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सोमवार, 13 नवंबर 2017

प्रद्युम्न केस और दबाव!!!

प्रद्युम्न केस में जिस १६ साल के लड़के को आरोपी बनाया जा रहा है और जो कारण निकल के सामने आ रहे हैं वो चिंताजनक हैं। सिर्फ स्कूल के एग्जाम और पैरेंट टीचर मीटिंग कैंसिल करवाने के लिए किसी की हत्या करने जैसा ख्याल से ज्यादा चिंताजनक उसके पीछे के कारण हैं।

हो सकता है कि ये सिर्फ एक मिथ्या कथा हो, या फिर उस बालक की कोई व्यक्तिगत समस्या ही हो लेकिन ये बात एक चिंताजनक समस्या की ओर इशारा तो करती ही है। 
और वो है,
दबाव!!!    
कितना ज्यादा दबाव है आजकल के स्कूल में,समाज में। स्टेटस, एजुकेशन, मार्क्स, रेपुटेशन, आगे निकलने की होड़, पीछे रह जाने का डर, बचपन का ख़तम हो जाना ये ही सब तो जिम्मेदार हैं इस दबाव के पीछे।
खुद निकम्मे रहे मातापिता को बच्चा चाहिए आइंस्टीन और साथ में अमिताभ और सचिन का मिश्रण। जब गाये तो सोनू शान किशोर रफ़ी लता आशा, जब नाचे तो ऋतिक, खाना पकाये तो संजीव कपूर सब कुछ एक ही में हो। 
आल इन वन। 
आजकल छोटे छोटे बच्चे डिप्रेशन में हैं, आप देखते ही होंगे वो कहते हैं कि वो बोर हो रहे हैं, 
अखबार उठा कर पढ़िए कितने ही केस हैं जहाँ रेप कर रहे हैं नाबालिग, नशा करना उनकी जीवन शैली है,  
लेकिन हमें क्या? बच्चा खराब तो स्कूल जिम्मेदार, समाज जिम्मेदार हम थोड़े न?

क्यों?
             
हमारी दीमक लगी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ढाँचा जहाँ सिर्फ अकैडमिक्स में ध्यान दिया जाता है और उसमे भी केवल फर्स्ट आना है, बाकी के लिए कोई जगह नहीं, 
वहां, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का कोई स्थान नहीं वहाँ ये ही तो होगा। 

हमारे शुक्राणु जो अपने ही जैसे करोड़ों,अरबों शुक्राणुओं से आगे रेस जीते उन्हें और जीते हुए अन्य शुक्रणओं से भी आगे दौड़ना ही होगा। जो हम कभी न कर पाए उसे वो करना ही होगा, उसे दबना ही होगा इस प्रेशर में। नहीं तो वो चार लोग क्या कहेँगे?
हमें एक ऐसा पेड़ चाहिए जिसमें हर तरह के फल लगें और हमें उसका ख़याल भी न रखना पड़े। आप देखिये अपने आसपास के बच्चों को, अपने बच्चों को, कितने चिड़चिड़े हैं? 
उनको भी समझ में आता है कि केवल और केवल फर्स्ट आना है, अगर कुछ ऊँच नीच हुई तो उसके माँ बाप को शर्मिंदा होना पड़ेगा।  लोग उसे एज अ प्रोडक्ट फेल कर देंगे, रिजेक्ट कर देंगे, और तब न जाने वो या तो खुद को या फिर किसी और की हत्या करे एक और पैरेंट टीचर मीटिंग कैंसिल करवाने को, स्कूल बंद करवाने को।             
और अगर ऐसा हुआ तब अभी एक प्रद्युम्न की बलि हुई है आगे न जाने कितने और होंगे।         

ब्लॉग: https://atulsati.blogspot.in/2017/11/blog-post_13.html       

बुधवार, 5 जुलाई 2017

पहाड़ी वाले बाबा और उसका अतीत।



आज एक कहानी सुनाता हूँ मैं आपको। एक कहानी एक दाना मनखी(बूढ़ा व्यक्ति) की। एक पहाड़ी वाले बाबा की। 
वो बाबा अक्सर बैठे रहते थे, नॉएडा के एक हाई -राईज  सोसाइटी के एक पार्क में, एक टीले नुमा जमीन पर। उन बूढ़े आदमी की उम्र रही होगी कुछ ८०-८५ साल। उस बड़ी सी पहाड़ सी ऊँची ऊँची बिल्डिंग की उस सोसाइटी में वो अकेले  ही रहते थे। उनकी पत्नी उनके एकलौते बेटे के साथ अमेरिका बस गयी थी। बेटा खूब तरक्की कर चुका था और अमेरिका में रहता था और उसकी माँ वहां रहती थी उसके साथ क्यूंकि वहां उसे अपने नाती नतीने भी तो संभालने थे। 

५-६  साल हो गए थे न तो उस बूढ़े से मिलने कभी कोई आया न ही वो कहीं गया। उसे सब पहाड़ी वाले बाबा कहते थे। वो बाबा हमेशा उन टीलों पर ही सारा दिन -शाम रहते थे। उस टीले पर कुछ कुछ घास उगी हुई थी। कहीं कहीं पर किसी पेड़ के पत्ते तोड़ कर पेड़ जैसा अकार देकर कुछ टहनियां गाड़ रखी थीं।कहीं कहीं पर उन "पहाड़ी बाबा" ने पानी जमा किया हुआ था।  कहीं कहीं उन्होंने नदी जैसी कुछ धार बना राखी थी। वो रोज वहां पानी लाते और पानी को एक छोटी नदी सी बहाते और वहां खड़े बच्चे खूब खुश हो कर उनकी इन हरकतों का मजा लेते। एकदम असली सा पहाड़ लगने वाले टीले को ही वो अपना घर कहते थे। वो कहते थे कि ये मेरा घर है, ये उत्तराखंड है।  मेरा उत्तराखंड।   
शाम को बाबा बच्चों को और उनके माता पिता को अक्सर अपने किस्से सुनाते थे  और वो किस्से कहानी थी उत्तराखंड की। उनके कहानी में, किस्सों में अक्सर एक युवा का जिक्र होता था, जो हमेशा ही अपने पहाड़ पर जाना चाहता था। अपने माता पिता के साथ रहना चाहता था लेकिन उसके उस उत्तराखंड में केवल शिक्षा थी पर रोजगार नहीं। उसे पलायन कर नॉएडा में आना पड़ा और फिर कभी वापस न जा पाया। बस बातें ही करता रहा वापस जाने की। उत्तरप्रदेश से उत्तराखंड अलग हुआ तो था पर वो युवा हमेशा उत्तरप्रदेश का ही बनकर रह गया। जैसा उसने अपने राज्य और अपने माँबाप के साथ किया, वही उसके बेटे ने उन बाबा के साथ किया। इसीलिए अब उन्होंने अपना पहाड़ इस टीले पर बसा लिया। उसमे नकली बौण(जंगल), धारा, गाड़, गदना, नदी बना कर, एक नकली उत्तराखंड बना कर, बस अपने आखिरी दिन गिन रहे थे।  
                             
वो बाबा अपने आपको NRU (नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड ) कहते थे और आज उनका बेटा NRI बन चुका था। पहाड़ी वाले बाबा जी बताते थे कि बचपन में उन्होंने उत्तराखंड आंदोलन में भाग भी लिया था और वो जब जवान थे तो वो हमेशा ही वापस जाना चाहते थे लेकिन उनकी तमाम मजबूरिओं और परिस्थिओं के कारण उनके कथनी और करनी में अंतर ही रहा। जिस मजबूरी को उन्होंने अपना ढाल बनाया था वो ही अब उनके बेटे की ढाल है। 

शायद ये ही जीवन का चक्र है। 
बाबा का नाम पूछा तो बोले कभी लोग उन्हें "अक्स" कहते थे।        
                                   - अतुल सती 'अक्स'

शनिवार, 10 जून 2017

मेरा जिस्म और तुम लड़कियों की नज़र

मैं और मेरा जीवन किस तरह इस जनानी प्रधान दुनिया में गुजरता है ये बस मैं ही जानता हूँ।
मेट्रो में, ऑफिस में, बाजार में यहाँ तक कि मंदिर तक में, मैं जब भी जाता हूँ तो मेरे पेट के उभार को घूरती निगाहों के बीच खुद को समेटने का प्रयास करता हुआ बहुत ही असहाय महसूस करता हूँ।
जब मेरी टीशर्ट से मेरी बनियान थोड़ा सा भी बाहर झांकती है तो मेरे आसपास की लड़कियों की दरिंदगी उनकी आँखों से टपकने लगती है। अपनी टीशर्ट को सँभालने में तो कभी शर्ट के बटन को बंद करने में ही मेरी रूह कांप जाती है पर मैं अपने हाथों को नहीं कांपने देता। अपने कंधे और छाती को मैं बड़ी ही निडरता से ढक लेता हूँ।
कभी कुछ गिर जाए उसे उठाने के लिए झुकूँ, या कभी जब मैं अपने मित्र के साथ उसके पीछे बैठकर बाइक पर सैर करूँ और अगर मेरी टीशर्ट थोड़ा उठ जाए तो मुझे पता है तुम लड़कियों की नज़र कहाँ अटक जाती है। बताओ तुम, मैं,  मेरी बैक क्लीवेज को कैसे छुपाऊं? एक सेकंड के लिए भी तो तुम लड़कियां मुझसे और मुझ जैसे तामाम मर्दों के जिस्म से अपनी गिद्ध जैसी नज़रें नहीं हटाती हो। मुझसे छोटी या बड़ी या हमउम्र हो बस तुम घूरती ही जाती हो।
किस तरह और कहाँ कहाँ मैं खुद को बचाऊँ? इसीलिए शायद मुझे ही बुरका पहनना होगा, शायद इसीलिए ही तुम जनानिओं ने हम मर्दों के लिए बुरक़ा बनाया होगा, क्योंकि तुम लड़कियों की नज़रें तो हम मर्दों के जिस्म को नोचेंगी ही नोचेंगी। हम मर्दों का जिस्म तुम्हारी आँखों के लिए ही तो होता है। है न?    
- अतुल सती अक्स

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

मैं शिव रात्रि नहीं मनाता।


एक शिव भक्त होने के भी बावजूद। केदार भूमि से होने के बावजूद मैं शिवरात्रि या सावन अभिषेक नहीं करता। क्यूंकि मैं उस लायक ही नहीं हूँ। मैं पांच साल की उम्र से शिव रात्रि के व्रत लेता रहा हूँ और पिछले चार सालों से मैंने कोई व्रत नहीं लिया। क्यूंकि मैं उसके लायक ही नहीं हूँ। 
1)प्रकृति का मान ही नहीं रखता हूँ। जब भी जहाँ कहीं भी जाता हूँ पोलीथीन, कचरा फैलाता हूँ। जब माँ का मान नहीं होता तो पिता कभी खुश नहीं रह सकते।

2)पानी शिव लिंग पर चढ़ा कर सोचता था कि बड़ा पुण्य मिलेगा लेकिन कभी अपने घर का टपकता पानी नहीं बचाया।
कभी जल संरक्षण नहीं किया। तो मैं शिव लिंग पर जल चढ़ाने का अधिकारी नहीं रहा।

3)शिव ऊर्जा के स्त्रोत हैं, और मैंने कभी भी कोई भी ऊर्जा नहीं बचाई। उसका संरक्षण नहीं किया। तो किस मुख से मैं धूप दिया बाती करूँ?

4)शिव वन में रहते हैं, और मैंने कभी वन संरक्षण में कोई काम नहीं किया। हमारे पहाड़ों में वन जलते हैं उन्हें बचाने के लिए कभी कोई काम नहीं किया। जब शिव का घर ही जला दिया तो किस मुख से उसके सामने जाऊं? बेल पत्री कैसे चढाउँ?

5)गौ हत्या रोकने पर कभी कुछ काम नहीं किया, माँ बोला उसे पर बस झूठा या कचरा ही खिलाया, पोलीथीन खिलाई, किस मुहं से उसके संतान वाला दूध मैं अपने पिता पर चढाउँ? न ही माँ का सम्मान किया न ही पिता का, तो किस मुहं से माँ का दूध पिता पर चढाउँ।

6)मेरी दुनिया में सब कुछ तो उसी शिव का है मैंने कुछ भी तो कभी अर्जित नहीं किया, तो जिस धन को मैं सबसे ऊपर मानता हूँ(जितना ज्यादा चढ़ावा उतना ही बड़ा मैं, इसे श्रद्धा समझता हूँ और भक्ति भी भाव भी) उसी धन को मैं कैसे शिव को अर्पित करूँ?

तो मैं क्या अर्पित करूँ परम पिता परमेश्वेर को जो मुझे कोई ग्लानि से न भरे। मेरा प्रेम निश्छल है उसी को अर्पित करता हूँ।
आप लोग धन, दूध, जल, बेल पत्री अर्पण करो, क्यूंकि मुझे पूरा यक़ीन है आप मेरी तरह लापरवाह तो कतई नहीं होंगे है ना।
ॐ नम: शिवाय !!!
                                            -अतुल सती 'अक्स'

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

अंग्रेजी सागर है और हिंदी एक बड़ी नदी

माना अंग्रेजी सागर है और हिंदी एक बड़ी नदी है। और गढ़वाली, कुमाउँनी, जौनसारी और अन्य जितनी भी दम तोड़ती भाषाएँ हैं, बोली हैं, आँचलिक भाषाएँ हैं, वो हैं सहायक नदियाँ।
अधिकतर लोग सागर की ओर ही जाना चाहता है,कुछ लोग हैं जो नदी को पसंद करते हैं,पर  ध्यान रहे कि बिना सहायक नदियों, गाड़, गदनो का, नदी गंगा जी भी गंगा नई रैली। और अगर नदी ही में पानी न के बराबर होगा तो सागर भी सागर नहीं रहेगा। 
किसी  ने कहा था मुझे की जब मुझे गढ़वाली आती नहीं तो उसमे क्यों लिखता हूँ? आँग्ल भाषा मा किले नि लिख्दु? कम से कम हिंदी में ही लिखा करूँ। इसीलिए लिखता हूँ बल...... बींग गए ?गाड़ गदना नि होला त गंगा जी नि होली अर न ही सागर ही बचलू।                     - अक्स               
          

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कखि तुम भी अखबार (जन वोटर) तो नहीं?


अखबार सुबेर सुबेर सबसे पहले चाहिए होता है। सर माथे पर होता है। एक एक बात जो जो वो अखबार बोलता है सब पढ़ते हैं बल हम। सब बींग्ते हैं, कखि खुटु लगी ता वीते उठै कि अपर बरमंड मा छुएकी शिरोधार्य करते हैं। सुबेर सुबेर वो सबसे ज्यादा प्रिय होता है और सर्वोच्च सम्मान पाता है। (रिजल्ट याद है? बोर्ड एग्जाम का)
.
कुछ समय बाद जब वो पुराना हो जाता है और अखबार पूरा पूरा यक़ीन करने लगता है अपने रीडर पर तो उसकी हम जिल्द बनाते हैं, उस अखबार की आड़ में हम अपने कर्मों की किताबों को, कॉपियों को छुपाते हैं। उस अखबार की आड़ में हमारे सारे राज़ छुप जाते हैं। बींगै बल आप कुछ?
.
अब भैजी अखबार हुयगी कुछ पुराणु मतलब सरकार बणी, रीडर नेता हुयगी, मंत्री हुयगी, अब क्या? अब अखबार ते काट पीटि की कखि कै रैक मा बिछौंदा छन। अर नेता की कज्याण उसी के ऊपर पकी पकाई रोटी संभालेगी। अखबार गर्मी से फुक जाता है पर बेचारा कर भी क्या सकता है, अब तो उसने चुन लिया था न कि किसके घर जाना था?
.
अब यन्न च भाईसाहब नेता के परिवार को भैर गार्डन मा जाना है बल। वहां थोड़ी मिट्टी थोड़ी गन्दगी ठैरी तो कौन काम आएगा बल? कौन है वो जिसे बिछाया जायेगा और किसके ऊपर उसका पूरा परिवार बैठेगा अपने ढेबरे टिका कर?
अख़बार !!! टडा !!!!!!!!!!!!!!
.
वो बेचारा अखबार किसने क्या नाश्ता किया किसने नहीं? किसने क्या खाया किसको कब्ज? सब समझता है।
नेता के परिवार की जायदाद है वो, अब वो मालिक ठैरे, जैसे मन करें उनका वैसा ही तो उपयोग करेंगे बल।
पर इथा ही दुर्गति नि च अखबारे, नेता जी का परिवारन कलेऊ खैली अर गन्दगी हुयगी त अखबारन ही तो उठाएंगे बल उसे, गिरी हुई दाल, सब्जी, चटनी सब अखबार में ही समेटा जायेगा।
.
अब तक अखबार की यात्रा सर से शुरू हुई, पैर लगा तो सर पर छुआ। फिर उसे काट पीट कर कभी ज़िल्द बनाया, कभी कहीं बिछाया, कभी उसी पर बैठे, कभी उसी से साफ़ सफाई की। पर आगे अभी उसके नसीब में बहुत कुछ था।
...
बल नेता जी को सर्दी लग रही थी तो गर्मी के लिए अख़बार को ही जला कर दंगे करवाये जायेंगे और शाखों, दरख्तों को जला कर जंगल में आग लगाई। बॉन फ़ायर कहते हैं इसे बल वो।
पर यथा ही होंदु त भलू छौ, पर रे निर्भगी !!! नेता जी का नातिन पॉटी कर ली बल, अब वुई अखबार, जु कभी बरमंड मा धरी छौ वेन ही अब पूठा पुंजोणा छन।
तो समझे बाबू, जब तक अखबार ने अपनी खबर नहीं सुनायी थी, उसने नहीं बताया कि रीडर के लिए उसके पास क्या खबर है तब तक वो शिरोधार्य था और अब?????
..
किसे चुना था ये भी याद रखो। कहीं तुम भी पूठा बर्थने के काम तो नहीं आरहे?
कहीं तुम भी जल जल कर अपने नेता को गर्मी तो नहीं दे रहे, दंगे करवा कर, अपने पूर्वजों (पेड़) को जला कर?
वोटर और अखबार में कोई अंतर मिले तो बताना। कहीं तुम भी वोटर के नाम पर अखबार तो नहीं बन रहे न? सोच समझ कर हाँ...... किसे अपना रीडर चुन रहे हो? रद्दी में जाने का ऑप्शन तो हमेशा ही है।
- अतुल सती 'अक्स'

https://atulsati.blogspot.in/2017/01/blog-post_31.html  

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

आप मेरी जगह होते तो क्या करते?


कल मैं एक मंदिर के आगे से गुजर रहा था प्रणाम करने के लिए जैसे ही सर झुकाया तो देखा कि एक लड़की(युवती) एकदम झीने से स्लीवलेस टॉप में और बहुत छोटे नेकर में मंदिर आयी हुई थी। एकदम गौर वर्ण की सुंदरी साक्षात् अप्सरा जैसी लग रही थी। मैं मुख से याद तो भगवान को कर रहा था लेकिन मन ही मन उस लड़की के अंग प्रत्यंग देख रहा था।
बल की खूबसूरत थी वो। लेकिन उसको देखने के चक्कर में भगवान की मूर्ति की ओर देख ही नहीं पाया। मन लगा कर, ध्यान लगा कर पूजा कर ही नहीं पाया।  
अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि
१) क्या इसमें कोई गलत बात है?
२) क्या इस घटना में किसी की गलती है?
२)और है तो गलती किसकी है?
३) और क्या गलती है?
४) और अगर आप मेरी जगह होते तो आप क्या करते?
 
अच्छा जवाब वो देना जो दिल कहे, मन कहे, दिमाग से कुछ कमेंट मत लिखना। अपना सच तो आप भी जानते ही होंगे।      

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

उत्तराखंडी ही दोषी हैं और उन्हें माफ़ी माँगनी ही चाहिए ।


सही ही तो कहा है कि मुज्जफ़रनगर कांड में जो हुआ उसके लिए उत्तराखंडी ही दोषी हैं और उन्हें माफ़ी माँगनी ही चाहिए। इसमें क्या गलत कहा है?
अब क्यों उबल रहे हो अब ये बातें सुन कर। उत्तराखंडी मुख्यमंत्री को उत्तराखंडियों ने ही तो चुना है।   
मैं तो कहता हूँ कि उत्तराखंड की इस दुर्दशा के लिए सिर्फ और सिर्फ उत्तराखंडी ही दोषी है और कोई नहीं। और आज भी वक़्त है हर उत्तराखंडी को सच में माफ़ी मांगनी चाहिए, माफ़ी मांगनी चाहिए उत्तराखंड से(केदार खंड और मानस खंड से), उन लोगों से जिन्होंने खटीमा, मसूरी, श्रीनगर और मुजफ्फरनगर में गोली खाई, जिनके बलात्कार हुए, उन शहीदों से माफ़ी मांगो। मांगो माफ़ी अपने पापों के लिए जिन लोगों ने कहा कि मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा, उनको जिताया भी और मुख्यमंत्री भी बनाया। जिन्होंने उत्तराखंड लूटकर बाहर अपने महल बनाये उन्हें किसने चुना? क्यों चुना? 
वो लोग भी तो उत्तराखंडी ही हैं बल जिन्होंने खुद को क्रांति कारी बोलके खुद को सत्ता के लिए गिरवी रख दिया। वो क्रांतिकारी अपना दल तक एक नहीं रख पाए। और आजकल हुंकार भर रहे हैं उनको १६ साल लग गए नींद से जागने में बल।  उत्तराखंड बनके सुनिन्द स्वेगये थे वो।  
उत्तराखंडियों को इस बात के लिए भी माफ़ी माँगनी चाहिए जब उत्तराखंड बना और मैदानी इलाकों को इसमें जोड़ दिया गया और उत्तराखंडियोँ ने उसे क्यों स्वीकार कर लिया। आज का उत्तराखंड ये कैसा पहाड़ी राज्य है जहाँ विधान भवन में पहाड़ से ज्यादा गैर पहाडियों का प्रतिनिधित्व है। उत्तराखंडियों ने ही तो ये किया ये अनर्थ, मौन सहमति किसकी थी? क्या इसके लिए माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए?
    
उत्तराखंड से ढ़ाई लाख परिवार बल पलायन कर गए वो भी तो उत्तराखण्डी ही ठैरे।अब जिन्होंने पलायन किया बल वो भी उत्तराखंडी ठैरे और जिसकी वजह से पलायन हुआ वो भी उत्तराखंडी ठैरे। तो बल अब कौन माफ़ी मांगेगा और किस किस से?              

बल कोदा झंगोरा खाएँगे उत्तराखंड बनाएँगे। सोलह साल बाद कोदा झंगोरा उगाने लायक भी नहीं रहा उत्तराखंड। डैम डैम से डामिली ये पहाड़ो बरमंड। आज प्रधानमन्त्री बोलते हैं बल उत्तराखंड गढ्ढे में है उसे निकालो बल, पर इसे खाड़ उन्द केन डाली? कोई मेरे को भी बथाओ बल, इसके लिए उत्तराखंडी क्यों न मांगे बल माफ़ी? पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ी ही नहीं बन पायी अभी तक बल कौन जिम्मॆदार है इसके लिए? देबता भी दोष हो हो कर थक गए पर उनको न नचाने का और दोष लगाने के लिए क्यों नहीं माफ़ी मांगनी है बल?
हमने खुद ही तो बल धकिया धकिया कर इस उत्तराखंड को खंड खंड कर के खाड़ उंद डाला। पलायन पर रोने वालों, भेर देस वालों ते कैन अपरी जमीन बेचीं? किले बेची? जेन बेची वो भी तो उत्तराखंडी ही ठैरे बल। अपरी पितरों की कूड़ी, पुंगड़ी बेचने वालों माफ़ी मांगो!    
पर माफ़ी कैसे मांगे और किससे मांगे बल अब। कौन बताएगा की कौन जिम्मेदार है? कौन बचाएगा अब बल? अब तो बल मवासी घाम लगी ही जाएगी क्योंकि उत्तराखंड में दो किस्म की प्रजाति रहती हैं( कुमाउँनी गढ़वाली नहीं रे !, सवर्ण दलित नहीं रे ! जजमान बामण भी नहीं रे ! गंगाड़ी सारोला भी नई बल! छि भै रावत नेगी भी नि रे !) बल वो प्रजाति हैं गंगाधर और शक्तिमान।
सारे नेता, सारी पार्टियाँ, सारे वोटर, NRU(नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड) और उत्तराखंडी (बेचारे जो पलायन नहीं कर पाए) सब या तो गंगाधर हैं, या फिर शक्तिमान।
और ये एक ओपन सीक्रेट है बल गंगाधर ही शक्तिमान ठैरा। और ये बात अगर तुमको नहीं पता है तो माफ़ी मांगो!!! मांगो माफ़ी !!!              
                                               - अतुल सती 'अक्स'

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

सपने देखो और पूरा करो

पता मैं क्या सोचता हूँ, अगर मैं कोई काम नहीं कर पाया न इस दुनिया में अपने हिसाब से, मैं कभी नहीं चाहूँगा की मेरा बेटा उसे मेरे लिए पूरा करे, वो भी मेरे हिसाब से।
ना ही मैं कोई जी तोड़ मेहनत करूँगा उसे उसकी मर्जी के खिलाफ(या उसके दिमाग में अपनी सोच डाल कर) उसे वो बनाने के लिए जो मैं चाहता हूँ। उसकी अपनी ज़िन्दगी है मेरी अपनी।      
मेरा बेटा "आरुष" जो करना चाहेगा अपने हिसाब से, जो भी वो बनना चाहेगा मैं उसमें ही खुश हूँ।
आजकल आप कोई भी रियलिटी शो देखें, (मैं अपने माबाप का सपना पूरा करना चाहता हूँ, मेरे पाप ये चाहते थे... वो ये नहीं बन पाए.... मैं चाहता हूँ मेरा बीटा/बेटी वो बने... ये बने.... मोहल्ले में नाम होगा।) मतलब क्यों? क्यों कोई किसी और का सपना पूरा करे क्यों? तभी तो अधिकतर लोग आज कल अपने छेत्र में अच्छे नहीं हैं। मन मार कर सब काम कर रहे हैं।     
जब मेरे सपने हैं तो उनपर अधिकार भी मेरा है और उसे पूरा करने का फ़र्ज़ भी मेरा ही है।  मेरी संतान का सपना उसका खुद होगा उसे इस काबिल बनाओ कि वो अपने सपने पूरे कर सके उससे पहले वो खुद सपने देख सके, उसे पाल सके जी सके। 
पहले ही बच्चों पर स्कूल का बोझ होता है, उस पर संस्कार, संस्कृति, मोहल्ले वाले, उसके बच्चे इसके बच्चे, नाते दार रिश्तेदार और फिर ऊपर से माबाप के अधूरे ख्वाब।                      
(इसे दंगल से जोड़ कर न देखें, क्योंकि हमारे जीवन में अधिकतर लोग अपने माँबाप का ही सपना पूरा करने में मर खप जाते हैं,और फिर हम जो चाहते हैं वो नहीं कर पाते.... और तब हम अपनी संतानों से अपने सपने पूरा करवाते हैं और फिर वो अपनी... )
इस चक्र इस कुचक्र को तोडना होगा, किसी को तो, कभी तो इसे तोडना होगा। मैं तोड़ रहा हूँ, क्या आप भी तोड़ेंगे? अपने बच्चों के लिए मैंने सुना है आप लोग कुछ भी कर जायेंगे सच्ची !!!! तो उन्हें उनके सपने पूरे करने दो। अपने सपने खुद पूरे करो क्योंकि वो आपके हैं।  सपने देखो और पूरा करो।     
मैं किस्मत वाला हूँ जो मुझे मेरे माँ बाप ने अपना कोई सपना नहीं दिया, और मुझे ख्वाब देखना सिखाया, उसे पूरा करना सिखाया और मेरे सपने को पूरा करने को मदद की। मेरे जैसे बहुत से बच्चे नहीं जिनके माँबाप समझदार हैं।  लेकिन क्या हम समझदार हैं? सोचिये।  आप क्या क्या नहीं थोप रहे हैं अपने बच्चों पर। 
उनको ख्वाब देखने दो पूरा हो न हो पर हौसला दो उसको पूरा करने की कोशिश करने के लिए उससे भी पहले उन्हें ख्वाब देखना सिखाओ!!! उनका ख्वाब उनका अपना।           
                 - अतुल सती 'अक्स'
http://atulsati.blogspot.com/2016/12/blog-post_76.html                  

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में


रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में 

रावण ब्राह्मण पुत्र था और माता रक्ष कुल की जो ब्राह्मण कुल से ब्याहता हो कर ब्राह्मण हो गयी थी, फिर भी रावण को रक्ष कहा गया। जबकि संतान हमेशा ही पितृ पक्ष कुल का प्रतिनिधित्व करती है, मेरी दृष्टि में रावण सदैव ही ब्राह्मण कुल श्रेष्ठ रहा है जो आर्य समाज के लिए सदैव चुनौती रहा और आर्य सभ्यता के अनुसार पथ भ्रष्ट हो गया था, क्योंकि रावण खुद एक आर्य पुत्र था और उसने आर्यों का साथ देने के बजाय रक्ष जाति के उत्थान के बारे में सोचा।

ठीक वैसे ही जैसे बाली और सुग्रीव जो की इंद्र-आरुणि  और सूर्य-आरुणि पुत्र होते हुए भी वानर कुल श्रेष्ठ कहलाये और वो भी आर्य नहीं थे, वानर जाति में जो बलवान होता था समूह का नेतृत्व करता था समस्त स्त्रियां उसकी दासी होती थी ये आज भी वानर जाती में होता है किन्तु ये आर्य सभ्यता के अनुरूप नहीं था इसीलिए श्री राम को क्षत्रीय धर्म को त्याग कर छिप कर बाली संहार करना पड़ा।
विभीषण भी रावण और कुम्भकरण की तरह ब्राह्मण-रक्ष पुत्र था किन्तु उसे सम्मान ब्राह्मण रूप में मिला क्योंकि उसने आर्य सभ्यता के सबसे प्रतापी राजा योद्धा श्री राम का साथ दिया किन्तु धर्म का साथ देने के पश्चात् भी उसने अधर्म किया, अपने ही अग्रज के साथ छल किया और मृत्यु द्वार तक पहुँचाया। लेकिन श्री राम का साथ देने के बाद भी आज तक किसी और का नाम विभीषण नहीं रखा गया। 

रामायण में अगर माली-सुमाली और मंथरा की बहस न हुई होती और मंथरा का क्रोध रक्ष जाति के प्रति न होता, नारद-कैकयी और मंथरा अन्य रानिओं द्वारा राम के वनवास की सुनियोजित उपक्रम न करते, देवता दंडकारण्य में अलग अलग जातियों में अपनी संतान उत्त्पन्न न करते और अगस्त्य ऋषि ने अभूतपूर्व समन्वयन का कार्य न किया होता आर्य और अनार्य जातियों के बीच, तो संभवतः रामायण कुछ अलग प्रकार की होती।       
असल में रामायण का प्रचार जितना ज्यादा अच्छाई और बुराई के युद्ध के रूप में दिखाई देता है उससे कई अधिक ये आर्य-अनार्य सभ्यताओं का युध्द था।        
                                                                        - अक्स 


सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।



काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।

मेरे ऑफिस के पास (सेक्टर ६२ नॉएडा ) रस्ते में कुछ गाय आवारा घूमती रहती हैं और लोग रुक रुक कर (पड़े लिखे अनपढ़ - आपके मेरे जैसे) गाय को घर से बचा हुआ खाना देते हैं और साथ में पॉलिथीन मुफ्त।
मैंने कई बार रुक कर पॉलिथीन उठा कर उन सज्जनों को वापस देता हूँ, पॉलिथीन उठाने को कहता हूँ, वो लोग हाँ तो कहते हैं पर खुद नहीं उठाते तो खुद ही उठा कर उन्हें देता हूँ और पूछता हूँ की पूण्य कमाने के चक्कर में कहीं पाप तो नहीं कमा रहे? गाय को पॉलिथीन भी खिला रहे हो और सड़क पर कचरा भी फैला रहे हो ???
कुछ लोग तो रोटी ऐसे फेंक कर जाते हैं जैसे उस रोटी की कोई वैल्यू ही न हो, न किसी ने कोई मेहनत की उसे उगाने में, न ही किसी ने पीसने में आपके घर तक लाने में, और शायद जो फेंक रहा है उसने भी पैसा कमाने में कोई मेहनत नहीं की।
सब बड़े ही खतरनाक ढंग से घूरते हैं मुझे और फिर वो पॉलिथीन लेते हैं, लेकिन आज तो हद्द ही हो गयी, आज वाले आदमी ने भागने की कोशिश की लेकिन गायों ने रास्ता रोक रखा था ,आज मेरे साथ मेरा दोस्त अनूप Anoop Aswal भी था, अनूप को अपना स्कूटर पकड़ा कर मैंने उस आदमी को उसकी पन्नी पकड़ाई ,उसने ले लिया लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो पन्नी फेंक दी वहीँ सड़क पर और भाग गया।
असल में हमारा बेसिक ही गलत है :( शिक्षा तंत्र की नाकामी से ज्यादा हमारे संस्कारों की नाकामी है, सभ्यता संस्कृति और प्रकृति का समन्वयन हम नहीं कर पाते।
(इन सब लोगों के गले में लगे पट्टों से पता चलता है कि ये बी.टेक्, एम बी ए प्रजाति के हैं और किसी बहुदेशीय कंपनी के पालतू हैं।)
कैसे लोग हैं ये ??? कौन हैं ये???
कहीं आप तो नहीं हैं न?

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सोमवार, 15 अगस्त 2016

पागल की बातें

मैं थक गया हूँ पता ये सॉफ्टवेर इंजीनियर का बोझ लिए हुए,ये कवि, ये फिलॉस्फर, ये इंसान, ये हिन्दू, ये भारतीय, ये पहचान लिए हुए,   एक पति, एक दोस्त , एक बाप, एक जँवाई, एक भांजा, भाई ,भतीजा, गुरु, चेला, एक बेटे का बोझ लिए,
बहुत ही ज्यादा घुटन होती है मुझे,
ये सब निभाते निभाते, एक्टिंग करते करते,  
बहुत ही ज्यादा थक गया हूँ मैं,
बहुत ज्यादा।
मैं सबके लिए अलग अलग हूँ ??? पर क्यों??? पता नहीं।
सब मुझे कहते हैं ऐसा करो, ऐसा नहीं, ये नहीं कह सकते, वो नहीं कर सकते, भावनाएं, संस्कृति, खानदान, रिश्तेदारी, उफ़ ये समाज????
क्या कल था, क्या कल होगा???? और क्या है आज?        
मैं कौन हूँ? क्या चाहता हूँ? क्या सोचता हूँ? क्यों सोचता हूँ? किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।  
पर क्यों फर्क नहीं पड़ता? बताओ ???
लेकिन वहीँ मेरे कुछ भी करने तो छोड़ो,  कहने भर  से सबको फर्क पड़ता है,
किसी की नाक काट जाती है, कोई शर्मसार हो जाता है,
किसी की भावनाएं आहत हो जाती हैं.,
प्रमोशन रुक जाता है,
पर क्यों???
जब होने न होने से, मेरी किसी भी मनोभाव से फर्क नहीं तो प्रकटीकरण से क्यों???
और इतने सारे किरदारों का बोझ मैं कब तक ढोता रहूँ???? बोलो ???       
कब तक ? ऐसा ही रहूँ??? कब तक?
कब तक अलग अलग किरदार निभाऊं?
कहीं कभी किसी दिन सब एक साथ मिल गए तो??? तब क्या रूप दिखाऊं?
बोलो कब तलक ये बोझ लिए घूमूँ ??? कौन जवाब देगा मुझे ???
अब आप बताओगे मुझे कि वो भी मैं ही हूँ जो जवाब देगा इसका?
अब अगर मेरी हर बात का जवाब मैं ही हूँ, जिम्मेदार भी मैं ही हूँ, तो आप क्यों हो?
  
मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नहीं है जो मैंने खोजा हो,
मुझे सब कुछ मेरे बारे में,   
सच में, सब कुछ दूसरों ने बताया।
पैदा हुआ तो मेरा नाम बताया , जाति, पहचान बताई,
डिग्री मिली तो बताया कि अब तू इंजीनियर हो गया,
कविता लिखी तो बोले कवी हो गया,
कभी फिलॉस्फर तो कभी कुछ,
और फिर मैं पिस रहा हूँ इस चक्की में,
क्यों न पिसुं? क्योंकि सब पिसते  हैं? सब पीस रहे हैं, सब पिस रहे हैं ? तुम भी पिसो।
अब आप कहोगे की अगर इतनी दिक्कत है तो अपने मन की करो,
मन की कहो।   
लेकिन आप इस बात को पसंद तो करोगे लेकिन खुल के सपोर्ट नहीं करोगे,
क्योंकि,
फिर आपके अहं के चीथड़े उड़ जायेंगे पता।
मैं तो ...      
खैर रहने दो...
छोड़ो भी !!!
मैं तो पागल ही हूँ। :)
और आप ही ने बोला है कि,
पागल की बातें नहीं सुननी चाहिए। है न?
         - अक्स 
      

         

शनिवार, 13 अगस्त 2016

पेशवा बाजीराव - एक भूला बिसरा महा-नायक

- बाजीराव 6 फूट लम्बे थे, साथ ही उनके हाथ भी लम्बे थे. बलिष्ठ निरोग शरीर, तेजस्वी कांती, तांबई रंग की त्वचा, न्यायप्रिय. उन्हें सफ़ेद या हल्के रंग के वस्त्र पसंद थे. जहां तक हो सके स्वयं के काम स्वयं करते थे. उनके 4 घोड़े थे- निला, गंगा, सारंगा आणि अबलख. उनकी देखभाल स्वयं करते थे. घोड़े को तेज़ चलाते चने खाते वे सबसे तेज़ गति से यात्रा करते थे. झूठ बोलना, अन्याय, ऐशोआराम से उन्हें सख्त नफरत थी. पूरी सेना को वे सख्त अनुशासन में रखते थे.सेना को बहुत अच्छा प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाला भाषण देते थे.
- अमेरिकी सेना में उनकी पालखेड की लड़ाई का एक मॉडल ही बना कर रखा है जिस पर सैनिकों को युद्ध तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाता है.
- जब औरंगजेब के दरबार में अपमानित हुए वीर शिवाजी आगरा में उसकी कैद से बचकर भागे थे तो उन्होंने एक ही सपना देखा था, पूरे मुगल साम्राज्य को कदमों पर झुकाने का। अटक से कटक तक केसरिया लहराने का और हिंदू स्वराज लाने का। इस सपने को पूरा किया खासकर पेशवा बाजीराव प्रथम ने।
- उन्नीस-बीस साल के उस युवा ने तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा। मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गया।
- वर्ल्ड वॉर सेकंड में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर’ में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं। आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ‘ब्लिट्जक्रिग’ बोला गया।
- बाजीराव का वॉर रिकॉर्ड छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप से भी अच्छा था. उन्होंने 40 के ऊपर युद्ध लडे और एक में भी हारे नहीं.
- नर्मदा पार सेना ले जाने वाला और 400 वर्ष की यवनी सत्ता को दिल्ली में जा कर ललकारने वाला यह पहला मराठा था.
- बाजीराव ने अगर गुजरात, मालवा, बुंदेलखंड ना जीता होता और नर्मदा व विंध्य पर्वत के सभी मार्ग अपने कब्जे में ना लिए होते तो फिर एक बार अल्लाउद्दीन खिलजी, अकबर या औरंगजेब जैसा कोई शासक विशाल सेना ले आक्रमण करता.
- उसे टैलेंट की इस कदर पहचान थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकत के तौर पर उभरे। होल्कर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतें जो बाद में अस्तित्व में आईं, वो सब पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट की देन थीं। ग्वालियर, इंदौर,धार, देवास , पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं।
- बाजीराव का अंतिम समय  मालवा में ही नर्मदा किनारे रावेरखेडी में लू लग कर विषम ज्वर आने से हुआ. ना की मस्तानी की याद में हुआ. उनके साथ उनके घोड़े और हाथी ने भी प्राण त्याग दिए. आज भी उनकी समाधि वहां है.
- बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। - निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई कई बार शिकस्त देने वाली अकेली ताकत थी बाजीराव की।
- शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बिना उसे चुनौती दिए, पूरे देश में उनकी ताकत का लोहा मनवाया था बाजीराव ने।
- पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया था। हर हिंदू राजा के लिए आधी रात मदद करने को तैयार था वो, पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो, उसके जीवन का लक्ष्य ये था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो उसके साथ वो न्याय करता था।
- उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले "हर हर महादेव" का नारा भी लगाना नहीं भूलता था।
- बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव के दम पर जिंदा थी, छत्रसाल की मौत के बाद उसका तिहाई हिस्सा भी बाजीराव को मिला।
- कभी वाराणसी जाएंगे तो उसके नाम का एक घाट पाएंगे, जो खुद बाजीराव ने 1735 में बनवाया था, - दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे तो उसकी एक मूर्ति पाएंगे।
- कच्छ में जाएंगे तो उसका बनाया आइना महल पाएंगे, पूना में मस्तानी महल और शनिवार बाड़ा पाएंगे। अकबर की तरह उसको वक्त नहीं मिला, कम उम्र में चल बसा, नहीं तो भव्य इमारतें बनाने का उसको भी शौक था।
- दिल्ली पर आक्रमण उसका सबसे बड़ा साहसिक कदम था, वो अक्सर शिवाजी के नाती छत्रपति शाहु से कहता था कि मुगल साम्राज्य की जड़ों यानी दिल्ली पर आक्रमण किए बिना मराठों की ताकत को बुलंदी पर पहुंचाना मुमकिन नहीं, और दिल्ली को तो मैं कभी भी कदमों पर झुका दूंगा। छत्रपति शाहू सात साल की उम्र से 25 साल की उम्र तक मुगलों की कैद में रहे थे, वो मुगलों की ताकत को बखूबी जानते थे, लेकिन बाजीराव का जोश उस पर भारी पड़ जाता था।
- धीरे धीरे उसने महाराष्ट्र को ही नहीं पूरे पश्चिम भारत को मुगल आधिपत्य से मुक्त कर दिया।
- फिर उसने दक्कन का रुख किया, निजाम जो मुगल बादशाह से बगावत कर चुका था, एक बड़ी ताकत था। कम सेना होने के बावजूद बाजीराव ने उसे कई युद्धों में हराया और कई शर्तें थोपने के साथ उसे अपने प्रभाव में लिया।
- इधर उसने बुंदेलखंड में मुगल सिपाहसालार मोहम्मद बंगश को हराया।
- 1728 से 1735 के बीच पेशवा ने कई जंगें लड़ीं, पूरा मालवा और गुजरात उसके कब्जे में आ गया। बंगश, निजाम जैसे कई बड़े सिपहसालार पस्त हो चुके थे।
- इधर दिल्ली का दरबार ताकतवर सैयद बंधुओं को ठिकाने लगा चुका था, निजाम पहले ही विद्रोही हो चुका था।
- औरंगजेब के वंशज और 12 वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को रंगीला कहा जाता था, जो कवियों जैसी तबियत का था। जंग लड़ने की उसकी आदत में जंग लगा हुआ था। कई मुगल सिपाहसालार विद्रोह कर रहे थे।
- उसने बंगश को हटाकर जय सिंह को भेजा, जिसने बाजीराव से हारने के बाद उसको मालवा से चौथ वसूलने का अधिकार दिलवा दिया। - मुगल बादशाह ने बाजीराव को डिप्टी गर्वनर भी बनवा दिया। लेकिन बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था, वो एक प्रांत का डिप्टी गर्वनर बनके या बंगश और निजाम जैसे सिपहासालारों को हराने से कैसे पूरा होता।
- उसने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। मुगल बादशाह ने आगरा के गर्वनर सादात खां को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हार राव होल्कर और पिलाजी जाधव की सेना यमुना पार कर के दोआब में आ गई। मराठों से खौफ में था सादात खां, उसने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति बहुत दिलचस्प थी। इधर मल्हार राव होल्कर ने रणनीति पर अमल किया और मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने डींगें मारते हुआ अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद मथुरा की तरफ चला आया।
- बाजीराव ने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके।
- सारी मुगल सेना आगरा मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया, आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके।
- देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं, एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला।
- बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, केवल पांच सौ घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मौहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में आठ से दस हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। - बाजीराव के पांच सौ लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी। ये 28 मार्च 1737 का दिन था, मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन। कितना आसान था बाजीराव के लिए, लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। लेकिन बाजीराव की जान तो पुणे में बसती थी, महाराष्ट्र में बसती थी।
- वो तीन दिन तक वहीं रुका, एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए। लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो तीन दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली को एक तरह से मराठों ने बंधक बना ली थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गया।
- बुरी तरह बेइज्जत हुआ मुगल बादशाह रंगीला ने निजाम से मदद मांगी, वो पुराना मुगल वफादार था, मुगल हुकूमत की इज्जत को बिखरते नहीं देख पाया। वो दक्कन से निकल पड़ा। इधर से बाजीराव और उधर से निजाम दोनों एमपी के सिरोंजी में मिले।
- कई बार बाजीराव से पिट चुके निजाम ने उसको केवल इतना बताया कि वो मुगल बादशाह से मिलने जा रहा है।
- निजाम दिल्ली आया, कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाया और बाजीराव को बेइज्जती करने का दंड देने का संकल्प लिया और कूच कर दिया।
- लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट से बड़ा कोई दूरदर्शी योद्धा उस काल खंड में पैदा नहीं हुआ था।बाजीराव खतरा भांप चुका था। अपने भाई चिमना जी अप्पा के साथ दस हजार सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर वो अस्सी हजार सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़ा। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था, ताकि फिर सिर ना उठा सकें।
- दिल्ली से निजाम के अगुआई में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं, 24 दिसंबर 1737 का दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया।
- निजाम अपनी जान बचाने के चक्कर में जल्द संधि करने के लिए तैयार हो जाता था। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई।
- मालवा मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने पचास लाख रुपये बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। - चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था, सो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए।
- अगला अभियान उसका पुर्तगालियों के खिलाफ था। कई युद्दों में उन्हें हराकर उनको अपनी सत्ता मानने पर उसने मजबूर किया।
- अगर पेशवा कम उम्र में ना चल बसता, तो ना अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें। बाजीराव का केवल चालीस साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले दो सौ साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता।
 
                                                                             - अतुल सती 'अक्स'


मंगलवार, 5 जुलाई 2016

भारत: एक पहचान खोता राष्ट्र - अक्स

भारत: एक पहचान खोता राष्ट्र
 आज में इस लेख के माध्यम से भारत वर्ष की उत्पत्ति और भारत नाम के उदय के बारे में कुछ प्रकाश डालना चाहूँगा. मेरे कई मित्र मेरे इस भावना से अवगत हैं की हमारे देश की और हम देश वासियों की ये बड़ी ही अजीब विडम्बना है की हम खुद को भारत वासी से ज्यादा इंडियन कहलाना पसंद करते हैं. हमारा देश की गुलाम मानसिकता देखिये  की अंग्रेजों की सहूलियत के लिए हमने अपने देश का नम ही बदल दिया. "भारत" हिंदी में और "इंडिया" अंग्रेजी में. हम दुनिया के एकलौते देश हैं जहाँ उसकी खुद की मात्रभाष सबसे कम बोली जाती है... इंग्लिश बहुत ही तेजी के साथ फ़ैल रही है और बहुत उम्मीद है की जल्द ही सिर्फ आंग्ल भाषा ही इस देश में बचेगी.. जैसे संस्कृत ख़तम हो रही अहि ऐसी ही हिंदी का हश्र होगा. इसीलिए जरूरी है की सर्वप्रथम हम अपने देश का नाम जाने. हमारे देश का नम भारत क्यूँ है? कब से है? भारत क्या है? ये कोई काल्पनिक नाम नहीं है. ये पौराणिक नाम है जो कई सदियों से चलता आ रहा है.


आखिर ये भारत नाम आया कहाँ से?
भारत नाम की उत्पति का सम्बंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट, मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पु्त्र भरत से है। भरत एक प्रतापी राजा एवं महान भक्त थे। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध एवं जैन ग्रन्थों में उनके जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वायंभुव मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद भक्त ध्रुव के पिता थे। इन्हीं प्रियव्रत के दस पुत्र थे। तीन पुत्र बाल्यकाल से ही विरक्त थे। इस कारण प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त कर एक-एक भाग प्रत्येक पुत्र को सौंप दिया। इन्हीं में से एक थे आग्नीध्र जिन्हें जम्बूद्वीप का शासन कार्य सौंपा गया। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे। ऋषभदेव ने वानप्रस्थलेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे। विष्णु पुराण में उल्लेख आता है "ततश्च भारतवर्ष तल्लो केषु गीयते"अर्थात् "तभी से इस देश को भारत वर्ष कहा जाने लगा"। वायु पुराण भी कहता है कि इससे पहले भारतवर्ष का नाम हिमवर्ष था।
श्रीमद्भागवत के अनुसार:
येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति॥९॥
अर्थात्
उनमें (सौ पुत्रों में) महायोगी भरतजी सबसे बड़े और सबसे अधिक गुणवान् थे। उन्हीं के नाम से लोग इस अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे॥९॥
दो अध्याय बाद इसी बात को फिर से दोहराया गया है। एक अन्य स्थान पर भागवत में लिखा है "अजनाभ नामैतद्वर्ष भारत मिति यत् आरंभ्य व्यपदिशन्ति" अर्थात् "इस वर्ष को जिसका नाम अजनाभ वर्ष था तबसे (ऋषभ पुत्र भरत के समय से) भारत वर्ष कहते हैं"
एक अन्य मत जो कि आमतौर पर पाठ्य पुस्तकों में प्रचलित है, के अनुसार दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर भारत नाम पड़ा। परन्तु विभिन्न स्रोतों में वर्णित तथ्यों के आधार पर यह मान्यता गलत साबित होती है। पूरी वैष्णव परम्परा और जैन परम्परा में बार-बार दर्ज है कि समुद्र से लेकर हिमालय तक फैले इस देश का नाम प्रथम तीर्थंकर दार्शनिक राजा भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष पड़ा। इसके अतिरिक्त जिस भी पुराण में भारतवर्ष का विवरण है वहां इसे ऋषभ पुत्र भरत के नाम पर ही पड़ा बताया गया है।
विष्णु पुराण (अंश-२, अध्याय-१) कहता है कि जब ऋषभदेव ने नग्न होकर गले में बाट बांधकर वन प्रस्थान किया तो अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को उत्तराधिकार दिया जिससे इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ गया।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः (श्लोक २८) अभिषिच्य सुतं वीरं भरतं पृथिवीपतिः (२९) नग्नो वीटां मुखे कृत्वा वीराधवानं ततो गतः (३१) ततश्च भारतं वर्षम् एतद् लोकेषु गीयते (३२)
लिंग पुराण में ठीक इसी बात को ४७-२१-२४ में दूसरे शब्दों में दोहराया गया है।
सोभिचिन्तयाथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः। ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रिय महोरगान्। हिमाद्रेर्दक्षिण वर्षं भरतस्य न्यवेदयत्। तस्मात्तु भारतं वर्ष तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।
अर्थात (संक्षेप में) इन्द्रिय रूपी साँपों पर विजय पाकर ऋषभ ने हिमालय के दक्षिण में जो राज्य भरत को दिया तो इस देश का नाम तब से भारतवर्ष पड़ गया। इसी बात को प्रकारान्तर से वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में भी कहा गया है।
विष्णु पुराण कहता है कि उसी देश का नाम भारतवर्ष है जो समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है।
उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।
इसमें खास बात यह है कि इसमें जहां भारत राष्ट्र का वर्णन है वहाँ भारतीयों को भारती कहकर पुकारा गया है।
महाभारत के भीष्म पर्व के नौवें अध्याय में धृतराष्ट्र से संवाद करते हुए, उनके मन्त्री संजय कहते हैं-
अत्र ते वर्णयिष्यामि वर्षम् भारत भारतम्। प्रियं इन्द्रस्य देवस्य मनो: वैवस्वतस्य च। पृथोश्च राजन् वैन्यस्य तथेक्ष्वाको: महात्मन:। ययाते: अम्बरीषस्य मान्धातु: नहुषस्य च। तथैव मुचुकुन्दस्य शिबे: औशीनरस्य च। ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा। अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीयसाम्। सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्॥
अर्थात् हे महाराज धृतराष्ट्र, अब मैं आपको बताऊँगा कि यह भारत देश सभी राजाओं को बहुत ही प्रिय रहा है। इन्द्र इस देश के दीवाने थे तो विवस्वान् के पुत्र मनु इस देश से बहुत प्यार करते थे। ययाति हों या अम्बरीष, मान्धाता रहे हो या नहुष, मुचुकुन्द, शिबि, ऋषभ या महाराज नृग रहे हों, इन सभी राजाओं को तथा इनके अलावा जितने भी महान और बलवान राजा इस देश में हुए, उन सबको भारत देश बहुत प्रिय रहा है।
इससे पता चलता है कि महाभारत काल से पहले से ही भारत नाम प्रचलित था।
इन तथ्यों के देखकर प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह धारणा कहाँ से आई कि दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत हुआ? इस सम्बंध में ध्यान देना होगा कि सातवें मनु के आगे दो वंश हो गए थे पहला इक्ष्वाकु या सूर्यवंश और दूसरा चन्द्रवंश। इसी चन्द्रवंश में दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत का जन्म हुआ। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख है- "चक्रवर्ती सुतो जज्ञे दुष्यन्तस्य महात्मनः शकुन्तलायाँ भरतो यस्य नाम्तु भारताः" अर्थात्- "महात्मा दुष्यन्त का शकुन्तला से चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न हुआ जिसकी उपाधि भारत हुई"। इस भरत वंश के लोग भारत कहलाए। यहाँ भारताः से इस भारत की धारणा की गई। जबकि यह भरत के वंशजों से जुड़ी उपाधि है। इस सन्दर्भ में गीता के विभिन्न श्लोक देखे जा सकते हैं जिनमें भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को भारतकह कर सम्बोधित करते हैं जैसे- "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत"
इसके अतिरिक्त ऋषभ पुत्र भरत तथा दुष्यन्त पुत्र भरत में छः मन्वन्तर का अन्तराल है। अतः यह देश अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत है।



भारत एक राष्ट्र कैसे हुआ??
भारत को एक सनातन राष्ट्र माना जाता है क्योंकि यह मानव-सभ्यता का पहला राष्ट्र था। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध में भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन आता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वयंभू मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद भक्त ध्रुव के पिता थे। इन्हीं प्रियव्रत के दस पुत्र थे। तीन पुत्र बाल्यकाल से ही विरक्त थे। इस कारण प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त कर एक-एक भाग प्रत्येक पुत्र को सौंप दिया। इन्हीं में से एक थे आग्नीध्र जिन्हें जम्बूद्वीप का शासन कार्य सौंपा गया। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़ कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। यह हिमवर्ष या अजनाभवर्ष ही प्राचीन भारत देश था। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे। ऋषभदेव ने वानप्रस्थ लेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे।


तो ये एक संक्षिप्त परिचय था भारत देश का. जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था. जो आर्याव्रत था... जम्बू दीप था. विश्व गुरु था. ज्ञान गुरु था. हमें इसकी गरिमा की रक्षा करनी ही चहिये. प्रगति पथ पर खुद के साथ साथ देश को भी आगे ले जायें.
जय हिंद !!!!! जय भारत !!!!!! 

                 - अक्स 

सोमवार, 4 जुलाई 2016

मैंने सुना कि पहाड़ मर रहा है- अक्स

मैंने सुना कि पहाड़ मर रहा है, आपने भी सुना बल?
क्या बथ हुई होली बल?
किसी ने कोई देबता ढुकाया है पक्का,
उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की लड़ाई हुई छे बल परसों,
जरूर उत्तरप्रदेश ने गाल घात डाली होगी।
लेकिन एक पुछेर ने बताया बल नयु नयु देबता है,
और किसी अपने ने ही ढुकाया है बल,  
आजकल बल NRU(प्रवासी) और पहाड़ी (वासी) की भी लड़ाई चल रही है,
तो कखि......
किले कि पिछला कुछ सालों बटिन उत्तराखंडी बस रोणा ही छन,
परारदां भी बल बादल फटे और इबारदां भी। 
किले कि गलती तो बल देबता ही करते हैं,
हम तो नर हैं, हम थोड़े न कोई गलती करते हैं, अबोध हैं। 
डैम देबताओं ने बनवाया,
आग भी लगवाई जंगलों में,
पलायन भी उन्होंने ही किया।
सड़कों के नाम पर बम देबताओं ने फोड़े,
जंगल काट कर रिसोर्ट्स देबताओं ने बनवाए,
पारम्परिक तरीकों से घर बनाने की विधा को देबताओं ने त्यागा,
सीमेंट, सरिया, बालू, ईंट सब बाहर से ला ला कर,
पहाड़ों पर बोझ बढ़वाया देबताओं ने,
हमने थोड़े न कुछ किया। 
वैसे एक पुछेर ने ये भी बोला बल कि,
देबता अपने आप की लग गए उत्तराखंड पर,
किले कि कोई आता तो है नहीं घौर,
और जो घौर में रहते हैं वो तो खुद उंद जाने को मर रहे हैं,
तो देबताओं ने खुद ही हँकार लगवा दिया,
और, 
अब रखा क्या है कुमौं गढ़वाल में,
जो थे पहाड़ी वो प्लैन वाले हैं,
जो बचे हैं वो  जाने वाले हैं,  
तो अब आग, पानी, 
हाहाकार ही बचा बल अब पहाड़ में। 
वैसे ऐसा भी किसी देबता ने बोला है कि,
वो आग लगा कर, बादल फाड़ फाड़ कर,
पहाड़ को तोड़मोड़ कर एकदम प्लैन बन देंगे बल, जैसा दिल्ली, देहरादून, मुंबई है बल। 
क्या पता कोई वापस आजाये, 
या फिर कोई बच गया पहाड़ में तो वो प्लैन की ओर ना जाए।
क्यूंकि यहाँ भी प्लैन और वहां भी प्लैन, 
इस तरह से पहाड़ बचे न बचे पर पहाड़ी बच जाए।    
पहाड़ी तो पहाड़ी ही ठैरा बल,
तो क्या बोलते हो भेजी,
कुछ गलत बोला तो बथाओ मैते, क्या गलत बोला बल मैंने?     
       
                        - अक्स 

गुरुवार, 30 जून 2016

ब्रह्माण्ड किसी स्त्री का गर्भ - -अतुल सती 'अक्स'

अगर ये समस्त ब्रह्माण्ड जिसमे असंख्य तारे, सूरज, ग्रह, आकाशगंगायें हैं ये वास्तव में सिर्फ ब्रह्म अंडे हुए तो?
सोचो कि ये सारा ब्रह्माण्ड किसी स्त्री का गर्भ हुआ तो? वाक़ई में जिसे हम भगवान कहते हों वो एक स्त्री, एक माँ हुई तो? और हम सब उस स्त्री के गर्भ में रहने वाले भ्रूण, या अंडे या कोशिका मात्र हुए तो?
गर्भ में भी तो अँधेरा ही होता है। और गर्भ में हमें नाभि नाल से सारा भोजन मिलता है लेकिन शुरुवात जीवन की, उन्ही अण्डों से होती है। गर्भ में हम कभी कल्पना नहीं कर सकते कि गर्भ से बाहर कोई जीवन हो सकता है। कि कोई माता भी हो सकती है? कोई पिता भी हो सकता है? उस वक़्त तो हम उस अँधेरे गर्भ को ही सारा संसार मानते हैं, जैसे इस वक़्त ब्रह्माण्ड को। क्या पता मृत्यु के पश्चात हमें माता (भगवान) के दर्शन हों जिसकी हम अभी भी कल्पना नहीं कर सकते। अभी हम उसके गर्भ में हैं, अँधेरे में और सोचते हैं कि मृत्यु के बाद कैसा जीवन? इस ब्रह्माण्ड के बाद कैसा जीवन? क्या पता जीवन हो? क्या पता  मृत्यु या फिर इस ब्रह्माण्ड की मृत्यु एक मृत्यु न होकर एक प्रसूति व्यवस्था हो?

जिन्हे हम ब्लैकहोल कहते हैं वो इस विशाल स्त्री का योनि मार्ग हो जहाँ से उस ग्रह का या उस ब्रह्माण्ड का नया जीवन प्रारम्भ होता हो? इस जगत जननी से अनेकोनेक मार्ग हों जो हमें बाहर लाते हों।  एक ब्रह्माण्ड से दूसरा ब्रह्माण्ड का कोकि मार्ग हो।  हम जितना जानते हैं उतना ही तो मानते हैं, जैसे गर्भ में हम जितना समझते हैं उतनी ही दुनिया लगती है लेकिन बाहर दुनिया अलग होती है ठीक उसी प्रकार क्या पता जितना ब्रह्माण्ड हम समझते हैं उससे बाहर एक नया ब्रह्माण्ड हो और ये ब्रह्माण्ड सिर्फ ब्रह्म अण्ड हो जो भ्रूण बनकर जन्म लेगा और साक्षात्कार कर पायेगा अपनी जगत जननी माता का। 


कल्पना कुछ भी हो सकती है, और सत्य भी। लेकिन कहीं वाक़ई में ये सत्य हुआ तो? क्या कहते हो? 
     
         
                                                                          -अतुल सती 'अक्स'              

शुक्रवार, 10 जून 2016

उत्तराखंड और पलायन


आज उत्तराखंड एक बड़ी ही विकट समस्या से जूझ रहा है और वो है पलायन।  पलायन से उत्तराखंड को या कहिये की पहाड़ को बहुकोणीय नुक्सान हो रहा है जो की आने वाले सालों में बहुत ही ज्यादा घातक रूप लेलेगा। अभी तो सब कुछ देखने में ठीक ठाक ही लगता है लेकिन वास्तव में परिस्थितियां बहुत ही विकट रूप ले रहीं हैं। 
पहाड़ों में तीन तरह का पलायन हो रहा है। 
१) राज्य से पलायन 
२) गावों से पलायन 
३) पहाड़ों की ओर पलायन  

१) राज्य से पलायन:  कहावत है न "पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं आती।" आज का पहाड़ी युवा इतना ज्यादा पड़ा लिखा होने के बावजूद राज्य से बाहर नौकरी करता है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, होटल मैनेजमेंट, सेना और भी कई अन्य क्षेत्रों में काम कर रहा युवा राज्य से बाहर है और मजबूरी में उसे वहीँ बसना पड़ रहा है।  अपनी राज्य की पहचान खोने के साथ साथ वो युवा अपनी खुद की भी पहचान खो रहा है। राज्य की विफलता प्रदर्शित करती इस विकट समस्या का हल कोई बहुत बड़ी मेहनत का काम नहीं है।  अगर उत्तराखंड सरकार यहाँ इसी राज्य में रोजगार के अवसर पैदा करती तो आज का पहाड़ी युवा यूँ दर दर की ठोकर न खा रहा होता। 

२) गावों से पलायन: दूसरी विकट समस्या है गावों का खाली होना, छोटे शहरों का खाली होना। गावों का विकास आज तक नहीं हो पाया पहाड़ों में जिसके फलस्वरूप गावों में रहने वाले लोग या पहाड़ों में नौकरी करने वाले लोग ऐसे शहरों का रुख कर रहे हैं जहाँ अच्छी सुविधाएं हों। स्कूल हों, बाजार हों, अस्तपताल हों। लेकिन इसकी वजह से बहुत ही विकत समस्याएं उत्पन्न हो रहीं हैं जिसके परिणाम बहुत ही गंभीर हो सकते हैं। आज शहरों की हालत देखिये बहुत ही ज्यादा कंजस्टेड हो गए हैं।  इतना ज्यादा भार पड़ रहा है कि दैनिक सुख सुविधाओं की पूर्ती करना ही भारी हो रहा है। भीड़ बढ़ती ही जा रही है। बैलेंस बिगड़ रहा है। जरूरी है की गावों में और छोटे शहरों में सारी सुविधाएं दी जाएँ।    

३) पहाड़ों की ओर पलायन:गावों में बाहर के लोग बस रहे हैं। और ये ही सबसे खतरनाक पलायन है। व्यापार की क्षमताएं देख कर बाहर के लोगों की भी तादाद बढ़ती ही जा रही है। आप अपने ही आसपास देखिये हर तरह की दूकान वाले और फल रेहड़ी वाले, मजदूर,किस्म किस्म के बाबा लोग और दूसरे कई लोग जो की पहाड़ी नहीं हैं,उनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है और पहडिओं की घटती ही जा रही है। अजीब विडंबना है पहाड़ी लोग अब पहाड़ में नहीं रहते हैं और बाहर के लोग पहाड़ों में। एक वक़्त ऐसा भी आएगा जब पहाड़ों में हमें कोई पहाड़ी नहीं मिलेगा। न उनका घर मिलेगा न उनकी जमीन।  इस दुर्दशा के लिए उत्तराखण्डी ही जिम्मेदार हैं। 
सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ है जमीन बेच कर, पलायन तो किया ही  अपनी जमीनें बाहर वालों को बेच कर पहाड़ी पने पाँव पर कुल्हाड़ी नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर पाँव मार रहे हैं। श्रीनगर गढ़वाल में ही बाहर के कितने लोग बस गए हैं? कोटद्वार, देहरादून, हल्द्वानी यहाँ तो पहाड़ी से जायदा किसी दिन बाहर के लोग हो जायेंगे।  खैर ये तो शहर हैं, लेकिन गाँव गाँव में अब बाहर के लोग बस गए हैं, नगरासू,कौसानी, नैनीताल,बद्रीनाथ,गोविंदघाट, भीमताल के  बाद के इलाके सब बाहर के लोगों ने ले लिए हैं, क्यूंकि गाँव के लोगों ने, बाहर बसने के लिए, शहर में बसने  के लिए, या फिर थोड़े से धन के लिए अपनी बेशकीमती जमीन, अपने घर बेच  दिए हैं। आप देखिये पहाड़ों में अब पहाड़ी कम और बाहर  के लोग ज्यादा हैं। 
उत्तराखंड में पहाड़ी इलाकों से ज्यादा मैदानी इलाके के विधायक हैं। पहाड़ी से ज्यादा देसी लोग हैं और इस तरह से विधानसभा में तो पहाड़ का विकास सोचना ही बेमानी है।
असम में जब दंगे हुए थे, असामी बनाम बाहर के लोग, उस वक़्त एक पत्रिका में एक लेख पढ़ा था कि अगला दंगा इस तरह का उत्तराखंड में हो सकता है। ऐसी नौबत आए उसके लिए सोचिये कि हम क्या कदम उठाएं?                

अगर हम अपने पहाड़ का विकास करें। अपनी जमीन न बेचें, सरकार कुछ योजनाएं लाए रोजगार की। शहरों और गावों का विकास करे। और हम लोग अपनी पहचान का सम्मान करें पहाड़ का सम्मान करें तो ही पलायन कुछ हद तक कम हो पायेगा। आपका क्या ख़याल है? हम लोग अपनी जड़ों से बहुत दूर तो जा ही रहे हैं, पर जमीन बेच कर अपनी ही जड़ों में मठ्ठा भी डाल रहे हैं।    
अभी शायद समस्या बड़ी न लगे पर जरा गौर से सोचिये पहचानिये समस्या लगातार बढ रही है।              
नोट:  ये लेख किसी के विरोध में नहीं है बल्कि ये पहाड़ी लोगों के लिए एक आत्मविवेचना के लिए है।  कृपया इसे अन्यथा न लें।  हम लोग अपनी जड़ों से दूर जा रहे हैं। और बाहर के परजीवी हमारी जड़ों में सेंध  लगा रहे हैं।     
                             -अतुल #अक्स  
                                           

मंगलवार, 7 जून 2016

NRI and NRU(नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड)



उत्तराखण्डी भी आजकल बल NRI हो गए हैं बल, जैसे  NRI  छोड़कर विदेश में बस जाते हैं और वहां  बस कर घड़ियाली आँसू बगाते हैं, वैसे ही हाल बल इन NRU (नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड) वालों का हो रखा है।
जैसे NRI अमेरिकन कहते  हैं (वी आर अमेरिकन ड्यूड, ऑवर पैरंट्स वर इंडियन) ठीक यन्नी एक भेजी ने बोला था बल मैं देल्लीआएट हूँ, जोशी नहीं शर्मा हूँ।  मेरे फॉरफादर थे उत्तराखण्डी, मैं नहीं हूँ।
इसीलिए NRU कहा उन लोगों को, जो बल ४-५ साल से घौर नहीं आये, ( टेम नी था बल ) और हर साल २-३ बार भेर देस मा या विदेस मा घूमने जाते हैं, पर अपने गाँव नहीं आते हैं।
ऐसे NRU से मैं पूछना चाहता हूँ बल ऐसी भी क्या मजबूरी की छुट्टिओं में, गोवा, बैंकाक, दुबई या शिमला, कश्मीर तो हर साल जा सकते हैं पर उत्तराखंड में अपने मरते गाँव में नहीं आ सकते।
दो तीन दिन भी भारी है अपने गाँव में बिताना, अपने उत्तराखंड में बिताना तो इतना दुःख भारीपन मत रखो ना अपने सीने में, जैसे अपनी जाति, अपनी पहचान  छुपा कर बाहर  "शर्मा" बन कर घूमते हो ठीक वैसे ही अपने आप को उत्तराखण्डी न बोल कर कुछ और बोला करो।      
मत बोलो खुद को उत्तराखण्डी, उत्तराखण्डी होने का मतलब केवल दारु पी कर किसी कौथिग या गीत संगीत में नाचना भर नहीं है। उत्तराखण्डी होना है जब आप साल में कम्सेकम एक बार उत्तराखंड आओ कुछ दिनों के लिए।  अपने  बच्चों ते बताओ  कि  कख छन जड़ें हमारी? क्या है हमारी बोली? जो उत्तराखण्डी होगा न वो कभी NRU नहीं होगा।       
अच्छा NRU और NRI में एक समानता और है और वो है पंकज उधास और नरेंदर सिंह नेगी (दोनों एक ही हैं) "चिठ्ठी आयी है "सुन कर घड़ियाली आंसू बगाने वाले, "बसंत ऋतू मा जेई" में रोते हैं।  कितने ही बसंत चले गए बल तुम ना आए।  ना NRI ही आये न ही NRU ही आये। हाँ पर विदेशी जरूर आये (नेपाली- बांग्लादेशी) देसी ना आ पाए।  और जब येकि बजह मी खुजोन लगी तो मैंने पाया कि एक राक्षश है बल पलायन नाम का, जो बल "ब्रेन ड्रेन" कर रहा है।  चलो इससे ये बात तो पता चली बल कि हम पहाड़िओं पर ब्रेन भी होता है। वो होता है न अखरोट के जन हाँ वही।  सही बींगे आप।
अब जैसे NRI चर्चा करते हैं न भारत के बारे में, पलायन के बारे में(ये वही लोग हैं जिन्होंने खुद अपना देश छोड़ा, और अब उसकी दुर्दशा पर रोते हैं) ठीक वैसे ही बल NRU वाले भी होते हैं।  और हाँ जाते जाते बताता  हूँ कि इनकी इस चर्चा का रिजल्ट भी सेम ही होता है।  कोई नहीं लौटके आता, और देश और प्रदेश का हाल बद से बदतर होता जाता है, और पलायन होता जाता है। 
                         - अतुल सती 'अक्स'

रविवार, 15 मई 2016

एक उलझन



दोस्तों एक उलझन है, बड़ी दुविधा में हूँ आजकल। असल में मैं और मेरी पत्नी स्वाती दोनों ही चिंतित हैं, मदद करें।
 
बात ये है कि मेरा पुत्र आरुष अब स्कूल जाने लगा है और मैं और स्वाती आजकल लिस्ट बनाने लगे हैं कि उसे क्या क्या करना चाहिए, उसे' बड़ा होकर क्या बनाएं? क्या बनायें उसे जिससे समाज में हमारी नाक ऊँची हो। भट्टों, खत्रिओं, पटवालों ,शर्मों और वर्मों के बच्चों को पछाड़ दे, हमेशा सबसे आगे रहे। सोसाइटी में हमारा नाम ऊंचा करे। मैं उसे हमारे खानदान का पहला डॉक्टर बनवाना चाहता हूँ। और स्वाति उसे आईएएस
वैसे IIT का भी एक ऑप्शन ओपन रखा है। पढ़ाई के साथ साथ उसे गाना, नाचना और खाना बनाना भी आना चाहिये।
खेल में भी उसे अव्वल आना होगा। क्रिकेट में सचिन, शतरंज में आनंद और टेनिस में पेस, "कुश्ती और बॉक्सिंग भी अच्छा ऑप्शन है बट "वो हाई सोसाइटी गेम्स नहीं हैं "। अभी तीन साल का है और सोच रहा हूँ उसकी प्रीनर्सरी के बाद उसे हॉबी सेंटर्स में भेजूँ और ट्युसन लगा दूँ। आखिर हमारी भी कुछ इच्छाएँ हैं, हम इतना सब किसके लिए करते हैं? अपने बच्चों के लिए ही तो। बदले में बस सिर्फ ये ही तो मांगते हैं कि वो कुछ अच्छा करें।  आखिर उनके भले के लिए ही तो हम ये सब सोचते हैं।
क्या कहा??? सौदा ??? न न न ये कोई सौदा थोड़े न है, माँ बाप का प्यार तो बिना मतलब का होता है, माँ पर बाप पर कवितायें नहीं पढ़ते क्या? इतना कुछ करते हैं उनके लिए,  बदले में अपने अधूरे सपने ही तो पूरा करने को कहते हैं, कौनसा पूरी ज़िन्दगी मांग रहे हैं।
तो क्या कहते हो आरुष को कोटा भेज दूँ, या प्रयाग ???