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मंगलवार, 13 जून 2017

मेरी बैक क्लीवेज और उसे ताड़ती तुम लड़कियाँ


क्यों मेरी बैक क्लीवेज को ताड़ती हो तुम लड़कियाँ,
जब भी मैं झुकता हूँ कुछ उठाने को या
फिर बाइक पर बैठा होता हूँ किसी के साथ?
क्या मेरा अंडरवियर पहनना है तुम्हे?

क्यों मेरी बनियान पर हरदफा अटक जाती है,
तुम लड़किओं की निगाहें?
अगर झांके वो टीशर्ट के गले से? 
क्या तुम पहनोगी मेरी बनियान?

क्या अटका है मेरी छाती के बालों में तुम्हारा?
जो घूरती रहती हो तुम लड़कियां,
मेरी शर्ट के खुले हुए तीसरे बटन को?
कुछ खो गया है क्या वहां? 

क्यों मेरे पेट के उभार पर बैठती हैं निगाहें,
क्यों मेरे हर उभार को देखकर,
तुम्हारा शरीर जड़वत होजाता है?
क्या उन पठारों पर घर बनाना है तुम्हे?

क्यों नहीं तुम अपनी निगाहों पर पर्दा करती? 
क्यों हम मर्दों को बुर्का पहनाती हो?
क्यों बुर्क़े के भीतर भी हमें झांकती हो?
क्या तुम्हे भी अपना जीवन स्याह करना है?    

बोलो लड़किओं हरदफा, हरजगह, हरउम्र में,
क्यों हम मर्दों के जिस्मों को नोचती हो तुम?
क्या मर्द होना गुनाह हो गया?
या तुम्हे भी स्त्री से मर्द होना है?

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