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मंगलवार, 15 नवंबर 2016

मेरे जवाब - आपके सवाल

बेफजूल बातों से, लोगों को,बहकाता क्या है?
क्या तू खुद है,और लोगों को,बताता क्या है?

कब का बाहर,कर चुका है,तू  खुदा को,दिल से,
तो अब अज़ानो में,उसे आवाज़,लगाता क्या है?

यूँ तो भेजा था,तुझे उसने, बना के तो इंसान,
पर नाम-ए-दीन पर तू,खुद को,बनाता क्या है?

एक जावेदा सी ज़िन्दगी बक्शी है तुझको उसने,
तू इश्क छोड़,नफरत के, कांटे उगाता क्या है?

सियासत से,सरेआम क़त्ल कर,इंसानियत का,   
लाशों ढेर पर, बैठ,अब ये अश्क बहाता क्या है?

धीरे धीरे तू भी इस शहर सा बन रहा है 'अक्स',
दिल तेरा क्या कहता है और तू सुनाता क्या है?
                                      -अतुल सती 'अक्स'

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में


रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में 

रावण ब्राह्मण पुत्र था और माता रक्ष कुल की जो ब्राह्मण कुल से ब्याहता हो कर ब्राह्मण हो गयी थी, फिर भी रावण को रक्ष कहा गया। जबकि संतान हमेशा ही पितृ पक्ष कुल का प्रतिनिधित्व करती है, मेरी दृष्टि में रावण सदैव ही ब्राह्मण कुल श्रेष्ठ रहा है जो आर्य समाज के लिए सदैव चुनौती रहा और आर्य सभ्यता के अनुसार पथ भ्रष्ट हो गया था, क्योंकि रावण खुद एक आर्य पुत्र था और उसने आर्यों का साथ देने के बजाय रक्ष जाति के उत्थान के बारे में सोचा।

ठीक वैसे ही जैसे बाली और सुग्रीव जो की इंद्र-आरुणि  और सूर्य-आरुणि पुत्र होते हुए भी वानर कुल श्रेष्ठ कहलाये और वो भी आर्य नहीं थे, वानर जाति में जो बलवान होता था समूह का नेतृत्व करता था समस्त स्त्रियां उसकी दासी होती थी ये आज भी वानर जाती में होता है किन्तु ये आर्य सभ्यता के अनुरूप नहीं था इसीलिए श्री राम को क्षत्रीय धर्म को त्याग कर छिप कर बाली संहार करना पड़ा।
विभीषण भी रावण और कुम्भकरण की तरह ब्राह्मण-रक्ष पुत्र था किन्तु उसे सम्मान ब्राह्मण रूप में मिला क्योंकि उसने आर्य सभ्यता के सबसे प्रतापी राजा योद्धा श्री राम का साथ दिया किन्तु धर्म का साथ देने के पश्चात् भी उसने अधर्म किया, अपने ही अग्रज के साथ छल किया और मृत्यु द्वार तक पहुँचाया। लेकिन श्री राम का साथ देने के बाद भी आज तक किसी और का नाम विभीषण नहीं रखा गया। 

रामायण में अगर माली-सुमाली और मंथरा की बहस न हुई होती और मंथरा का क्रोध रक्ष जाति के प्रति न होता, नारद-कैकयी और मंथरा अन्य रानिओं द्वारा राम के वनवास की सुनियोजित उपक्रम न करते, देवता दंडकारण्य में अलग अलग जातियों में अपनी संतान उत्त्पन्न न करते और अगस्त्य ऋषि ने अभूतपूर्व समन्वयन का कार्य न किया होता आर्य और अनार्य जातियों के बीच, तो संभवतः रामायण कुछ अलग प्रकार की होती।       
असल में रामायण का प्रचार जितना ज्यादा अच्छाई और बुराई के युद्ध के रूप में दिखाई देता है उससे कई अधिक ये आर्य-अनार्य सभ्यताओं का युध्द था।        
                                                                        - अक्स 


सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।



काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।

मेरे ऑफिस के पास (सेक्टर ६२ नॉएडा ) रस्ते में कुछ गाय आवारा घूमती रहती हैं और लोग रुक रुक कर (पड़े लिखे अनपढ़ - आपके मेरे जैसे) गाय को घर से बचा हुआ खाना देते हैं और साथ में पॉलिथीन मुफ्त।
मैंने कई बार रुक कर पॉलिथीन उठा कर उन सज्जनों को वापस देता हूँ, पॉलिथीन उठाने को कहता हूँ, वो लोग हाँ तो कहते हैं पर खुद नहीं उठाते तो खुद ही उठा कर उन्हें देता हूँ और पूछता हूँ की पूण्य कमाने के चक्कर में कहीं पाप तो नहीं कमा रहे? गाय को पॉलिथीन भी खिला रहे हो और सड़क पर कचरा भी फैला रहे हो ???
कुछ लोग तो रोटी ऐसे फेंक कर जाते हैं जैसे उस रोटी की कोई वैल्यू ही न हो, न किसी ने कोई मेहनत की उसे उगाने में, न ही किसी ने पीसने में आपके घर तक लाने में, और शायद जो फेंक रहा है उसने भी पैसा कमाने में कोई मेहनत नहीं की।
सब बड़े ही खतरनाक ढंग से घूरते हैं मुझे और फिर वो पॉलिथीन लेते हैं, लेकिन आज तो हद्द ही हो गयी, आज वाले आदमी ने भागने की कोशिश की लेकिन गायों ने रास्ता रोक रखा था ,आज मेरे साथ मेरा दोस्त अनूप Anoop Aswal भी था, अनूप को अपना स्कूटर पकड़ा कर मैंने उस आदमी को उसकी पन्नी पकड़ाई ,उसने ले लिया लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो पन्नी फेंक दी वहीँ सड़क पर और भाग गया।
असल में हमारा बेसिक ही गलत है :( शिक्षा तंत्र की नाकामी से ज्यादा हमारे संस्कारों की नाकामी है, सभ्यता संस्कृति और प्रकृति का समन्वयन हम नहीं कर पाते।
(इन सब लोगों के गले में लगे पट्टों से पता चलता है कि ये बी.टेक्, एम बी ए प्रजाति के हैं और किसी बहुदेशीय कंपनी के पालतू हैं।)
कैसे लोग हैं ये ??? कौन हैं ये???
कहीं आप तो नहीं हैं न?

https://atulsati.blogspot.in/2016/10/blog-post.html

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

ज़िन्दगी तेरा तजुर्बा और तेरा तर्जुमा !!!


मैं अपना समझ, 
कुछ कह रहा था, 
वो मेरा तजुर्बा था।   
तुम जो समझ कर,
खफा हुए 'अक्स',
वो मेरी बात का,
गलत तर्जुमा था। 
कुछ तो तर्जुमा ही,
गलत हो गया,
और कुछ तजुर्बा ही,
गलत हो गया। 
ज़िन्दगी तेरा तजुर्बा,
और तेरा तर्जुमा,
उफ़्फ़!!!
सही हुआ या गलत,
पर जो भी हुआ,
हो ही गया।    
     
                                      - अतुल सती 'अक्स'  

बुधवार, 28 सितंबर 2016

तसल्ली

कभी कभी बस यूँ ही, 
तुमको देखता हूँ, 
तो ,
बड़ी तसल्ली  सी होती है। 
गोया, रूह ,जिस्म से रुखसत होने ही लगी थी,
 कि तुम आ गयी। 
रुह,
कुछ देर और रुक गयी,
 इस जिस्म में,
खैर! एक न एक दिन तो,
 जाएगी ही 'अक्स',

पर तुमको देख बड़ा सुकून,
 नसीब हुआ मुझे। 
आज भी जब कभी,
तुमको देखता हूँ ,
तो ,
बड़ी तसल्ली सी होती है।

जैसे, कभी भीड़ में,
 कहीं खो जाता है कोई बच्चा,
और निगाहें तलाशने लगती हैं, 
किसी अपने को, 
रात काली है,
घुप्प अँधेरा है,
शोर है,भीड़ है। 
बदहवासी का सा माहौल है और तभी,
 तुम दिखाई दी ,
मेरी ओर आती, बाहें फैलाये,
मुझे पुकारती, 
जब तुम्हे देखा तो बड़ी राहत सी हुई। 
आज भी जब कभी,
तुमको देखता हूँ तो बड़ी तसल्ली सी होती है। 


सोमवार, 26 सितंबर 2016

आज

एक दूजे से,

दूर रहकर,

किसी और के,

हमदम बन कर,

आज,

जिन्दा तू भी है,

जिन्दा मैं भी हूँ।


झूठे इश्क को,

सच्चा कहकर,

फिर झूठी,

सारी कसमें खाकर,

आज,

शर्मिंदा तू भी है,

शर्मिंदा मैं भी हूँ।

                               - अतुल सती 'अक्स'     


सोमवार, 12 सितंबर 2016

यकीन कर

सब ठीक हो जायेगा सच्ची !!!
यकीन कर।  
मैं माफ़ करता हूँ तुझको उन सब की ओर से जो तुझसे नाराज़ हैं,
अब तू भी मुझे माफ़ कर दे, वो समझ कर जिससे तू नाराज़ है। 
कल जो था वो आज तक नहीं टिक पाया,
और ये आज भी कल तक गुजर जायेगा,
इसीलिए तो कह रहा हूँ,
अगर तू पढ़ पा रहा है इस बात को,
तो यकीन कर,
ये तेरे लिए ही है,
सच्ची,
आँख बंद कर और यकीन कर,     
सब ठीक हो जायेगा सच्ची !!!
यकीन कर।  
       
                    - अक्स 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

लोग


बिजां देर तक मी देखदु रयुं वे ढुंगु ते 'अक्स'
जे ते देबता बुन्ना छां लोग, पूजणा छां लोग। 
नौ भी नि पता वे कु कई सणें, कि कु होलु वू,
फेर भी मने शांति ते खोजणा छां वे मा लोग। 
सेली पड़ी जिकुड़ी मा जब देखि मिन अफ्फु ते,
अपरा ही मन का घोर मा टंग्यां सीसा मा, 
पता नि ,
अफ्फु ते बिसरी की वे ढुंगु मा क्या खोजणा छां लोग। 


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बहुत देर तक मैं देखता रहा उस पथ्थर को 'अक्स'
जिसे देवता कह रहे थे लोग, पूज रहे थे लोग। 
नाम भी नहीं पता था कई को कि कौन होगा वो, 
फिर भी उसी में मन की शांति खोज रहे थे लोग।
मन को बहुत शांति मिली जब मैंने खुद को देखा,
अपने ही मन के घर में टंगे शीशे में,
पता नहीं,
खुद को भूला कर उस पत्थर में क्या खोज रहे थे लोग। 

सोमवार, 5 सितंबर 2016

माँ हे माँ मेरी !!!



माँ हे, माँ मेरी !!! 
खुद लगी च तेरी। 
खुखली मा अपरी,
फिर मैते सुले दे,
घघूती बसूदी खिले दे। 

यख त, जीवन मा, सब धणी अलझी गे,
नातों का, धगुलों मा, यख कण गेड़ पड़ी गे,
तू फिर से गेड़ खोली की ,
सब धणी सुलझे दे।        

ई दुनिया, की बथ, मेरा समझ नि आंदी,   
लाटे की, सार बल, लाटे की ब्वेही  जणदी,
तू फिर मैते गौला भेटेकी,
सब धणी बिंगैदे।   

यख त जीवन मा, सब धणी फूकेगे,
ये खारन, तन मन सब तातु करीली,
तू फिर फूँक मारिकी,
सब धणी ठण्डु करदे।     

माँ  हे माँ मेरी !!! 
एक बार फिर मैते,
घघूती बसूदी खिले दे,
खुखली मा अपरी,
मैते फिर से सुले दे।