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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

अश्वथामा

आज की चर्चा अश्वथामा पर। अश्वथामा(द्रौणि) एक महारथी महाभारत काल का जो आज भी जीवित है। अष्ट चिरंजीवियों में से एक, परशुराम, व्यास, कृपाचार्य, हनुमान के साथ साथ अश्वथामा भी एक चिरंजीवी है इस कलियुग के।
वेद पुनः एक होंगे और फिर इन वेदों के चार हिस्से होंगे और अगले मन्वन्तर में अश्वथामा वेद व्यास का पद पाएंगे।  इस समय जैसे कृष्णद्वेपायन वेद व्यास हैं, अगले मन्वनंतर में अश्वथामा वेद व्यास होंगे और संयुक्त वेदों को चार भाग में विभाजित करेंगे।
अगले मन्वन्तर में(अष्टम) अश्व्थामा सप्तऋषि मंडल में कृष्ण द्वेपायन, परसुराम, कृपाचार्य इत्यादि के साथ स्थान पाएंगे। नयी सृष्टि में सनातन ज्ञान इन्ही सप्तऋषियों द्वारा प्रस्तुत किया जायेगा।
महाभारत काल में जो योद्धा अजेय था वो अश्वथामा ही था। अश्वथामा ६४ कलाओं में और १८  विद्याओं में पारंगत हैं।   
अश्वथामा को रुद्रावतार भी कहा गया है, अश्वथामा का जन्म एक तप के फलस्वरूप पिता द्रोण और माता कृपी के घर में हुआ।  द्रोण ने भगवन शिव की आराधना की और उन्ही के समान पुत्र की कामना की, फलस्वरूप अश्वथामा हुआ।  पैदा होते ही रोने की जगह घोड़े जैसी आवाज आयी तो इनका नाम अश्वथामा पड़ा।
जन्म से ही इनके माथे पर एक मणि थी जो इन्हें इस धरा पर सर्वोच्च शक्तिशाली बनाता था। अश्वथामा ४ प्रकार के देव गुणों से बने थे,
१: रूद्र
२: यम (काल)
३: क्रोध
४: काम

[चित्र: साभार विकिपीडिया: अश्वथामा शिव रूप में पांडवों के शिविर सम्मुख ]

नारायणास्त्र और ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के कारण इन्होंने पांडवों का बहुत ज्यादा नुक्सान किया। लेकिन जिस चीज़ से पांडव, कृष्ण या खुद कौरव भय खाते थे वो था अश्वथामा का क्रोध। स्वयं भीष्म ने कहा था कि अश्वथामा अपराजेय हैं और रुद्रांश हैं, लेकिन क्रोध रूप में ये स्वयं दुसरे शिव हो जायेंगे और फिर उसका परिणाम सिर्फ विनाश ही होगा। ये बात स्वयं कृष्ण भी जानते थे और सुयोधन(दुर्योधन) भी।  इसी कारण कौरवों की और से सुयोधन ने अंत तक अश्वथामा को अपना सेनापति नहीं बनाया, जबकि तब तक अश्वथामा नारायणास्त्र चला कर और ११ रुद्रों की सहायता से आधी पांडव सेना का विनाश कर चुके थे।
अंत में जब सुयोधन को छल से भीम ने मृत्युशैया पर छोड़ दिया तो कौरवों के पास केवल ३ योद्धा ही बचे थे, अश्वथामा, कृपाचार्य और कीर्तिवर्मन। बाकी सारी सेना समाप्त हो चुकी थी। तब सुयोधन ने अश्वथामा को सेनापति बनाया और अश्वथामा ने पांचों पांडवों का सर लाने की सपथ खाई।
उस रात्रि अश्वथामा सो नहीं पा रहे थे , पांडव सेना अभी भी विशाल थी, पांडव जीवित थे, और कौरवों की और से मात्र तीन ही योद्धा बचे थे। तभी उसने एक उल्लू को कौवों के घौंसलों पर हमला करते देखा।  इसी से मन में विचार आया और उसी  रात्रि को पांडव खेमे में कृपाचार्य और कीर्ति वर्मन संग प्रवेश कर गए।
अश्वथामा ने पांडवों के समस्त पाप गिनाये कि कैसे उन्होंने भीष्म को छल से मारा, कैसे कर्ण को छल से मारा, कैसे उन्होंने अपने गुरु द्रोण को असत्य वचन कर पीठ पीछे से वार किया, कैसे सुयोधन को नियमों के खिलाफ जा कर नाभि से नीचे प्रहार कर मृत्यु शैया पर लिटाया। कौरवों की और से जिसने भी जो भी छल किया था उसका परिणाम मिल चुका है, अब पांडवों को फल भोगना है।       
उस भयानक रात्रि को केवल अश्वथामा ही लड़ा।  कृष्ण को अश्वथामा का रूप पता था इसीलिए कृष्ण ने पाँचों पांडवों को और सत्यकि को अपने साथ जंगल में लेजाकर छुप  गए। अश्वथामा जब पांडवों के शिविर के पास पहुंच तो उसने देखा की उनके शिविर की की रक्षा एक "नारायण भैरव" कर रहा है जिसे सिर्फ शिव या विष्णु ही पार पा सकते थे। उसी समय अश्वथामा शिव आराधना कर खुद को, शिव को समर्पित कर देते हैं, अग्नि में खुद को तपाते हैं और अपनी बलि शिव को समर्पित करते हैं, तब शिव और काली प्रकट होते हैं तथा उनके साथ करोड़ों काली योगिनी, काली शक्ति और काली नित्या, भूत प्रेत पिशाच और समस्त शिव गण प्रकट होते हैं।
शिव कहते हैं की अब तक उभोने कृष्ण के प्रेम और श्रद्धा का मान रखा था, पांडवों की रक्षा भी करी, अश्वथामा के जवाब के लिए ही अर्जुन ने शिवआराधना की थी, लेकिन अब उनके वरदानों का समय समाप्त हो चुका है और अब शिव स्वतंत्र हैं। शिव प्रसन्न थे अश्वथामा के तप से।
और फिर अश्वथामा के शिव रूप को जाग्रत करते हुए शिव अश्वथामा में समाहित हो जाते हैं, और माँ काली और शिव स्वयं अपने गणों द्वारा वहाँ उपस्थित समस्त जीवों का विनाश करते हैं। पांडवों के सारे शिविर जला देते हैं। सभी और केवल राख और चीत्कार ही सुनायी देती है।  
अश्वथामा शिव रूप में अति शक्ति शाली हो चुके थे, और सर्वप्रथम पांडव सेनापति, द्रोण का हत्यारा धृष्टद्युम्न से युद्ध करके उसे खाली हाथ ही यमलोक पहुंच देते हैं। तत्पश्चात शिखंडी, उत्तमौजस् का वध करते हैं।  शिव रूप के सम्मुख कोई कहीं नहीं ठहर पाता।  अंत में पांडवों के शिविर में जा कर सोये हुए पाँचों पाण्डवपुत्रों के शीश काट देते हैं और लौट आते हैं। शिव रूप अलग होता है और अब अश्वथामा अपने मूल रूप में सुयोधन के सामने आचुके थे। पाँचों शीशों को देख कर सुयोधन शती से प्राण त्यागदेता है। अगले दिन जब पाण्डव कृष्ण और सत्यकी वापस आते हैं और देखते हैं कि उनकी सेना में, परिवार में, कोई नहीं बचा तो दुःख और क्रोध से भरे वो अश्वथामा से युध्द करने जाते हैं। अश्वथामा और अर्जुन दोनों ही ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं जिसे नारद तथा व्यास जी द्वारा रोक लिया जाता है।  व्यास कृष्ण पांडव और अश्वथामा पर क्रोधित हो कर उन्हें ब्रह्मास्त्र वापस लेने के लिये कहते हैं। अर्जुन वापस ले लेते हैं किन्तु अश्वथामा वापस लेना नहीं जानते थे, क्योंकि उनके पिता ने ये ज्ञान केवल अर्जुन को ही दिया था अपने पुत्र को नहीं। कहीं किसी और दिशा में बीएड करने की आज्ञा कृष्ण से पा कर अश्वथामा इसे अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे परीक्षित की और भेज देते हैं और अंतिम ज्ञात पांडव कुल की वंशबेल समाप्त कर देते हैं।  इस घटना से कृष्ण कुपित हो कर अश्वथामा का मस्तकमणि वापस मांगते हैं, जिसे अश्वथामा भीम को देदेते हैं, और कृष्ण शाप देते हैं की अगले ३००० वर्ष तक अश्वथामा को कोढ़ हो जायेगा, और उनके घाव सड़ते रहेंगे क्योंकि उन्होंने अजन्मे बालक का वध किया। कृष्ण अपने टप और पूण्य से परीक्षित को जीवित करते हैं। तभी से अश्वथामा शापित घूम रहे हैं और अपने पापों का प्रयाश्चित कर रहे हैं।                                          

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

दैत्य, दानव, राक्षस, असुर : भ्रान्ति

भारतीय धार्मिक कथाएँ- इंडियन माइथोलॉजी (जिसे अंग्रेजों ने मिथ = झूठ नाम से प्रचारित किया था, हालाँकि अब हम इसे ग्रीक वर्ड मानकर- मिथ = पुरानी कथा मानकर, स्वीकार कर चुके हैं।) जितना ज्यादा पढ़ रहा हूँ, जितना जान रहा हूँ, उतना ही विचित्र अनुभव कर रहा हूँ। हर एक पात्र की एकदम ही अलग अलग कहानियाँ हैं, बस जो चल निकली वो ही धार्मिक गाथा बन गयी, और वो ही मान्यता, आज कल उसे ही धर्म कहने लगे। सत्य क्या है किसी को नहीं पता। असल में, जहाँ तक मेरा मानना है कभी कोई धर्म-अधर्म का युद्ध हुआ ही नहीं बल्कि सदा ही सभ्यताओं का युद्ध हुआ है।सत्ता के लिए युद्ध हुआ और जो जीता उसके ही हिसाब से इतिहास लिखा गया।
शिव को असुर भी कहा गया है, ये आज कौन मानेगा? असुर का मतलब दैत्य,दानव या राक्षस नहीं है, जिसने सुरा(देव मदिरा) पी वो सुर, जिसने नहीं वो असुर। महादेव ने विषपान किया था। सुरापान नहीं। पहले सुर और असुर दोनों आर्य ही थे; परन्तु जिन लोगों ने सुरा नहीं ग्रहण की, वे असुर और जिन्होंने ग्रहण की, वे सुर कहलाये।

रामायण का यह श्लोक इसी प्रकार का है-
सुराप्रतिग्रहाद्देवाः सुरा इत्यभिविश्रुताः। अप्रतिग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरास्तथा॥

जो जंगलों(धरा-प्रकृति) के रक्षक थे, जो रक्षण करते थे, वो रक्ष जाति के हुए, जिन्हें हम राक्षस कहते हैं। जो जंगलों(धरा-प्रकृति) का यक्षण(पूजा) करते थे वे यक्ष कहलाये।

  • दैत्य, कश्यप-दिति के पुत्र थे,
  • आदित्य(देवता), कश्यप- अदिति के पुत्र थे,
  • दानव , कश्यप- दनु से 
  • राक्षस , कश्यप- सुरसा से 
तो ये सब सौतेले भाई बहन थे। दानव, दैत्य, राक्षस , देवता ये सब एक ही पिता की संतान थे। लेकि आजकल हम दैत्य, दानव, राक्षस, असुर को एक ही मानते हैं जबकि ये अलग अलग ही थे। सभ्यता अलग थी सभी की। कोई भी अच्छा या बुरा नहीं था।

https://atulsati.blogspot.in/2016/08/blog-post_2.html

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

हनुमान जी और उनके विवाह


आज हनुमान जी के विवाह बारे में एक चर्चा। 
(ये लेख केवल इस बारे में है कि हमारी संस्कृति की पुस्तकों में (ग्रंथों, वेदों, संहिताओं में, अन्य रामायणों में ) क्या लिखा है? और कोई एक पुस्तक जो ज्यादा प्रचलित हो जाती है उसी की हम मान्यताएं बन लेते हैं। ये सिर्फ तथ्य हैं, मान्यताएं हैं। )    
  
हम सब ये जानते हैं कि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं, लेकिन क्या आप ये जानते हैं कई रामायणों में  हनुमान जी विवाहित भी बताये गए हैं। 

जैन रामायण के अनुसार तो हनुमान जी के सैकड़ों विवाह थे जिनमे रावण, विभीषण और खरदूषण पुत्री भी हैं।    (विमलसूरि कृत "जैन रामायण")
इंडोनेशिया - मलय- थाई रामायणों में (खमेर - रामकेर और थाई रामकेंइन में) हनुमान जी एक मतस्य कन्या "सुअंनमच्चा" जो कि रावण पुत्री थी, से विवाह करते हैं।  
इन रामायणों के अनुसार हनुमान, खरदूषण(स्वर्णलता), रावण(सुअंनमच्चा) और विभीषण( बेंजकया - त्रिजटा ) के दामाद भी थे। उन्होंने इन तीनों की पुत्रियों से विवाह भी किया था। 
त्रिजटा और हनुमान जी से एक असुर पुत्र उत्त्पन्न हुआ जिसका सर वानर का और पूँछ थी। 
उसका नाम "हनुमान टेगंग्गा या असुरपद) था।    

लेकिन जो आश्चर्य है वो ये है कि स्वयं भारत में ही उन्हें एक जगह सपत्नीक पूजा जाता है।  तेलंगाना राज्य में  एक स्थान है - खम्मम - जहाँ हनुमान जी अपनी पत्नी समेत पूजे जाते हैं। 
यहाँ हनुमान जी अपने ब्रम्हचारी रूप में नहीं बल्कि गृहस्थ रूप में अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान है।
और बाल्मीकि, कम्भ, सहित किसी भी रामायण और रामचरित मानस में हनुमान जी के इसी रूप का वर्णन मिलता है, लेकिन "पराशर संहिता" में हनुमान जी के विवाह का उल्लेख है।
पराशर ऋषि, ब्रह्मा के प्रपोत्र ,"गुरु वशिष्ठ" के पौत्र, शक्ति मुनि के पुत्र  और "महाभारत, उपनिषदों " के रचयिता "कृष्णद्वेपायन वेद व्यास" के पिता थे। 


पराशर ऋषि कृत पराशर संहिता अनुसार:      
पवनपुत्र का विवाह भी हुआ था और वो बाल ब्रह्मचारी भी थे, कुछ विशेष परिस्थियों के कारण ही बजरंगबली को सुवर्चला के साथ विवाह बंधन मे बंधना पड़ा। हनुमान जी के गुरु भगवान सूर्य थे। हनुमान, सूर्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, सूर्य कहीं रुक नहीं सकते थे इसलिए हनुमान जी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ साथ उड़ना पड़ता और भगवान सूर्य उन्हें तरह- तरह की विद्याओं का ज्ञान देते।
लेकिन हनुमान जी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया, कुल 9 तरह की विद्याओं में से हनुमान जी को उनके गुरु ने पांच तरह की विद्या तो सिखा दी लेकिन बची चार तरह की विद्या और ज्ञान ऐसे थे जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे।
हनुमान जी पूरी शिक्षा लेने का प्रण कर चुके थे और इससे कम पर वो मानने को राजी नहीं थे।इधर भगवान सूर्य के सामने संकट था कि वो धर्म के अनुशासन के कारण किसी अविवाहित को कुछ विशेष विद्याएं नहीं सिखला सकते थे। ऐसी स्थिति में सूर्य देव ने हनुमान जी को विवाह की सलाह दी और अपने प्रण को पूरा करने के लिए हनुमान जी भी विवाह सूत्र में बंधकर शिक्षा ग्रहण करने को तैयार हो गए।
लेकिन हनुमान जी के लिए दुल्हन कौन हो और कहा से वह मिलेगी इसे लेकर सभी चिंतित थे, ऐसे में सूर्यदेव ने अपने शिष्य हनुमान जी को राह दिखलाई। सूर्य देव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमान जी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया।
देवी सुवर्चला बहुत ही तेजपूर्ण थी अपने पिता की ही भांति। सुवर्चला सदा ही तप रत रहती थीं और आगे भी अपना समस्त जीवन तप में ही व्यतीत करना चाहती थीं।   
इस विवाह के बाद हनुमान जी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई।
इस तरह हनुमान जी भले ही शादी के बंधन में बांध गए हो लेकिन शाररिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं।
सूर्यदेव ने इस विवाह पर यह कहा की – यह शादी ब्रह्मांड के कल्याण के लिए ही हुई है और इससे हनुमान जी का ब्रह्मचर्य प्रभावित नहीं होगा।


गुरुवार, 21 जुलाई 2016

अजर अमरता: जो मैंने जाना जो मैंने माना


आज एक छोटी सी चर्चा सनातन काल गणना पर:  
अजर अमरता: जो मैंने जाना जो मैंने माना 
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ब्रह्मा जी के एक दिन अर्थात १ कल्प में, १४ इन्द्र, १४ मनु मृत्यु को प्राप्त होते हैं और इनकी जगह नए देवता इन्द्र का और मनु का स्थान लेते हैं।  इतनी बड़ी ही ब्रह्मा की रात्रि होती है। दिन की इस गणना के आधार पर ब्रह्मा की आयु १०० वर्ष होती है और फिर ब्रह्मा भी मृत हो जाते हैं,और तब कोई दूसरे देवता ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करते हैं। ब्रह्म तत्व ग्रहण करता है।  
ब्रह्मा की आयु के बराबर विष्णु का एक दिन होता है। इस आधार पर विष्णु की आयु १०० वर्ष है।
फिर विष्णु भी मृत हो जाते हैं और एक नयी शक्ति उनका स्थान लेती है, विष्णु तत्व को ग्रहण कर।   
विष्णु की आयु के बराबर शिव का एक दिन होता है। इस दिन और रात के अनुसार शंकर जी की आयु १०० वर्ष होती है। फिर शिव मृत्यु को प्राप्त होते हैं और फिर एक नयी शक्ति शिव बनती है, शिव तत्व को ग्रहण कर। 
जिस एक चतुर्युग (सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग,और कलियुग) का ज्ञान हम रखते हैं, मनुष्य जाती रखती है वैसे ७१ चतुर्युगों के बराबर एक मन्वन्तर होता है, एक मनु का, एक इंद्र का जीवन होता है। और अभी तो सप्तम (7वाँ) मन्वन्तर चल रहा है। अर्थात अभी तक ६ मनु और ६ इंद्र मृत हो चुके हैं। और 7वें  मनु तथा 7वें इंद्र का काल चल रहा है।                               
सब कुछ नष्ट होता है किन्तु जो कभी नष्ट नहीं होता उसे प्रकृति कहते हैं। प्रकृति को छोड़कर सबकुछ नश्वर है, मृत्यु को प्राप्त होता है, फिर से जन्म लेता है। हर काल में हर पल बस ये ही चलता है "जीवन और मृत्यु" । ये ही अनन्त अनाद चक्र है, ये ही सनातन है। स्वर्ग और नर्क भी अस्थायी है।  अगर आप समझते हैं की आप सदा ही स्वर्ग में रहेंगे या नर्क में ऐसा नहीं है।  सनातन पद्धत्ति में ये अनन्त काल तक चलने वाला चक्र है और इस चक्र से मुक्ति संभव नहीं है। आपका एक निश्चित स्थान, निश्चित पद, निश्चित आयु, निश्चित कार्य, निश्चित भूमिका निर्धारित है, फिर ये आपका विवेक है कि आप उसका निर्वहन करते हैं या नहीं और अगर निर्वहन करते हैं तो किस प्रकार करते हैं। 
                    - अतुल सती 'अक्स'

शुक्रवार, 24 जून 2016

११ रूद्र - जानकारी



आज रूद्र के बारे में जान्ने का प्रयास करते हैं। रूद्र वो नहीं हैं जिन्हे हम कैलाश में बैठे हुए  मानते हैं। ११ रूद्र होते हैं, सभी त्रिशूल धारी, सभी बाघंबर सभी क्रोध और तूफ़ान के, विनाश के देवता। सभी अघोरी। सभी देवताओं की तरह ये भी कश्यप ऋषि की संतान हैं।  जैसे विष्णु, इंद्र इत्यादि १२ आदित्य हैं वैसे ही ये ११ रूद्र हैं।  

नोट: ये ११ रूद्र सिर्फ इसी मन्वन्तर में जो कि सप्तम मन्वन्तर (१ मनु का जीवनचक्र) है। हर मन्वन्तर में एक नया मनु, एक नया इंद्र, नए सप्तऋषि होते हैं। 
कुछ जगह इन्हे मारुत भी कहा गया है जो कि इंद्र के सेवक हैं और कुछ जगह मरूत शिव के सेवक हैं। एक मत नहीं है तो इसे रहने देते हैं।     
           
  • वैदिक- सनातन धर्म अनुसार ३३ प्रकार के देव हैं,  कश्यप ऋषि और अदिति की संतान हैं। जिनमे १२ आदित्य, ८ वसु, २ आश्विन, और  ११ रूद्र हैं। इन्ही का जिक्र रामायण तथा वामन पुराण में हुआ है।मत्स्य पुराण के हिसाब से ब्रह्मा तथा सुरभि ११ रूद्र के पिता माता हैं। 
१) कपाली 
२) पिंगला 
३) भीम 
४)विरुपक्स 
५) विलोहिता 
६) अजेश 
७)शासन 
८) शस्त 
९) शम्भू 
१०) चण्ड
११) ध्रुव 
इन ११ रुद्रों ने देवासुर संग्राम में विष्णु का साथ दिया। 
 
  • वैदिक कहानिओं के हिसाब से रूद्र (शिव) एक राजकुमार थे और ११ रूद्र उनके मित्र,सहकर्मी,साथी,सहायक थे(शतपथ ब्राह्मण श्रुति) 
  • ऋग्वेद के अनुसार ये ११ रूद्र धरा और अम्बर के बीच के हिस्से के देवता हैं।   
 

  • एक अन्य कथा के अनुसार,विष्णु पुराण के मतानुसार शिव का जन्म भगवन ब्रह्मा के गुस्से से हुआ। शिव अर्धनारीश्वर रूप में हुआ, आधा शरीर पुरुष का और आधा शरीर स्त्री का। शिव ने खुद को दो हिस्सों में बाँटा अलग अलग पुरुष(शिव/पुरुष) और स्त्री(शक्ति/प्रकृति) रूप में।
पुरुष भाग के आगे ११ और हिस्से हुए। जो आगे चल कर रूद्र कहलाए। जिनमे कुछ बहुत गोरे और कुछ बहुत ही काले थे।
१) मन्यु
२)मनु
३)महमसा
४)महान
५) सिव
६) ऋतुध्वज
७) उग्ररेतस
८) भाव
९) काम
१०)वामदेव
११) धृतव्रत

स्त्री ने अपने शरीर से ११ रुद्राणी प्रकट की। जो कि रुद्रों की पत्नी हुईं।
१) धी
२) वृत्ति
३)उसना
४) ऊर्ण
५) न्युता
६) सर्पीस
७) इला
८) अम्बिका
९) इरावती
१०) सुधा
११) दीक्षा
 

  • अन्य पुराणों में ११ रूद्र कुछ इस तरह से हैं,
१)अजा २) एकपत ३) अहिरबुध्न्य ४) तवस्ता ५) रूद्र ६) हर ७) शम्भू ८) त्रयंबक ९) अपराजित १०) ईशान ११) त्रिभुवन 

गुरु द्रोण पुत्र अश्वथामा रुद्रावतार है। अजेय अमर और अगले मन्वन्तर (अष्टम) में एक सप्तऋषि।
ये  ४ तरह के देवताओं का संयुक्त रूप जो कि रूद्र ही थे।
१) यम (मृत्यु)
२) काम (प्रेम)
३) क्रोध(गुस्सा)
और
४) रूद्र(विनाश)
स्वयं भीष्म और कृष्ण जानते थे कि अगर महारथी अश्वथामा को क्रोध दिलाया गया या वो युध्ध में पूरी शक्ति से आया तो वो स्वयं शिव हो जायेगा और फिर उसे कोई नहीं हरा पाएगा।  अश्व्थामा के आदेश पर ही ११ रुद्रों ने पांडवों की सेना में हहकार मचाया था।