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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

ज़िन्दगी तेरा तजुर्बा और तेरा तर्जुमा !!!


मैं अपना समझ, 
कुछ कह रहा था, 
वो मेरा तजुर्बा था।   
तुम जो समझ कर,
खफा हुए 'अक्स',
वो मेरी बात का,
गलत तर्जुमा था। 
कुछ तो तर्जुमा ही,
गलत हो गया,
और कुछ तजुर्बा ही,
गलत हो गया। 
ज़िन्दगी तेरा तजुर्बा,
और तेरा तर्जुमा,
उफ़्फ़!!!
सही हुआ या गलत,
पर जो भी हुआ,
हो ही गया।    
     
                                      - अतुल सती 'अक्स'  

बुधवार, 28 सितंबर 2016

तसल्ली

कभी कभी बस यूँ ही, 
तुमको देखता हूँ, 
तो ,
बड़ी तसल्ली  सी होती है। 
गोया, रूह ,जिस्म से रुखसत होने ही लगी थी,
 कि तुम आ गयी। 
रुह,
कुछ देर और रुक गयी,
 इस जिस्म में,
खैर! एक न एक दिन तो,
 जाएगी ही 'अक्स',

पर तुमको देख बड़ा सुकून,
 नसीब हुआ मुझे। 
आज भी जब कभी,
तुमको देखता हूँ ,
तो ,
बड़ी तसल्ली सी होती है।

जैसे, कभी भीड़ में,
 कहीं खो जाता है कोई बच्चा,
और निगाहें तलाशने लगती हैं, 
किसी अपने को, 
रात काली है,
घुप्प अँधेरा है,
शोर है,भीड़ है। 
बदहवासी का सा माहौल है और तभी,
 तुम दिखाई दी ,
मेरी ओर आती, बाहें फैलाये,
मुझे पुकारती, 
जब तुम्हे देखा तो बड़ी राहत सी हुई। 
आज भी जब कभी,
तुमको देखता हूँ तो बड़ी तसल्ली सी होती है। 


सोमवार, 26 सितंबर 2016

आज

एक दूजे से,

दूर रहकर,

किसी और के,

हमदम बन कर,

आज,

जिन्दा तू भी है,

जिन्दा मैं भी हूँ।


झूठे इश्क को,

सच्चा कहकर,

फिर झूठी,

सारी कसमें खाकर,

आज,

शर्मिंदा तू भी है,

शर्मिंदा मैं भी हूँ।

                               - अतुल सती 'अक्स'     


सोमवार, 12 सितंबर 2016

यकीन कर

सब ठीक हो जायेगा सच्ची !!!
यकीन कर।  
मैं माफ़ करता हूँ तुझको उन सब की ओर से जो तुझसे नाराज़ हैं,
अब तू भी मुझे माफ़ कर दे, वो समझ कर जिससे तू नाराज़ है। 
कल जो था वो आज तक नहीं टिक पाया,
और ये आज भी कल तक गुजर जायेगा,
इसीलिए तो कह रहा हूँ,
अगर तू पढ़ पा रहा है इस बात को,
तो यकीन कर,
ये तेरे लिए ही है,
सच्ची,
आँख बंद कर और यकीन कर,     
सब ठीक हो जायेगा सच्ची !!!
यकीन कर।  
       
                    - अक्स 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

लोग


बिजां देर तक मी देखदु रयुं वे ढुंगु ते 'अक्स'
जे ते देबता बुन्ना छां लोग, पूजणा छां लोग। 
नौ भी नि पता वे कु कई सणें, कि कु होलु वू,
फेर भी मने शांति ते खोजणा छां वे मा लोग। 
सेली पड़ी जिकुड़ी मा जब देखि मिन अफ्फु ते,
अपरा ही मन का घोर मा टंग्यां सीसा मा, 
पता नि ,
अफ्फु ते बिसरी की वे ढुंगु मा क्या खोजणा छां लोग। 


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बहुत देर तक मैं देखता रहा उस पथ्थर को 'अक्स'
जिसे देवता कह रहे थे लोग, पूज रहे थे लोग। 
नाम भी नहीं पता था कई को कि कौन होगा वो, 
फिर भी उसी में मन की शांति खोज रहे थे लोग।
मन को बहुत शांति मिली जब मैंने खुद को देखा,
अपने ही मन के घर में टंगे शीशे में,
पता नहीं,
खुद को भूला कर उस पत्थर में क्या खोज रहे थे लोग। 

सोमवार, 5 सितंबर 2016

माँ हे माँ मेरी !!!



माँ हे, माँ मेरी !!! 
खुद लगी च तेरी। 
खुखली मा अपरी,
फिर मैते सुले दे,
घघूती बसूदी खिले दे। 

यख त, जीवन मा, सब धणी अलझी गे,
नातों का, धगुलों मा, यख कण गेड़ पड़ी गे,
तू फिर से गेड़ खोली की ,
सब धणी सुलझे दे।        

ई दुनिया, की बथ, मेरा समझ नि आंदी,   
लाटे की, सार बल, लाटे की ब्वेही  जणदी,
तू फिर मैते गौला भेटेकी,
सब धणी बिंगैदे।   

यख त जीवन मा, सब धणी फूकेगे,
ये खारन, तन मन सब तातु करीली,
तू फिर फूँक मारिकी,
सब धणी ठण्डु करदे।     

माँ  हे माँ मेरी !!! 
एक बार फिर मैते,
घघूती बसूदी खिले दे,
खुखली मा अपरी,
मैते फिर से सुले दे।