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बुधवार, 25 मई 2022

पहाड़


यू जू गंगा औंदी च तोळ, 
लौन्दी च माँ कू रैबार, 
ऎजा ऎजा बोढ़ी की घोर,
सूणू पड़यूँ घोर बार 

यू जू गंगा औंदी च तोळ, 
लौन्दी च माँ कू रैबार! 
 
गौं अपरू छोड़ी, 
उंदरिओं ते दौड़ी, 
काटिलिन मिन अपरा जौड़
ना मी पहाड़ी ना  मी च देशी 
खुएदिन मिन अपरी पछाण 

पहाड़ !!! पहाड़ !!! पहाड़ !!! पहाड़ !!!
मेरु प्यारु पहाड़ !!!  - २ 

हे मेरा लाटा!!!
गौ का यु बाटा,
यू उकाल उन्धार। 
सिखौंदा छाँ हमते,
बिंगोंदा छाँ हमते,
जीवन कु सरु सार!!!

पहाड़ !!! पहाड़ !!! पहाड़ !!! पहाड़ !!!
मेरु प्यारु पहाड़ !!!  -२  

   -अतुल सती 'अक्स'




गुरुवार, 11 जून 2020

माया


मेरा गौला भिटै क़ी, वू कैकी खुद मिटौणि छै?
देखिकी मैते मन ही मन, वू कैते धै लगौणि छै?

नौ त नि च् मेरु लिख्युं, कॉपी का कै भि पन्ना मा,
फिर वू कैकू नौ लिखिकी, रोज रोज मिटौणि छै?

कै देबता तै नि मनै वैन,जैजैकी दैवतों का थान मा,
कु रूठी होलु वैसे, वु कै कैते कण कै मनौणि छै?
 
देखिकी मैते कभिकभि, सब धणी बिसरे देंदी च् वू,
कु हर्ची होलु वैसे यन, वू मैं मा कैते खोजोणि छै।

मि भी वेकी माया मा, बस वेते ही देखदु रैन्दु छौं,
स्वीणों मा एकि वू, कण स्वाणा गीत मिसौणि छै।

क्य अजब कथा च् तू, या क्य गज़ब कथाकार छै,
हे माया! मैते क्या क्या, अर तू वैते क्या बिंगौणि छै?
                                 - अक्स

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

गढ़ कुमौं

कथा ऊँची, कथ्गा मोटी,
गढ़ कुमौं की बाड़ खड़ी। 
हिटा दाज्यू, हिटा बैणी,
काटा ये बाड़, लावा दंतुलि।            

जिया मेरी, हे ईजा मेरी, या भूमी मेरा पहाड़े की।
जब एक ही माँ च हमारी त,लड़ै बोला कै बाते की?
उत्तराखंड की बात करला,करला बात पहाड़े की।
छोड़िकि बथ ब्याळी की अब बथ लगौला आजे की। 

झुमैलो एकी, एकी झौड़,
एक ही थाल, एकी  डौंर,
हूड़कु एकी, मुरुली एकी,
बद्रीकेदार नंदा भी एकी। 
बौण एकी , एकी हिमाल,
एकी गंगा, जमुना एकी,
घुघुति एकी, एकी मोनाल
सुख भी एकी, दुःख भी एकी। 
ढोल दमौ बाजा एकी,
बालमिठै सिंगोरी एकी,
नथ गुलबंद बुलाक एकी 
उत्तरैणी मकरैनि एकी। 
होली हुल्यार बग्वाल एकी,
बाँझ बुराँस काफल एकी। 

पानी पलायन पहाड़ एकी,
रोजगारे की दौड़ भी एकी।   
पहाड़े राजधानी पहाड़ी नेति,
पीड़ा एकी जौड़ भी एकी 
पीड़ा एकी जौड़ भी एकी 
पीड़ा एकी जौड़ भी एकी 
पीड़ा एकी जौड़ भी एकी ...

  -  अतुल सती 'अक्स'  



बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

मने बथ:(मन की बात) केदार पीड़िता



ये जीवना आग मा,
क्या लिख्युं च भाग मा। 
मिन नी जाणी !!!
तुमुन नी जाणी !!! 


मुठ्ठी बोटी की राखी मिन।  
राँकू सी जिकुड़ी राखी मिन। 
आँसू मिन नी बगण देयी…
हिम्मत बांधी राखी मिन।   
साथ नी छौ हमरु भाग मा।  
मिन नी जाणी !!!
तुमुन नी जाणी !!!



अफुते,तुम बणे की राखी मिन। 
बच्चों ते कमी नी राखी मिन।     
पाड़ दुखो कू त टूटी हमपर,
पर अफु ते,अटूट राखी मिन।
माँ ही रैली बच्चों का भाग मा,
मिन नी जाणी !!!
तुमुन नी जाणी !!!





यू दिन कणके गुजारी मिन।  
मन ही मन मां रुएकि मिन।  
मजबूत बणी की रयुं सदनि, 
अफु ही अफु ते संभाली मिन। 
यन अनोणी हुएजाली केदार मा,  
मिन नी जाणी !!!
तुमुन नी जाणी !!!



(हिंदी अनुवाद )

(इस जीवन की आग में,
लिखा क्या है भाग्य में,
मैंने नहीं जाना,
तुमने नहीं जाना।  )   


(मुठ्ठी बंद रखी मैंने,
सुलगते अँगारों सा दिल रखा मैंने,
आँसू मैंने बहने नहीं दिए,
हिम्मत बाँध के रखी मैंने। 
साथ नहीं था हमारे भाग्य में,
मैंने नहीं जाना,
तुमने नहीं जाना।  )   
      

(अपनेआप को तुम बन लिया मैंने,
बच्चों को कोई कमी नहीं की मैंने,
पहाड़ दुखों का तो टूटा है हम पर,
पर खुद को अटूट रखा मैंने,
माँ ही रहेगी बच्चों के भाग्य में,      
मैंने नहीं जाना,
तुमने नहीं जाना। )    

 (ये दिन कैसे गुजारे मैंने,
मन ही मन में रोके मैंने,
मजबूत बन के रही सदा ही,
खुद ही खुद को सम्भाला मैंने,
ऐसी अनहोनी हो जाएगी केदार में,           
मैंने नहीं जाना,
तुमने नहीं जाना।  )   

           -अतुल'अक्स'

शनिवार, 18 नवंबर 2017

मि अर सट्टी

मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
जब भी जीणो मन करि,
जब भी मस्ती मा रेणौ मन करि,
त पैली बवल्दु छौ कि
बाद मा जीला, हँसला, खेलला, नचला, गाला,
अभी उम्र नि च,
फेर अब जब सब मिली त,
बोलदू छौं कि
अब उम्र नि रै,
त यन च दाज्यो भुल्ला, भुल्ली बैणी, बोड़ा बोड़ी, काका काकी,
जू भी यु वक़्त मिलणु च,
जी लिया जी भर की,
अभी उम्र नि, भोल उम्र नि राळी,
ये वास्ता जी लिया फटाफट।
निथर एक दिन तुम भी बोलला अक्सा जन,
बल,
मि सट्टी जन पड्युं ही रे गी उर्खुली मा,
कुटदू देखदू रे अफ्फु ते,
वक़्ता का मुसलोंन सटा सट।
   - अतुल सती अक्स

मंगलवार, 20 जून 2017

खुद


यख बिजाम जड्डु च माँ,
यन त रजै भी च अर कम्बलु भी च मेरा काख पर,
पर माँ तेरी खुखली की निवति ते,
मि आज भी खौजणु छौं।
यन त पिताजि यख सब्बि साधन छन,
सुख सुबिधा मनोरंजना का,
पर पिताजि जू सुख घुघूति बसूदी मा छे, घुघ्घी मा छे,
मि आज भी वैते खौजणु छौं। 
अब मि नि करलू जिद्द घुघूति बसूदी की, 
नि करलू जिद्द खुखलि की,
रैण द्या मैंते अपरा काख मा तुम, 
थौक गयुँ मि यख यखुलि यखुलि रैकि।
तुम तै भि त खुद लगदि ह्वालि म्यारि, 
त क्या पै बोला हमुन दूर रैकि? 
-अक्स 

हिंदी अनुवाद ------------------------------------------------------------------------------------------------

यहाँ बहुत ठंड है माँ,
वैसे तो रजाई भी है और कम्बल भी है मेरे पास,
पर माँ तेरे गोद की गर्माहट को,
मैं आज भी खोज रहा हूँ। 
वैसे तो पिताजी यहाँ सभी साधन हैं, सुख सुविधा मनोरंजन के,
पर पिताजी जो सुख "घुघूती बसूदी" में था, आपकी पीठ की सवारी में था, 
मैं आज भी उसे खोज रहा हूँ। 
मैं अब नहीं करूँगा जिद घुघूती बसुदी खेलने की, 
न ही गोद में बैठने की जिद करूँगा। 
मेरे को बस अपने पास रहने दो आप, 
मैं थक गया हूँ यहाँ अकेले अकेले रह कर। 
आपको भी तो मेरी याद आती होगी, 
तो बोलो क्या पाया हमने एकदूसरे से दूर रह कर। 
-अक्स  

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

अक्स कु एक सवाल

 

जै ते तुम घौर बोल्दा छन,वू घौर कख च?
जथा तुम बोलणा छन, उथा शोर कख च?
वू त भुखू छौ चार दिनों कू, वू चोर कख च?
मिठै चोरी करी जेन ,वू मिठै मिलावटी छै,
खूनों रिश्ता छैं त च पर अब, वू जोर कख च?
कख हर्चीगिन भैजि की डाँट, भुल्ले की जिद्द, तुमुन त अपरा ही भै की जमीन छीनी ल्याई,
ज्यूँन अपरा बच्चों ते सब धणी त्यागी 'अक्स',
जै मकाना का हिस्सा होन्दा, वू घोर कख च? ऊं बुए बुबा ते त्यागण वालु, कमजोर कख च?
-अतुल सती 'अक्स' 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

किले नि होन्दु?


थक गयूं मी यखुलि रै रै की, क्वी चमत्कार किले नि होन्दु?
रोज सुबेर, मी बीजी त जांदू छौं, पर मी ज़िंदू किले नि होन्दु?

अपणो का दियां दर्द मा जी जी कर, अब यन आदत हुएगी मैते,
अब जब कोई बिराणू दर्द भी देन्दुं च, त दर्द किले नि होन्दु ?

मेरा भीतर अब भी कोई ज़िंदू छैं त च, पर मी अब ज़िंदू नि छौं,     
वैध जी नाड़ी टटोली की सोचणा छाँ कि मी ज़िंदू किले नि होन्दु?         

सरी उम्र ब्याज मा ब्याज ही देण लग्युं च मी,तेरी माया का कर्जा मा,  
मी खुद खत्म हुएगी, पर तेरु यु माया कु कर्ज़ खत्म किले नि होन्दु?   
     
यु समाज च जज ,मेरा आँसू छन गवाह,अर दिल च मेरु वकील,
मिन हार जाण यु मुकदमा 'अक्स', यु रफा दफा किले नि होन्दु?
                                                               -अतुल सती  'अक्स'

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

लोग


बिजां देर तक मी देखदु रयुं वे ढुंगु ते 'अक्स'
जे ते देबता बुन्ना छां लोग, पूजणा छां लोग। 
नौ भी नि पता वे कु कई सणें, कि कु होलु वू,
फेर भी मने शांति ते खोजणा छां वे मा लोग। 
सेली पड़ी जिकुड़ी मा जब देखि मिन अफ्फु ते,
अपरा ही मन का घोर मा टंग्यां सीसा मा, 
पता नि ,
अफ्फु ते बिसरी की वे ढुंगु मा क्या खोजणा छां लोग। 


######################################


बहुत देर तक मैं देखता रहा उस पथ्थर को 'अक्स'
जिसे देवता कह रहे थे लोग, पूज रहे थे लोग। 
नाम भी नहीं पता था कई को कि कौन होगा वो, 
फिर भी उसी में मन की शांति खोज रहे थे लोग।
मन को बहुत शांति मिली जब मैंने खुद को देखा,
अपने ही मन के घर में टंगे शीशे में,
पता नहीं,
खुद को भूला कर उस पत्थर में क्या खोज रहे थे लोग। 

सोमवार, 5 सितंबर 2016

माँ हे माँ मेरी !!!



माँ हे, माँ मेरी !!! 
खुद लगी च तेरी। 
खुखली मा अपरी,
फिर मैते सुले दे,
घघूती बसूदी खिले दे। 

यख त, जीवन मा, सब धणी अलझी गे,
नातों का, धगुलों मा, यख कण गेड़ पड़ी गे,
तू फिर से गेड़ खोली की ,
सब धणी सुलझे दे।        

ई दुनिया, की बथ, मेरा समझ नि आंदी,   
लाटे की, सार बल, लाटे की ब्वेही  जणदी,
तू फिर मैते गौला भेटेकी,
सब धणी बिंगैदे।   

यख त जीवन मा, सब धणी फूकेगे,
ये खारन, तन मन सब तातु करीली,
तू फिर फूँक मारिकी,
सब धणी ठण्डु करदे।     

माँ  हे माँ मेरी !!! 
एक बार फिर मैते,
घघूती बसूदी खिले दे,
खुखली मा अपरी,
मैते फिर से सुले दे। 


सोमवार, 1 अगस्त 2016

मैं अर मेरू जोगी

हे माँ !!!
अब मैते जाण दे, 
मैते मेरू जोगी बुलौणू च। 
वू बैठयूँ च भस्म लगे की, 
अपरी मस्त धूनी रमैं की, 
मिन भी अब भस्म लगे ली माँ, 
मिन भी अब धूनी रमें ली माँ, 
अब मी उड़न लग्यूँ च,
ये आसमान मा, 
हे माँ मेरी!!!
मिन अब अफ्फू ते पै ली,
मैते मेरु 'अक्स' दिखेगी,
जाण दे हे माँ मैते अब, 
हे माँ अब मैते जाण दे, 
मैते मेरू जोगी बुलौणू च। 

-अतुल सती '‪#‎अक्स‬'

मंगलवार, 7 जून 2016

पलायन का घड़ियाली आँसू




जै गौं कुठार ते,
जन्मभूमी का प्यार ते,
अटल हिमाल ते,
अपरा पहाड़ ते,
बद्री केदार ते,
झुमैलो मन्याण ते,  
तुम जु भैर  देस बटीं, 
संगति भट्याणा छन,
उत्तराखंड से भैर,
नकली उत्तराखंड बनौणा छन,
सोचा त जरा,
तौला त जरा,
तुम उत्तराखंड ते मिटे की,
यु कन उत्तराखंड बनौणा छन। 

पलायन का घड़ियाली आँसू, 
अब किले बगोणा छन?
बोतल बंद पाणी पीण वाला,
ठण्डु धारु ते किले खोज्याणा छन?
फ्लैट का कुमचरि मा फंस्यां फंस्या,
अपरि निमदरी वाळु घौर ते,
बोला अब किले रोणा छन?
अपरा बच्चों ते हिंदी अर अंग्रेजी सिखौण वाला,
बोला अब किले अपरि दूधबोली ते धै लगौणा छन।    

तब ता नि ऐ रुए,
जब छोड़ि ते गौं,
उन्दार लग्युं छौ बाटु। 
तब ता नि याद ऐ बुए,
जब देस मा बैठी की,
ठंडी हवा खाणू छौ ,
तब किले नि ऐ रुए,
जब पित्रों की कुड़ी टूटणी छे,    
अर तू अपरू फ्लैट सजोणू छौ।
खैर तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
अपरा जोड़ ते पलायन का दथडन काटी छौ।    

तब ता भिजां ख़ुशी हुए छै,
जब भेर देस मा नौकरी लगी छै,
ख़ुशी ता तुएते तिबारि दां भि भिजां हुए छै,
जब तेरु नौन्याळ देस मा ही हुए छो,
अर तू ब्वारी दगड़ी वखि बसगी छै।
हर दुई महीणा मा घौर औणौ की सौं खाई छै, 
पैली ता कै का ब्यौ मा कभी कभार,
निथर देबता नचै मा घौर ऐ ही जांदू छौ,
अब ता नाति-नातिणिओं का खातिर,
दादा दादि ते वक्खि देस मा जाण पडदु,
निथर पैलि बच्चों की छुट्टीओं मा तू घौर ता ऐ ही जांदु छौ।       
पलायन नाम का दथडु ते तब तू  खूब पल्याणु छौ।  
   
खैर !!! तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
बुए बुबा ते, भै-भुल्ली ते,
रोंदा पन्देरों ते,
अपरा बालपने की यादों ते,
उर्ख्यळियों का किस्सों ते,
शिकारे बाँट का हिस्सों ते,
साली मा धै लगोंदी गौड़ी ते,
रामी बोड़ी की गाल्यों ते, 
पल्ले छाले का गौं की पन्यारी ते,
भडु मा पकी दाल ते,
कफली, चेंसु की रस्याण ते,
झुमेलो अर मन्याण ते,
देवी देबतौं का निशाण ते,  
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
गौंन तुएते कब्बि नि छवाडि लाटा,
वु त आज भी तुएते भट्याणु  च ,
वु तब भि त्वेते भट्याणु छौं,
तुएते घौर बुलौणु छौं। 
सुखणु लग्युं च अब वु बौड़ कु डालू,
जै मा तेरा पित्रों की याद छै,
खैर तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
अपरा जोड़ ते पलायन का दथडन काटी छौ।  
                        - अतुल सती 'अक्स'      
                 

मंगलवार, 22 मार्च 2016

एक छौ घोड़ा !!! - - अतुल सती 'अक्स'

घोड़ा एक छौ अर छाँ  टँगड़ा  चार,
होन्दु रेंदु वुए पर भिजाम अत्याचार,  
36 लाटों की छै बल एक सरकार,
त एक टँगड़ी हुए बल 36 बटे चार|
अर जब कचाक हुए एक टँगड़ी पर वार, 
तब बिदकिन 9,  मतलब 36 बटे चार,
तब्बि त एक टँगड़ीन(9 विधायकोंन) मेरा यार !
कर दीनी ये सरकारों  कू बहिष्कार। 

डालिली एक घात अब त पूजन पड़लु हँकार !!!

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

धै !!! मेरा घौरे की

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
यख बस असमान ही असमान च, 
कखि न त धरती च, न पहाड, न कोई बौण, 
न कोई डाली बोठली,
कु जाणि वख घोर मा, बौण कण होला?
पन्देरा कण होला वु घुघूती कण होली?  

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वखि वे बौण मा, 
जू जलणु छौ ये जेठ मा, जू जेठ बारो मासी छौ,
वखि जख हमारू अपरू घौर छौ,
वे बौण मा जू वु बरगदो डालु च,
जू फुकेगी ये विगास मा, 
हमारा बरगदे का विनाश मा,
वे मा मौल्यार ए जाली,
मेरी लाटी, मेरी चखुली,
तू जु एक बार घोर ऐ जाली।         

देख दी वे बौण मा सब्बि डाली सूखी गेन,
वेका सारा पोथ्ला फुर्र करी के उड़ी गेन,
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
बोड़ी की जू घौर हम जोला,
यु अमर जेठ खत्म हुए जालु,
तेरा मेरा अर ये बोण का, ये बरगद का,
आँख्यों का बस्ग्याला का बाद,
जू बसंत औलू,
वू ही सदानि रेलू,       
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वु पुरखों कू घौर,
हम पोथ्लों कु ठौर,
धै लगौणु च हमते,
चल अपरा जोड़ों ते खोजदन  अब, 
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब। 

सोमवार, 8 जून 2015

त्वे ते अपरी माया मा


(त्वे ते अपरी माया मा 
जन्मो जन्मा बंधन मा)---2
बंधण चांद च मी,-----------2  
बोल तेरी हाँ च की ना ?----4
                       
ई दुनिया बटीं दूर नई  दुनिया बसोला
जख हर रंगा,हर मौसमा का फूल खिलोला            
जख बारामास बसंत ऋतू होलि 
चखुला डालियों मा  प्रेम गीत गौला,गीत गौला 
          
 मेरा  मन मा यु ही च 
आन्ख्यों तिन जू बोली च )---2        
तेरा भी जिकुड़ी मा कखी ,-----2    
यू  बथ छे च की ना?------------४ 


जुन्याली रात मा,हाथों मा हाथ होला 
चाँद तारों का संग, प्रेम गीत हम गोला 
जू सौं खाई हमुन मिली के,
वेते, जन्मो जन्म, हम निभोला,हम निभोला 

(बसगी तू यन मेरा मन मा
मेरा मन का मंदिर मा)-----------2 

जन जल्णु हो  कुई दिवु --------2     
भगवती का मंदिर मा,----------4  
                                 -अतुल सती 'अक्स'

A song of Anant Naad...



शुक्रवार, 13 मार्च 2015

मेरु आखिरी वखत

मैते पता च माँ मेरी, 
आज त्वेते बतौणू छौं।   
मेरा आखिरी वखत मा मिन नी रोण,
मेरा आँखोन  कोई  आंसू नी बगोण। 
मैते जथा मिली, 
जू भी मिली, 
वू भोत छौ,
दुःखे रात भी छे त सुखो घाम भी छौ। 
मिन अफ्फु ते पछाण ल्याई। 
अफ्फु ही अफ्फु ते जाण ल्याई। 
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी,
मेरा सुख, मेरा दुःख,
सब मेरी सोच मा ही छे।
मेरा हर वखत मा,
तू मेरा काख मा ही छे।    
अर आखिरी वखत रोण किले ???
ये शरीर त खारु ही छौ,
यू खारु ही हुएजालू,
पर 
मैते पता च माँ मेरी, 
आज त्वेते बतौणू छौं।   
मेरी आत्मा सदानि,
चम्म चमकती रेली। 
                 -अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आप आप , तू तू , मैं मैं !!!

सुणा  सुणा !!!
ट्रिंग ट्रिंग !!!
स्टिंग, वालों कू हुएगी स्टिंग !!!

मेरु मेरु !!! 
तेरु तेरु !!! 
गहरु, सच्चों कू झूठ बडू च गहरु !!!     

सच सच !!!
झूठ झूठ !!!
लूट, मची च यख केवल लूट !!!

पकड़ा पकड़ा !!!
चोर चोर !!!
घोर, चोरुं कु अड्डा बण्यूं च घोर !!!

बोल बोल !!!
खोल खोल !!!
पोल, खोल देन मीन सब्बि की पोल !!!

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

गढ़वाल से भेर यू कण गढ़वाल




नौं का ही अब यख गढ़वाली बच्यां छन,
गढ़वाल से भेर सब्बि शर्मा बण्यां छन।     

पहाड़ सुखो कु जू हो त पहाड़ नि लगदु, 
दुःखो का ढेरा यख पहाड़ जन बण्यां छन।  

अपरा बच्चों कू भार त रूई जन हल्कू, 
अर बुए बुबा गर्रा पहाड़ जन लग्दा छन।     

हिंदी अर अंग्रेजी अब मातृपितर भाषा,
अर गढ़वली बुलाण मा कांडा पड़दा छन। 

देबता हुएगिन बाबा लोगूं की मूर्ती अब यख ,
अर कुल देवता घोर मा ढुंगा जन धोल्याँ छन। 

गढ़वाल से भेर वालों ते सरु गढ़वाल अब गौं,
अर गढ़वाल मा रैण वाला गौं वाला बण्यां छन।

अपरी पितरों की सैंती कूड़ी ते छोड़ छाड़ि की,
भेर देस मा, फ्लैट का कुमचरि मा कुचियां छन।
     
अपरी पहाड़ी पावन पछाण ते लुके की,   
गढ़वाल से भेर यू कण गढ़वाल बनौणा छन।   
                        -अतुल सती 'अक्स'