 

हमारे शुक्राणु जो अपने ही जैसे करोड़ों,अरबों शुक्राणुओं से आगे रेस जीते उन्हें और जीते हुए अन्य शुक्रणओं से भी आगे दौड़ना ही होगा। जो हम कभी न कर पाए उसे वो करना ही होगा, उसे दबना ही होगा इस प्रेशर में। नहीं तो वो चार लोग क्या कहेँगे?
हमें एक ऐसा पेड़ चाहिए जिसमें हर तरह के फल लगें और हमें उसका ख़याल भी न रखना पड़े। आप देखिये अपने आसपास के बच्चों को, अपने बच्चों को, कितने चिड़चिड़े हैं? 
उनको भी समझ में आता है कि केवल और केवल फर्स्ट आना है, अगर कुछ ऊँच नीच हुई तो उसके माँ बाप को शर्मिंदा होना पड़ेगा।  लोग उसे एज अ प्रोडक्ट फेल कर देंगे, रिजेक्ट कर देंगे, और तब न जाने वो या तो खुद को या फिर किसी और की हत्या करे एक और पैरेंट टीचर मीटिंग कैंसिल करवाने को, स्कूल बंद करवाने को।             
और अगर ऐसा हुआ तब अभी एक प्रद्युम्न की बलि हुई है आगे न जाने कितने और होंगे।         

ब्लॉग: https://atulsati.blogspot.in/2017/11/blog-post_13.html       

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

तुम्हे तो पता ही था सब

तुम्हे तो पता ही है सब,    
ये सुनहरा धागा मेरा बुना है,   
सुन्दर लगता है न?
मेरा ये रेशमी धागा?
पर, 
असल में,
मैं उलझा हूँ अपने ही ख्यालों में,
उलझता उलझाता, सुलझता सुलझाता,   
और,
खुद को हमेशा ही पाता हूँ जकड़ा हुआ,
अपने ही महीन रेशमी धागे से,
तुम्हे तो पता ही है सब।    

मैं नहीं तोड़ पा रहा हूँ इस बँधन को,
फँसा हूँ पर जीने को साँस भी तो लेनी है।  
और यहाँ,
हर आती जाती साँसों के स्पंदन से,
निकल रहा है ये रेशमी बँधन मुझसे,
लेकिन, 
मुठ्ठी भर ही साँसों का पिटारा है मेरे हिस्से में, 
तुम्हे तो पता ही है सब।    

साँसे मेरी हिस्से की जितनी भी मैं खर्च करता हूँ,
उतना ही इस धागे को बुनता हूँ,    
तुम्हे जो पसंद है मेरा ये धागा बुनना, 
तुम भी जानते हो और मुझे भी पता है,
ये धागा मेरे काम का नहीं,
ये तुम्हारे लिए है कीमती,
मेरा तो ये एक बंधन है मेरे गले में,
मेरी ख़त्म होती साँसों की परिणीति,
मेरे साँसों की चिता की ठंडी बुझी हुई राख,
तुम्हे तो पता ही है सब।    
     
मुझे तुमने ही तो सिखाया था रेशम बुनना,
मुझे भी कहाँ पता था कि ये शौक जानलेवा होगा,
अब दम घुट रहा है तो बता रहा हूँ मैं,
शायद कल बता भी न पाऊँ,
मेरी साँसे मेरे जीने  के लिए कहाँ थीं,
बल्कि ये तो मेरी मौत तक,
तुम्हारे लिए बस रेशम बुनने तक थीं,
मुझे  पता है,
मेरे मरने पर तुम इसे हमारा प्रेम कहोगे,
हमारा समर्पण कहोगे, 
कहोगे के, आखिरी साँस तक तुम्हारे लिए रेशम बुना मैंने,
पर,
मुझे पसंद नहीं था कभी भी रेशम बुनना,
मैं तो बस देखना चाहता था शहतूत के फूलों को,
कलिओं को, पत्तों को, शाखों को, फलों को, 
शहतूत  ही नहीं बल्कि हर घास, हर पौधे, सूखे हुए दरख्तों को,  
महसूस करना चाहता था हवा को, पानी को, तुमको, प्रेम को,
मैं तो बस जीना चाहता था, सिर्फ जीना,
अपने हिस्से की साँसों से कुछ पल का जीवन चाहता था,
खैर !!!
तुम जानते थे सब,सब कुछ,
मैंने कहा था तुमसे,
मुझे जाने दो, जीने दो,  
तुम्हारा  वादा था मुझसे कि  मुझे जाने दोगे,जीने दोगे,
मैं भी जानता हूँ तुमने क्या किया,
तुम्हे तो पता ही है सब,
कि,
तुम्हे तो पता ही था सब। 
                 - अक्स