इस ब्लॉग में शामिल हैं मेरे यानी कि अतुल सती अक्स द्वारा रचित कवितायेँ, कहानियाँ, संस्मरण, विचार, चर्चा इत्यादि। जो भी कुछ मैं महसूस करता हूँ विभिन्न घटनाओं द्वारा, जो भी अनुभूती हैं उन्हें उकेरने का प्रयास करता हूँ। उत्तराखंड से होने की वजह से उत्तराखंडी भाषा खास तौर पर गढ़वाली भाषा का भी प्रयोग करता हूँ अपने इस ब्लॉग में। आप भी आन्नद लीजिये अक्स की बातें... का।
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बुधवार, 25 मई 2022
पहाड़
गुरुवार, 11 जून 2020
माया
मेरा गौला भिटै क़ी, वू कैकी खुद मिटौणि छै?
देखिकी मैते मन ही मन, वू कैते धै लगौणि छै?
नौ त नि च् मेरु लिख्युं, कॉपी का कै भि पन्ना मा,
क्य अजब कथा च् तू, या क्य गज़ब कथाकार छै,
- अक्स
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019
गढ़ कुमौं
बुधवार, 7 फ़रवरी 2018
मने बथ:(मन की बात) केदार पीड़िता
शनिवार, 18 नवंबर 2017
मि अर सट्टी
मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
जब भी जीणो मन करि,
जब भी मस्ती मा रेणौ मन करि,
त पैली बवल्दु छौ कि
बाद मा जीला, हँसला, खेलला, नचला, गाला,
अभी उम्र नि च,
फेर अब जब सब मिली त,
बोलदू छौं कि
अब उम्र नि रै,
त यन च दाज्यो भुल्ला, भुल्ली बैणी, बोड़ा बोड़ी, काका काकी,
जू भी यु वक़्त मिलणु च,
जी लिया जी भर की,
अभी उम्र नि, भोल उम्र नि राळी,
ये वास्ता जी लिया फटाफट।
निथर एक दिन तुम भी बोलला अक्सा जन,
बल,
मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
- अतुल सती अक्स
मंगलवार, 20 जून 2017
खुद
यन त रजै भी च अर कम्बलु भी च मेरा काख पर,
पर माँ तेरी खुखली की निवति ते,
यन त पिताजि यख सब्बि साधन छन,
पर पिताजि जू सुख घुघूति बसूदी मा छे, घुघ्घी मा छे,
अब मि नि करलू जिद्द घुघूति बसूदी की,
रैण द्या मैंते अपरा काख मा तुम,
तुम तै भि त खुद लगदि ह्वालि म्यारि,
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
अक्स कु एक सवाल
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
किले नि होन्दु?
शुक्रवार, 9 सितंबर 2016
लोग
सोमवार, 5 सितंबर 2016
माँ हे माँ मेरी !!!
माँ हे, माँ मेरी !!!
सोमवार, 1 अगस्त 2016
मैं अर मेरू जोगी
हे माँ !!!
अब मैते जाण दे,
मैते मेरू जोगी बुलौणू च।
वू बैठयूँ च भस्म लगे की,
अपरी मस्त धूनी रमैं की,
मिन भी अब भस्म लगे ली माँ,
मिन भी अब धूनी रमें ली माँ,
अब मी उड़न लग्यूँ च,
ये आसमान मा,
हे माँ मेरी!!!
मिन अब अफ्फू ते पै ली,
मैते मेरु 'अक्स' दिखेगी,
जाण दे हे माँ मैते अब,
हे माँ अब मैते जाण दे,
मैते मेरू जोगी बुलौणू च।
अब मैते जाण दे,
मिन अब अफ्फू ते पै ली,
-अतुल सती '#अक्स'
मंगलवार, 7 जून 2016
पलायन का घड़ियाली आँसू
मंगलवार, 22 मार्च 2016
एक छौ घोड़ा !!! - - अतुल सती 'अक्स'
डालिली एक घात अब त पूजन पड़लु हँकार !!!




