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मंगलवार, 7 जून 2016

पलायन का घड़ियाली आँसू




जै गौं कुठार ते,
जन्मभूमी का प्यार ते,
अटल हिमाल ते,
अपरा पहाड़ ते,
बद्री केदार ते,
झुमैलो मन्याण ते,  
तुम जु भैर  देस बटीं, 
संगति भट्याणा छन,
उत्तराखंड से भैर,
नकली उत्तराखंड बनौणा छन,
सोचा त जरा,
तौला त जरा,
तुम उत्तराखंड ते मिटे की,
यु कन उत्तराखंड बनौणा छन। 

पलायन का घड़ियाली आँसू, 
अब किले बगोणा छन?
बोतल बंद पाणी पीण वाला,
ठण्डु धारु ते किले खोज्याणा छन?
फ्लैट का कुमचरि मा फंस्यां फंस्या,
अपरि निमदरी वाळु घौर ते,
बोला अब किले रोणा छन?
अपरा बच्चों ते हिंदी अर अंग्रेजी सिखौण वाला,
बोला अब किले अपरि दूधबोली ते धै लगौणा छन।    

तब ता नि ऐ रुए,
जब छोड़ि ते गौं,
उन्दार लग्युं छौ बाटु। 
तब ता नि याद ऐ बुए,
जब देस मा बैठी की,
ठंडी हवा खाणू छौ ,
तब किले नि ऐ रुए,
जब पित्रों की कुड़ी टूटणी छे,    
अर तू अपरू फ्लैट सजोणू छौ।
खैर तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
अपरा जोड़ ते पलायन का दथडन काटी छौ।    

तब ता भिजां ख़ुशी हुए छै,
जब भेर देस मा नौकरी लगी छै,
ख़ुशी ता तुएते तिबारि दां भि भिजां हुए छै,
जब तेरु नौन्याळ देस मा ही हुए छो,
अर तू ब्वारी दगड़ी वखि बसगी छै।
हर दुई महीणा मा घौर औणौ की सौं खाई छै, 
पैली ता कै का ब्यौ मा कभी कभार,
निथर देबता नचै मा घौर ऐ ही जांदू छौ,
अब ता नाति-नातिणिओं का खातिर,
दादा दादि ते वक्खि देस मा जाण पडदु,
निथर पैलि बच्चों की छुट्टीओं मा तू घौर ता ऐ ही जांदु छौ।       
पलायन नाम का दथडु ते तब तू  खूब पल्याणु छौ।  
   
खैर !!! तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
बुए बुबा ते, भै-भुल्ली ते,
रोंदा पन्देरों ते,
अपरा बालपने की यादों ते,
उर्ख्यळियों का किस्सों ते,
शिकारे बाँट का हिस्सों ते,
साली मा धै लगोंदी गौड़ी ते,
रामी बोड़ी की गाल्यों ते, 
पल्ले छाले का गौं की पन्यारी ते,
भडु मा पकी दाल ते,
कफली, चेंसु की रस्याण ते,
झुमेलो अर मन्याण ते,
देवी देबतौं का निशाण ते,  
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
गौंन तुएते कब्बि नि छवाडि लाटा,
वु त आज भी तुएते भट्याणु  च ,
वु तब भि त्वेते भट्याणु छौं,
तुएते घौर बुलौणु छौं। 
सुखणु लग्युं च अब वु बौड़ कु डालू,
जै मा तेरा पित्रों की याद छै,
खैर तू याद रखी कि गौंन तुएते नि छोड़ि छौ,
वु तू ही तो छौ, 
जेन गौं-घौर छुवाडी छौ,
अपरा जोड़ ते पलायन का दथडन काटी छौ।  
                        - अतुल सती 'अक्स'      
                 

सोमवार, 6 जून 2016

मानव-जानवर


जो एक माँ को उसके बच्चे से दूर करता है,
खुद के लिए उसके बच्चे को भूखा रखता है,
उसके बच्चे के  हिस्से का दूध पी जाता है,
जो पंछिओं के अजन्मे बच्चों को,
तवे पर फ्राई कर, कभी उबाल कर,
तो कभी कच्चा ही खा जाता है। 

गौ माँ है, ये भी सुनाता है, 
उसी माँ के बच्चे को,पथ्थर से पीट पीट कर,
नपुंसक बना, खेतों में जोत कर आता है।

मार कर जानवरों को, बेचकर आता है,
कभी उनका माँस खाता  है,
तो कभी अपने पर उनकी चमड़ी सजाता है। 

पवित्र जगह पर चमड़े की मनाही का,
अजीब फरमान सुनाता है, और उसी जगह खुद,   
चमड़े के तबले,ढोलक और ढोल बजाता  है। 

नदियां माँ हैं, देवी हैं, जीवन दायिनी हैं,
और फिर अपनी माँ के मुख पर, 
अपना ही मल मूत्र बहाता है। 

अपने सजावट के लिए, 
अन्य जानवरों को मारता जाता है,
अपने घरों की बसावट के लिए,
दूसरों के घर मिटाता जाता है।  
  
जानवरों को पिंजरे में कैद कर,
अपने बच्चों को दिखा दिखा कर,
हर बात की आज़ादी का पाठ  पढ़ाता जाता है,
   
देखा है कभी ऐसा जानवर कहीं सृष्टि में?
जो बाते तो बड़ी बड़ी करता है विकास की,
पर हर पल सिर्फ विनाश करता जाता है,
वो ही जानवर  तो मानव कहलाता है। 
                 - अतुल सती'अक्स' 
   

मंगलवार, 31 मई 2016

बम भोले !!! - शिव स्तुति ---अनंतनाद




लोचा ! जो भी साली! ज़िन्दगी दिखाए।  
नाम का तेरे, हर एक, कश, हर गम, भुलाए।  
धूनी तेरी, मुझको हर पल  नयी राह दिखाए।  
संग तेरे कांटे भी मुझको फूलों से नज़र आये। 

तो बोलो ...  
बम बबम बबम  
बम बबम बबम 
बम बबम बबम 
बम 
बम भोले !!!

जिसको भी ये दुनिया छोड़े, 
उसको तू अपनाता है।  
मुझको भी इस जग ने छोड़ा, 
अब मुझको गले लगा ले।  

गंगा की ठंडक दे दे, भंगले की रंगत देदे।  
खारे की गर्मी से तू , मुझको शक्ति दे दे।  
नंग धड़ंग  फकीरी में खुश रहने की ताकत दे।  
काल कपाल महाकाल तू मुझको हिम्मत दे दे।   

बम बबम बबम  
बम बबम बबम 
बम बबम बबम 
बम  
बम भोले !!!

गुरुवार, 26 मई 2016

संस्मरण: १ (मेरी नन्दा देवी राजजात यात्रा २०१४)

ये कोई कहानी नहीं न ही कोई कल्पना है बल्कि एक सत्य घटना है। घटना है ये २०१४ की, पर्व था,  हिमालय का सबसे बड़ा पर्वतीय कुम्भ माँ नन्दा  देवी राज जात यात्रा, और स्थान था, बेदनी बुग्याल। हम लोग आली बुग्याल से घूम घाम कर वापस बेदनी बुग्याल पहुंचे। मेरे बाकी साथी अपने अपने टेंट में चले गए आराम करने किन्तु मैं और मेरे साथी अनूप असवाल, हम दोनों माँ नन्द के दर्शन करने हेतु माँ नन्द के विश्राम स्थल पहुंचे जहाँ माँ नन्दा और उनकी समस्त बहनों के लिए एक स्थान निर्धारित किया था। वहाँ पहुँचते ही हमने देखा कि दो गाओं के लोगों में आपस में लड़ाई हो रही है, नौबत मारपीट तक आ गई, और वजह थी कि एक गॉंव को लगता है की वो श्रेष्ठ हैं और दूसरे को लगता है कि वो खुद।
शायद कुरुड़ और बधाण गॉंव थे।
एक गॉंव ने पहले ही स्थान हथिया लिया और दूसरी डोली को अपने यहाँ स्थान नहीं दिया, जिससे रुष्ट हो करा दोनों गॉंव में कलह शुरू हो गया कि उनकी देवी का अपमान हो गया।
मैं अपने जीवन में पहली बार नंदा देवी राजजात में आया था। दिल्ली से इतनी दूर, बाण गॉंव से इतनी चढ़ाई चढ़ कर, बारिश में भीग कर रात भर ठण्ड में सिकुड़ कर,सिर्फ इस भव्य यात्रा का साक्षी होने, और मेरे जैसे हज़ारों लाखों लोग इसी उम्मीद पर उस यात्रा पर आए थे, लेकिन मेरे ही सामने मैं इस राजजात को बहुत ही बुरे मोड़ पर देख रहा था।           
मुझसे रहा नहीं गया और मैं भी बीच में कूद गया, दोनों पक्षों को समझाने के लिए, क्यूंकि बाहर के लोग मज़ाक बनाने लग गए थे, और सब तमाशा देख रहे थे, देवी का अपमान हो रहा था सो अलग। तभी किसी ने भीड़ में से मुझे धमकी दी कि मैं ज्यादा न बोलूँ ये उनका अपना मामला है और मुझे बहुत ही बुरे परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गयी। लेकिन मैं ठहरा एक जिद्दी पहाड़ी और माँ का भक्त।  मैंने कहा मुझे मार कर अगर तुम्हारा झगड़ा खत्म होता है, और ये राज जात यात्रा सफल होती है तो मार दो मुझे। लगभग २००-२५० लोगों से अकेला घिर हुआ था मैं और माँ नंदा का ही आशीर्वाद था कि मुझे इतनी हिम्मत मिली। 

मुझे बधाण गॉंव के लोग अपने शिविर के आगे ले गए घेर कर, कुछ लोग सिर्फ मरने मारने को तैयार थे और कुछ समझदार  शांति चाहते थे।  उनके जो मुख्य पुरोहित थे वो भी बाहर आ कर मुझसे जिरह करने लगे, कि उन्होंने माँ का अपमान किया है, उनके गॉंव का अपमान किया है, यहाँ तक कि सरकारी मदद भी उन्ही लोगों को मिली हमारे गॉंव के साथ सौतेला व्यवहार हुआ है। बहुत गुस्से में थे वो सभी के सभी।
मेरे साथ कुछ शिक्षक भी थे, कुछ फ़ौज से रिटायर लोग थे जो मेरी बातों को सुन रहे थे और समर्थन दे रहे थे। मैंने पंडित जी और सभी गॉंव वालों को समझाया कि उनकी नाराज़गी किस वजह से है?
पैसे नहीं मिले सरकार से इसीलिए ?देवी का अपमान हुआ इसीलिए?तुम्हारे गॉंव का अपमान हुआ इसीलिए?               
अपने ही विचारों में उलझते हुए उन्होंने कहा कि माँ का अपमान हुआ इसीलिए (क्यूंकि पैसे वाली वजह नहीं बोल सकते थे, और गाओं का अपमान देव यात्रा में कोई मायने नहीं रखता) वो नाराज़ हैं।
मैंने कहा की क्या वाकई कोई माँ का अपमान कर सकता है? क्या आप लोग लड़ झगड़ कर माँ का अपमान नहीं कर रहे हो? पंडित जी आपका काम था पूजा करना, लगातार देव आराधना करना और उसकी जगह आप हिंसा के लिए तैयार हो रहे हो? क्रोध से कैसे आप देव आराधना कर पाओगे? और आप लोग सभी गाओं वालों आप इस यात्रा में क्यों आये हो? अपनी बेटी को "माँ नंदा को" विदा करने, और वो भी ख़ुशी ख़ुशी।  क्या आप ऐसा कर रहे हो?क्या ये ही चाहते हो? क्या ऐसे में माँ भगवती प्रसन्न होंगी? इतने दूर दूर से लोग आए हैं, क्यों आये हैं?हमारी संस्कृति को देखने, पूजा करने, पूण्य कमाने। 
शाम को कुछ कार्यक्रम थे जिनमे सांस्कृतिक झलक दिखनी थी, जिसे वो लोग निरस्त कर चुके थे, लेकिन मेरे और मेरे मित्र अनूप असवाल द्वारा समझने पर वो लोग इस बात से सहमत हुए और धीरे धीरे एक दुसरे को माफ़ करते हुए  हम लोगों ने झुमेलो नृत्य शुरू किया।  

एक ब्रिगेडियर साहब थे जो की डीएम के साथ थे, उनसे मेरी चर्चा हुई और उन्होंने ही ये राय दी कि अगली बार सब देविओं के लिए निर्धारित केबिन बनाए जायेंगे सामान ऊंचाई के। लगभग २ घंटा लगा इस सब काम में।
राहत की बात ये थी कि एक बहुत बड़ा झगड़ा टल गया, और सभी लोग फिर से आनंद में आगये।
उस वक़्त मुझे जो ख़ुशी का एहसास हुआ उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। वो अप्रितम अतुलनीय था। 

बारिश में भीगते भीगते मैं और अनूप वापस अपने शिविर में अपने साथिओं के पास आगये। कुछ देर बाद हमारी साथी हमें कहने लगे की चलो वहां बहुत अच्छा झुमेलो हो रहा है, लोग कार्यक्रम कर रहे हैं गीत गा रहे हैं, चलो।
मैं और अनूप बहुत थक गए थे, हमने मुस्कुराते हुए कहा तुम जाओ तुम आनंद लो, हम तो सोते हैं।  बहुत ही अच्छी नींद आयी थी उस शाम।  और सुना वो सारे कार्यक्रम बहुत देर शाम तक चले और काफी नाम हुआ राज जात का :)
जय माँ नंदा :)
                                  - अतुल सती 'अक्स'                 
      

रविवार, 15 मई 2016

एक उलझन



दोस्तों एक उलझन है, बड़ी दुविधा में हूँ आजकल। असल में मैं और मेरी पत्नी स्वाती दोनों ही चिंतित हैं, मदद करें।
 
बात ये है कि मेरा पुत्र आरुष अब स्कूल जाने लगा है और मैं और स्वाती आजकल लिस्ट बनाने लगे हैं कि उसे क्या क्या करना चाहिए, उसे' बड़ा होकर क्या बनाएं? क्या बनायें उसे जिससे समाज में हमारी नाक ऊँची हो। भट्टों, खत्रिओं, पटवालों ,शर्मों और वर्मों के बच्चों को पछाड़ दे, हमेशा सबसे आगे रहे। सोसाइटी में हमारा नाम ऊंचा करे। मैं उसे हमारे खानदान का पहला डॉक्टर बनवाना चाहता हूँ। और स्वाति उसे आईएएस
वैसे IIT का भी एक ऑप्शन ओपन रखा है। पढ़ाई के साथ साथ उसे गाना, नाचना और खाना बनाना भी आना चाहिये।
खेल में भी उसे अव्वल आना होगा। क्रिकेट में सचिन, शतरंज में आनंद और टेनिस में पेस, "कुश्ती और बॉक्सिंग भी अच्छा ऑप्शन है बट "वो हाई सोसाइटी गेम्स नहीं हैं "। अभी तीन साल का है और सोच रहा हूँ उसकी प्रीनर्सरी के बाद उसे हॉबी सेंटर्स में भेजूँ और ट्युसन लगा दूँ। आखिर हमारी भी कुछ इच्छाएँ हैं, हम इतना सब किसके लिए करते हैं? अपने बच्चों के लिए ही तो। बदले में बस सिर्फ ये ही तो मांगते हैं कि वो कुछ अच्छा करें।  आखिर उनके भले के लिए ही तो हम ये सब सोचते हैं।
क्या कहा??? सौदा ??? न न न ये कोई सौदा थोड़े न है, माँ बाप का प्यार तो बिना मतलब का होता है, माँ पर बाप पर कवितायें नहीं पढ़ते क्या? इतना कुछ करते हैं उनके लिए,  बदले में अपने अधूरे सपने ही तो पूरा करने को कहते हैं, कौनसा पूरी ज़िन्दगी मांग रहे हैं।
तो क्या कहते हो आरुष को कोटा भेज दूँ, या प्रयाग ???



                                      

शुक्रवार, 13 मई 2016

अंतिम प्रेम पत्र - अक्स



कभी कभी नितांत अकेले में,
कुछ बीती यादों के अँधेरे में,
जब तुमको खोजा  करता हूँ,
जल जल कर मैं,तेरी यादों में,    
खुद को उजला उजला करता हूँ,
तो तब,
तुम दिखती हो मुझे,
मेरी नायिका,
ठीक वैसी ही,
जैसी तुम हो मेरे मन में,
जैसे तुम तब थी,
जब आखिरी बार मिले थे,
हम उपवन में,   
वो ही,   
चंचल मन,
सुकोमल तन,
उभरे कसे उभार,
चमकते नयन,
और तपता यौवन!!!
फिर आता है एक प्रश्न,
क्या अब भी तुम वैसी ही होगी?
दशकों बाद आज भी क्या,
तुम संग होगा वो चंचल यौवन?
या,
या फिर जैसे ढलता है सूरज,
और होती है कुछ काम अगन,
वैसा ही क्या आज प्रिये !!!    
ढल गया होगा तेरा तन?
पके बालों से कुछ पकी पकी सी,
बच्चों के चिल्ल पों से,
कुछ थकी थकी सी,
घर गृहस्थी में उलझा जीवन,
ढला ढला सा होगा हर ढाल,
सूखे कमल से होंगे नयन,
न उभरा कोई उभार,
इसी पर तो नाज़ था तुमको,
प्रिय था बस तन और धन,
और इसी के लिए,
छोड़ दिया,
तोड़ दिया,
प्रेम भरा मेरा कोमल मन।              
तुमको भी तो तन्हाई मिलती होगी,
कभी तो यादों से भरी नदी,
भूले भटके ही सही,
कहीं मिलती होगी?
कभी तो भीगती होगी उस नदी में तुम भी,
कभी तो खुद से कुछ कहती होगी?
तुम भी तो कुछ कहना चाहती होगी?
जो समझा मैं नासमझ बन कर,
कुछ मुझको तो समझाना चाहती होगी?
किस तरह तन्हा रह कर,
मेरे बिन पर सबके संग,
काटा है तुमने जीवन,
वो सारे खट्टे मीठे पलों की कहानी,
तुम भी तो सुनाना चाहती होगी। 
यूँ तो मैं भी अब थक चुका हूँ,
सब रिश्ते नाते निभाते निभाते,
अपने बुढ़ापे से पक चुका हूँ।
माफ़ किया मैंने अब तुमको,
अब तुमसे माफ़ी चाहता हूँ,   
बहुत कुछ है मन के भीतर,
तुमसे कहना चाहता हूँ। 
तुम्हारी बातों को फिर से सुनकर,
अपना खालीपन भरना चाहता हूँ। 
इस धीमी धीमी गुजरती ज़िन्दगी में,  
आज भी मैं, 
कभी कभी नितांत अकेले में,
कुछ बीती यादों के अँधेरे में,
जब तुमको खोजा  करता हूँ,
जल जल कर मैं,तेरी यादों में,
खुद को उजला उजला करता हूँ। 
            - अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 5 मई 2016

तमन्नाओं का क़त्ल


मुफलिसी की कलाई मरोड़ते हुए,
महँगाई के कोठे को छोड़ते हुए।     

एक अदद मकान की खातिर,
पुरखों के घर को तोड़ते हुए।       

बच्चों की खातिर माँ बाप को,
कतरा कतरा लहू जोड़ते हुए।    

औरों के जीने को अन्न उगा कर,
कर्ज का कफ़न ओढ़ते हुए।  
   
'अक्स' ने देखा है तमन्नाओं को,
जरूरतों के आगे दम तोड़ते हुए।
                     - अतुल सती 'अक्स'



बुधवार, 4 मई 2016

मेरी कहानी

रोज ही,
जरूरतों के हाथों,
बेआबरू होती है,
इसकदर,
के दम तोड़ देती हैं,
तमन्नायें,
भटक भटक कर,
दर-ब-दर।    
किश्तों के लिए जीता हूँ,
या किश्तों में जीता हूँ?
थक गया,
सोच सोच कर। 
बस चार दीवारों,
और एक छत की खातिर,
खुद को दाँव लगा,
बनाना है घर। 
जरूरतों के बाज़ारों में,
खड़े हैं लुटेरे,
लूटने को,बेसबर।
बड़ी ही डरी डरी,
सहमी सहमी सी आती है,
तनख्वाह मेरी, मेरे  घर। 
         - अतुल सती 'अक्स'           

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

कभी कभी सोच्दुं-the mountains are calling. we must go... - anantnaad

the mountains are calling. we must go...


भी कभी सोच्दु मैं  एक्लू बैठी की, ये देश मा,
जख सब्बि धाणी नकली च असली का भेष मा,
दुई टका कमाणा का खातिर यख मैं भटक्णु  छौं,
अग्ने भगणे  की दौड़ मा,सब्बु तें पिछने छोडणू छौं।
क्या अब भी मेरु गौं, वनि रौतेलू होलू?
क्या अब भी वख डण्डिओं मा सोनू सी घाम आन्दु होलू?
क्या अब भी वख घूगूती घुरोंदी होली?
क्या अब भी वख चखुली प्रेम गीत गोन्दी होली?        
     
कभी कभी सोच्दुं छौं मी। - ४  

गब्बू मामा का वू रामलीला का पाठ,
वू मेरा ममाकोट का अपरा ठाट बाट,
ठुल्लू पुन्ग्डू मा रोपणी का दिन,
सौण  भादों का वु खुदेड़ दिन।   
     
क्या अब भी नेल मा ठण्डु पाणी औंदु होलू?
क्या अब भी वख डाँडो मा क्वी बांसुरी बजोंदु होलू ?
क्या अब भी वख पनेरी पंदेरा औंदी होली?
क्या अब भी वख रामें - पंडों लीला होंदी होली?   
कभी कभी सोच्दुं छौं मी। - ४  

भी कभी सोच्दु मी एक्लू बैठी की ये देश मा,
क्या पाई क्या खोई मिन  ये परदेश मा,
दिन रात अपरा गों की याद मा रोंदू  छौं मी ।
त्वे,मेरा मुल्क,मेरा पाड़, याद करदू छौं।
                             

कभी कभी सोच्दुं छौं मी। - ४  

                                        -अतुल सती 'अक्स'