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मंगलवार, 24 मई 2022

मैं कपास की बाती

मैं कपास की बाती हूं,
मैं तेरा विश्वासघाती हूं,
तुम तेल बन मुझे गले तो लगा लोगे,
पर मुझ पापी को तारे बिना,
मुझ विश्वजयी को हारे बिना,
कैसे दीप बना लोगे?
भक्ति की अग्नि कैसे जला लोगे?

मैं तो डूबा हूं इस माया में,
धंसा हुआ हूं इस काया में,
इस काया से दीपक बन जायेगा,
ये अक्स भी बाती हो जायेगा,

तुम बोट के मुझको बाती बना लोगे,
तुम तेल बन मुझको समा लोगे,
पर बिन भक्ति के मैं बुझा हुआ,
चरणों में तेरे मैं रखा हुआ,
मैं क्या करूं जो तुम मुझे अपना लोगे?
क्या करूं जो तुम मुझे दीप बना लोगे?

मैं कपास की बाती हूं,
मैं तेरा विश्वासघाती हूं,
तुम तेल बन मुझे गले तो लगा लोगे,
पर मुझ पापी को तारे बिना,
मुझ विश्वजयी को हारे बिना,
कैसे दीप बना लोगे?
भक्ति की अग्नि कैसे जला लोगे?

                                                          - अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

खाली हाथ

वैसे तो खाली हाथ ही रहता हूँ मैं अक्सर,
पर कभी कभी कुछ पथ्थर उठा लेता हूँ हाथों में,
मेरे पीछे अक्सर लगा रहता है भूत मेरा, मेरे भूत का,
वो टोकता है, रोकता रहता है मुझे,
जाने ही नहीं देता उस दुनिया में जिसे कहते हैं भविष्य हम,
उसे ही मारके भगाने को कुछ पथ्थर उठा लेता हूँ हाथों में,
वो भाग जाए, तो तुम खींचने लगते हो मेरी डोर पकड़ कर,
पर एक बात साफ़ करदूँ मैं ऐ ज़िन्दगी!
तुमने जो सिरा मेरा थामा है न हाथों में अपने,
उसका दूसरा कोई सिरा है ही नहीं।
अनगिनत सिरे हैं जो एक गिरह से बँधे हैं,
जैसे फिरकी हो कोई।
मैं, उसी गिरह में फँसा हुआ हूँ ज़िन्दगी!
आज़ादी चाहता हूँ इस बंधन से,
क्या कहा? 
आज़ादी तू दिलाएगी?
जानता हूँ मैं, तू उसे नहीं खोल पायेगी।
तू जब मौत बनकर आएगी,
खुदबखुद तू समझ जायेगी,
तेरे आते ही ये गिरह खुल जाएगी।
तब मैं खाली हाथ ही रहूँगा,
भूत का भूत, भविष्य का डर,
सब रह जायेंगे उन डोर में बंधे,
मुझे आज़ादी मिल जायेगी।
तू जब मौत बनकर आएगी,
खुदबखुद तू समझ जायेगी,
तेरे आते ही ये गिरह खुल जाएगी।
 -अक्स

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

सफल पति का सच



बरसोगी मुझपर टूट कर हाय! जब ये कहती हो तुम,
समझा मतलब,जब गुस्से में बादल सी फटती हो तुम।

सुन्दर लगती हूँ न, पूछती हो जब भी सजधजके तुम,
मुस्कुराता हूँ बस हौले से मैं, कैसे कहूँ के झूठी हो तुम।

सारी ही सेविंग डूबी मेरी, बस एक तरक्की पर हो तुम,
मैं गिरा पड़ा रूपये सा, बिटकॉइन सी उड़ती हो तुम।

सो ही नहीं पाता मैं, रातों को बैठा रहता हूँ गुमसुम,
बचती नहीं जगह सोने की, पास जब सोती हो तुम।

आ ही नहीं पाती हो अक्सर, बाहों के घेरे में मेरे तुम,
बाहें ही हो गयी होंगी छोटी, कैसे कहूँ के मोटी हो तुम।

ये पति नहीं हूँ मैं 'अक्स' और हाँ! ये बीवी नहीं हो तुम,
शायर कोई और है इसका किसी और का है ये तरन्नुम।
      -अक्स

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

वक़्त सिर्फ आज और अभी है।


रेत कितनी भी कसलो, 

हाथ कुछ नहीं रहता। 

सच केवल आज है,कल का सच, 

सच नहीं रहता।       

आज मिल लो, कुछ कह लो, 

कुछ सुन लो,   

जो गुजर गया पल,

वो फिर वही नहीं रहता।  

कभी तो मिलेंगे हम,

ये हो तो सकता है,

पर फिर जो पल आज है,

वो कल नहीं रहता। 

आइना सच कहता होगा,  

कहता रहे,

मेरा आज वाला चेहरा,

कभी कल नहीं रहता।

तुम कभी मिलोगे,

तो बतियांगे उस कभी में,

मेरे पास आज ही रहता है,

मेरे पास वो "कभी", नहीं रहता। 

मुहब्बत है तुमसे बेपनाह,

अभी बता दे रहा हूँ।         

आज ही वक़्त है 'अक्स' मेरे पास,

कल के लिए कभी,

मेरे पास कभी वक़्त नहीं रहता।

        -अतुल सती 'अक्स   


  


    


सोमवार, 15 जनवरी 2018

महीने के मुश्किल दिन

तुम कह रहे थे कल हँसते हुए,
मेरा मजाक उड़ाते हुए,
कि लो फिर से आ गये तुम्हारे,
महीने के मुश्किल दिन।

तुम भी तो कमाल हो,
अजीब सी खवाहिश रखते हो,
तुम चाहते हो कि वो आते भी रहे,
सोचो,
गर एक दिन कहीं वो आने बंद हुए तो....
तो,
तुम्हारी साँस अटक जाएगी,
एक पन्ने की माफिक,
तुम्हारी,
कान की झिल्ली फट जाएगी,
जो मैं कह दूँ किसी सुबह,
के कुछ दिनों से आये नहीं हैं,
महीने के मुश्किल दिन।
तुम भी तो कमाल हो,
न आएं वो दिन तो डर जाते हो,
और गर आजाएं तो,
तुम रूठ जाते हो,
तनतनाते हुए ताने पर ताने मारते हो,
पांच-छह दिनों को सालों सा जताते हो,
मन ही मन कोसते हो और पूछते हो,
आखिर कब जायेंगें ये तुम्हारे,
महीने के मुश्किल दिन।
तुम खैर समझोगे नहीं शायद,
कि,
वाक़ई में बहुत मुश्किल होते हैं,
महीने के मुश्किल दिन।

सिर्फ इसीलिए नहीं कि मैं,
रिसती हूँ रक्त लगातार,
बल्कि इसलिए मुश्किल हैं,
क्योंकि उन दिनों झेलना पड़ता है,
एक नया जंजीरों से बंधा जीवन,
झेलना होता है परायापन हर अपने से,
अपने ही घर में अछूत हो जाती हूँ मैं,
बिलकुल ही मनहूस हो जाती हूँ मैं,
तुम्हारे मानसिक अपंगता से,
मैं अपाहिज सी हो जाती हूँ,
कमजोर कहते हो न तुम मुझको,
इतना रक्त तुम बहा कर तो देखो
बस एक दिन,
एक बार,
लगातार,
मेरी ही तरह,
बंदिशों में मरते मरते,
जी कर तो देखो,
देखो तो सही,
कैसे जीती हूँ मैं,
महीने के मुश्किल दिन।
-अक्स
     

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

अभी भी

सुन !!!
सुन ना !!!
बहुत वक़्त हुआ,
बहुत वक़्त से चाहा कि कहूँ,
कि  
बहुत सोचता हूँ मैं,
बहुत लिखता भी हूँ,
पर,
तमाम बातें सोचने पर भी,
      
आख़िरी एक ख़्याल है,  
अभी भी तू मेरे ख्यालों में। 

आज भी,
सच में,
दर-ब-दर भटकता हूँ,
अपने सवालों को लिए,
 पर,
तमाम जवाब सुनकर भी,

         
आखिरी जवाब है,
अभी भी तू मेरे सवालों में। 


बहुत,
बहुत खोजता हूँ तुझे,
तेरी खुशबू को,
लड़ता हूँ हवाओं से,
के क्यों???
लेकर नहीं आती खुशबू तेरी,


आखिरी महक-ए-इश्क़ है,
अभी भी तू मेरे रूमालों में।     
 
 @https://www.facebook.com/AtulSati.aks/

सोमवार, 27 नवंबर 2017

एक कहानी इंसानियत और धरती की

मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।


मैं कैसे तुमको प्यार करूँ?

कैसे मैं तुम्हारा दुलार करूँ?

अश्कों सी मायूस राख हूँ  मैं ,

कोई आग न अब मेरे अंदर है।


मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।


बीज जो मुझ में रोपा गया,

वो रूठ गया, वो सूख गया,

बस एक खाली गुब्बार हूँ  मैं,

कोई आब न अब मेरे अंदर है।


मैं बंजर हूँ, मैं बंजर हूँ,

मैं बाँझ तुम्हारे अंदर हूँ।

        -अक्स 


http://atulsati.blogspot.com/2017/11/blog-post_27.html


मंगलवार, 7 नवंबर 2017

तुम्हे तो पता ही था सब

तुम्हे तो पता ही है सब,    
ये सुनहरा धागा मेरा बुना है,   
सुन्दर लगता है न?
मेरा ये रेशमी धागा?
पर, 
असल में,
मैं उलझा हूँ अपने ही ख्यालों में,
उलझता उलझाता, सुलझता सुलझाता,   
और,
खुद को हमेशा ही पाता हूँ जकड़ा हुआ,
अपने ही महीन रेशमी धागे से,
तुम्हे तो पता ही है सब।    

मैं नहीं तोड़ पा रहा हूँ इस बँधन को,
फँसा हूँ पर जीने को साँस भी तो लेनी है।  
और यहाँ,
हर आती जाती साँसों के स्पंदन से,
निकल रहा है ये रेशमी बँधन मुझसे,
लेकिन, 
मुठ्ठी भर ही साँसों का पिटारा है मेरे हिस्से में, 
तुम्हे तो पता ही है सब।    

साँसे मेरी हिस्से की जितनी भी मैं खर्च करता हूँ,
उतना ही इस धागे को बुनता हूँ,    
तुम्हे जो पसंद है मेरा ये धागा बुनना, 
तुम भी जानते हो और मुझे भी पता है,
ये धागा मेरे काम का नहीं,
ये तुम्हारे लिए है कीमती,
मेरा तो ये एक बंधन है मेरे गले में,
मेरी ख़त्म होती साँसों की परिणीति,
मेरे साँसों की चिता की ठंडी बुझी हुई राख,
तुम्हे तो पता ही है सब।    
     
मुझे तुमने ही तो सिखाया था रेशम बुनना,
मुझे भी कहाँ पता था कि ये शौक जानलेवा होगा,
अब दम घुट रहा है तो बता रहा हूँ मैं,
शायद कल बता भी न पाऊँ,
मेरी साँसे मेरे जीने  के लिए कहाँ थीं,
बल्कि ये तो मेरी मौत तक,
तुम्हारे लिए बस रेशम बुनने तक थीं,
मुझे  पता है,
मेरे मरने पर तुम इसे हमारा प्रेम कहोगे,
हमारा समर्पण कहोगे, 
कहोगे के, आखिरी साँस तक तुम्हारे लिए रेशम बुना मैंने,
पर,
मुझे पसंद नहीं था कभी भी रेशम बुनना,
मैं तो बस देखना चाहता था शहतूत के फूलों को,
कलिओं को, पत्तों को, शाखों को, फलों को, 
शहतूत  ही नहीं बल्कि हर घास, हर पौधे, सूखे हुए दरख्तों को,  
महसूस करना चाहता था हवा को, पानी को, तुमको, प्रेम को,
मैं तो बस जीना चाहता था, सिर्फ जीना,
अपने हिस्से की साँसों से कुछ पल का जीवन चाहता था,
खैर !!!
तुम जानते थे सब,सब कुछ,
मैंने कहा था तुमसे,
मुझे जाने दो, जीने दो,  
तुम्हारा  वादा था मुझसे कि  मुझे जाने दोगे,जीने दोगे,
मैं भी जानता हूँ तुमने क्या किया,
तुम्हे तो पता ही है सब,
कि,
तुम्हे तो पता ही था सब। 
                 - अक्स      
  
          
         

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

गज़ब प्यार

मेरे घर को जला कर, तुम तो आग को हवा दे रहे हो,   
फूंक मारने का ढोंग कर, कहते हो आग बुझा रहे हो। 
 
पानी की शक्ल में,  मिटटी का तेल डाल डाल कर,
तुम आग बुझा रहे हो या और लगाए जा रहे हो।  

मिटटी में बड़े जतन से तुम बीज बोये जा रहे हो, 
धूप से बचा कर, लगातार सिचाईं किये जा रहे हो,  

पर जरा गौर से देखना मिट्टी कीचड़ बना बना कर, 
असल में तो उसे तुम डुबो कर मारवाये जा रहे हो।
   
मीठे मीठे की बात कह कर सब कड़वा किये जा रहे हो,  
चाशनी को तेज़ आँच में, पकाये नहीं जलाये जा रहे हो।  

नन्हे परिन्दों को सदा ऊँचाई का खौफ दिखा दिखा कर,
घौसले में ही कैद कर,अमा!  गज़ब प्यार जताये जा रहे हो।  
                 - अक्स 

https://atulsati.blogspot.in/2017/10/blog-post.html

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

Happy Hindi Day


हम तो !!! 
बच्चे कान्वेंट में पढ़ाएंगे,
और हिंदी दिवस मनाएंगे। 

फ़ोन पर !!!
१ से इंग्लिश पाएँगे और,
हिंदी के लिए २ दबाएंगे।

खेल में !!!
इंडिया इंडिया चिल्लायेंगे,
और भारत को दूर भगाएँगे।

कागजातों में !!!
इंग्लिश में साइन सजायेंगे,
और हिंदी को भूले जायेंगे। 

हम तो !!!
A फॉर एप्पल गाते जायेंगे,
क ख ग में बगलें झाँके जायेंगे। 

आज शाम !!!
मुर्गी नहीं चिकन पकाएंगे,
देसी नहीं इंग्लिश पीते जाएंगे। 

अमा जरा ठहरो !!! 
आज शाम एक गेट टू गेदर करते हैं,
इसी बहाने हिंदी डे सेलेब्रेटायेंगे। 
     
             - अतुल सती 'अक्स'

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

कभी तो

कभी तो,
अपनी यादों की ही तरह तुम खुद भी चली आओ।
मैं सूख रहा हूँ एक पेड़ की तरह,
मेरी शिराओं में बहने वाला पानी,
मेरी आँखों का आँसू तो नहीं बनता,
पर फिर भी आँखों की कोरों से रिसकर भाप हो जाता है।
जाने कैसी बरसात है तुम्हारी यादों की,
ये जितना जम कर बरसती हैं,
उतना ही मैं सूखता जाता हूँ।
कभी तो,
अपनी यादों की ही तरह तुम खुद भी चली आओ।
अब तो बस एक सूखा ठूँठ भर रह गया हूँ,
तुम गर जो एक आखिरी बार,
बस मुझे छू भर लोगी,
तो,
तो,
मैं जल उठूँगा धूधू करके,
के तुम्हारी यादों की बरसात केवल
सुलगाती है मुझे,
बेहद तकलीफ देती है मुझे,
अपनी गिरफ्त में और जकड़ती हैं मुझे,
सुलगाती हैं और बस तरसाती हैं मुझे।
सुनो !!!
सुनो न प्रिये!!!
आज़ाद करदो मुझे अपनी यादों से,
और
छू लो मुझे एक दफा फिर तसल्ली से,
के सुकून हासिल हो मेरी रूह को,
बस एक आखिरी बार और 
लिपट कर मुझसे,
तुम जला लो मुझे,
कितनी दफा यादों के सिरहाने में,
सुलगता सुलगता सोया हूँ मैं,
और तुम,
हर दफा अपनी यादों को भेज देती हो, 
कभी,
ख़्वाबों में ही सही एक बार तो मिलने आ जाओ,
कभी,
कभी तो,
अपनी यादों की ही तरह तुम खुद भी चली आओ।

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

कौन है ये शिव?

कौन है ये शिव?   
----------------------

कह दो शिव के सर से बहती, 
वो गंगा धार नहीं,
जिस रक्तिम आसन पर बैठा, 
क्या वो मूलाधार नहीं,
नीलकंठ नहीं विशुद्धि,
त्रिनेत्र में आज्ञा नहीं,
स्वादिष्ठान शिवलिंग दर्प नहीं, 
और क्या 
मणिपुर में कोई सर्प नहीं। 

त्रिशूल नहीं है इड़ा-पिंगला
सुषुम्ना बीचों बीच नहीं।
डमरू नहीं अनाहद यंत्र,
नशा, क्या नाड़ी शुद्धि तंत्र नहीं?

क्या गजचर्म उसका कवच नहीं?
नंदी काम विजय पताका नहीं?
सड़ता,गलता,जलता,बुझता शव है जो,
उस से प्रकट स्वयंभू,
बोलो क्या वो शिव नहीं?

हिमालय के उत्तुङ्गशिखर,
क्या सहस्त्रार के पङ्कज दल नहीं?
श्वास ह्रदय का स्पंदन,
क्या तांडव की तरकल नहीं?

जिस शिव का है सब ध्यान करते,
बोलो !
वो किसके ध्यान में रहता मगन?
मिश्रित हैं उसमे भी मुझजैसे,
अग्नि, जल, पवन, धरा और गगन,            
वो भी तो जलता,बहता,उड़ता रहता,
कठोर कभी तो शून्य सा खोया रहता। 

वो शिव मेरा ध्यान नहीं,
और मैं भी उसका ध्यान नहीं,
फिर भी वो मुझमे है खोया,
और मैं भी उसमे हूँ खोया,
इसका उसको,
इसका मुझको,
अभिमान नहीं।    
उसमे,मुझमे,तुझमे,
इसमें,उसमें,
कुछ भेद नहीं,
बस इतना हमको ज्ञान नहीं। 
                     - अतुल सती 'अक्स'       
       
     https://atulsati.blogspot.in/2017/08/blog-post_24.html
  
         

बुधवार, 23 अगस्त 2017

मेरा अनुभव

मेरा अनुभव
---------------
कहीं दूर पृथ्वी के गर्भ से,
भभक रही है एक ज्वाला,
उछल उछल कर निकल रहा है लावा,
कहाँ से हुई घनघोर रात में यकायक भोर?
एक अदृश्य ऊर्जा स्तम्भ प्रकट हो,
चीर जाता है मुझे,
सुषुप्त सुषुम्ना को,
चमका कर,
कहीं दूर जाता है,
अनंत अंतरिक्ष की ओर।

अरे!!! क्या हुआ ये ???
स्तब्ध हुआ "मैं",
क्यों पागलों सी नाचने लगी,
दोनों सहेलियाँ,
और सुलझाने लगी हैं जैसे पहेलियाँ।

क्यों लहरा लहरा कर,
बेलों सी लिपट रही थीं?
क्यों रंग बिरंगे कमलों को,
खिला रही थी?

कहाँ फट रहा है ये ज्वालामुखी,
क्यों ठंडा है ये बहता लावा?
क्यों समय का नहीं हुआ एहसास?
क्यों फट गया है कपाल?
और कौन है?
जो खिला रहा है कमल आसपास?

सहस्त्र कमलदल के बीच खड़े हो?
कौन देख रहा है किसको,
अंतरिक्ष ये जगमग जगमग क्या है?
क्या है ये अनुभव? जो होता है मुझको?

कौन था "मैं" क्या हूँ "मैं"
क्यों अश्रुधारा रूकती नहीं?
क्यों हँसी कभी थमती नहीं?
क्यों रोना आता है तभी,
जब बेतहाशा हँसी आती कभी।

क्यों साँसों की ध्वनि ह्रदय संग तरंगित होती?
क्यों ऊर्जा स्पंदन की ऊपर नीचे अनुभूति होती?
क्यों अणु सामान खाली ही महसूस होता है?
क्यों तुझमे मुझमे इसमें उसमे
कोई भी अंतर नहीं महसूस होता है?
- अतुल सती 'अक्स'

सोमवार, 24 जुलाई 2017

बच्चों सी बातें

आसमान सतरंगी कहता हूँ
बादलों के साथ खेलता हूँ
तारों की चादर ओढ़ कर,
चाँद को झिलमिल बहता हुआ,
वो जो रात को नदी को देखते हुए,
दिखता है न,
उसे,
हाँ उसी झिलमिल बहती चाँदनी को अपनी आँखों में समेटता हूँ।
और लोग कहते हैं
कि मैं बच्चों सी बातें करता हूँ। 

जब अचानक से एक तितली घूमती है आसपास,
और हवा में उड़ते हुए आता एक सेमल का कपास,
कोई कली कहीं जब भी खिलती है,
आहा!
बारिश की मिटटी से सौंधी हवा महकती है,
मैं नाचता हूँ, गुनगुनाता हूँ।
और लोग कहते हैं
कि मैं बच्चों सी बातें करता हूँ।

रात हुई तो जुगनू पकड़ कर मैं,
छोड़ देता हूँ आसमान में तारे बनने को,
और जब चलता हूँ नंगे पाँव और मखमली लगे ओंस से भीगी घास,
कैसे कोई भूल सकता है वो अनूठा एहसास।     
मैं आज भी उसी एहसास को तरसता हूँ,
और तुम कहते हो
कि मैं बच्चों सी बातें करता हूँ। 
                            -अतुल सती अक्स

रविवार, 23 जुलाई 2017

 देवालय मदिरालय वैश्यालय का दोगलापन 

ऊँच नीच,
ये जात धरम सब,
देवालय में होता है।  
मदिरालय या,
वैश्यालय में,
ये दीनधरम,
कहाँ होता है।  

मदिरालय में ,
जाके खुदको, 
जग से दूर,
भगाते हैं।
घर को अपने,
स्वाहा कर के,
कैसी प्यास,
बुझाते हैं। 
 
    
वैश्यालय में,
आते सज्जन,
छुप कर आते,
जाते हैं। 
किसकी बीवी,
किसकी बेटी,
बस नोंच नोंच कर, 
खाते हैं।   

अट्हास करता,
नपुंसक पौरुष,
सिसकता है,
नारीत्व यहाँ। 
भोग विलास,
और लूट खसोट,
बस ये है इनका,
पुरुषत्व यहाँ।         

परनरगामी जो,
हुई,
वो तो है,
नीच यहाँ। 
परनारीगामी जो,
है बना,
फिर वो कैसे,  
उच्च यहाँ?  

कौन है साक़ी,
कौन हमबिस्तर,
मतलब किसे,
कहाँ होता है?
तन की भूख,
मिटाने वाला,
बस गिद्ध बना,
यहाँ  होता है।

ऊँच नीच,
ये जात धरम सब,
देवालय में होता है।  
मदिरालय या,
वैश्यालय में,
ये दीनधरम,
कहाँ होता है।  
              -अतुल सती #अक्स 

     
       

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

कहानी पहाड़ी वाले बाबा की



आओ तुम्हे सुनाऊँ एक कहानी,
पहाड़ी वाले बाबा की कहानी। 
ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में रहने वाला था वो,
अब रहता था ऊँचे ऊँचे मकानों में,
विकास की नदी में बह गया था वो,
पहाड़ी से कबका मैदानी बन गया था वो। 
मैदान की भाग दौड़ लूट गयी उसकी जवानी। 
बस यहीं से शुरू होती है हमारी कहानी।  

वो बूढ़ा अकेले अकेले ही,    
रोज इकठ्ठा करता मिट्टी, एक जगह,
बनाता टीला उनका,
सजाता घास और टहनिओं से उन्हें। 
देसिओं के बीच का वो पहाड़ी,
बल ठैरा वो एकदम अनाड़ी। 
नौकरी की बाढ़ में बगा था वो,
खुद की ही बनायी  हुई,
मजबूरी के हाथों, गया ठगा था वो। 
कहने को उसका नॉएडा में टॉप फ्लोर था,
पन्द्रवीं मंजिल में ,
जन किसी डांडा के टुख्खू का एक छोर था। 

अपने वगत जो सही लगा किया उसने,
अपने माँबाप छोड़े तरक्की को,
और आज उसका बेटा तरक्की कर गया ,
अपनी ईजा को भी अपने दगड़ ले गया, 
बाल बच्चों दगड़ी विदेश बस गया। 

वो अपने आखिरी दिन उन मिट्टी के टीलों पर,
जिन्हे वो अपना पहाड़ कहता था,
अपना घर कहता था,
उन्ही टीलों पर वो बैठ वो सबको अपनी कहानी सुनाता।
बच्चों को बुलाता और सुनाता,  

"वो बताता कि वो एक पहाड़ी था कभी,
अपनी पहचान खो कर,
उसे वहीँ पहाड़ों में दफना कर,
यहाँ मैदान में आया था। 
पर यहाँ उसके उस त्याग को कोई समझा ही नहीं,
यहाँ सभी तो ,
अपनी पहचान दफ़न कर आये थे अपने गाँव से,
कोई कार चलाता, तो कोई उसकी कार साफ़ करता। 
कोई सड़क बनाता तो कोई सड़क पर चलता,
कोई मजदूर तो मकान मालिक,
सभी अपनी पहचान दफ़न कर आये यहाँ,
सबकी थी एक ही कहानी,
पलायन पलायन पलायन की कहानी।   
सब आये अपना घर बार छोड़ छोड़ कर, 
और फिर यहाँ एक पहचान बनाई,
पहचान साहब की, नौकर की, गार्ड की,
कुक की, मालिक की, सर की,  
छोटू की जो कभी बड़ा नहीं होगा,
मैडम की, ऊँचे लोगों की, नीचे लोगों की,         
असल गँवा एक नकली पहचान बनाई, 
लेकिन इस पहचान में अपनी ज़िन्दगी गंवाई। 
पर, 
तुम बच्चों अपनी पहचान मत गँवाना,
तुम,
हाँ तुम मिलकर बच्चों,
स्मार्ट सिटी की जगह स्मार्ट गाँव बनाना।
ताकि किसी को अपनी पहचान न पड़े गँवाना।"

वो बूढ़ा ता-उम्र बस बातें करता रहा,
पहाड़ों की, पहाड़ों की वापसी की,
ये थी कहानी पहाड़ी वाले बाबा की,
कहानी अतुल नाम के शख़्स की, 
अतुल के जैसे हर एक 'अक्स' की। 
                             - अतुल सती अक्स