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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

इश्क

इश्क में,
सजा भी है, 
और, 
इसका इक
मजा भी है।

सुरूर है,
गुरूर है
इश्क़ में,
तेरे,
'अक्स',
जरूर है,
जरूर है।

निगाह में,
तेरी हैं,
सनम,
बला बला की,
शोखियां।

देखती हैं,
जब मुझे,
गिराती हैं,
ये,
बिजलियाँ।

के बस,
तुझे ही
देख के,
मेरी,
सुबह औ,
शाम हो।

तेरी ही,
मस्त,
निगाह से,
मेरे,
इश्क का,
हर जाम हो।

अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

परिवार को बचाइये

अरे !!! हम शरमाते हैं,
पर,
जनसँख्या खूब बढ़ाते हैं।

अरे !!! हम लिहाज करते हैं,
और,
खुद को लाइलाज करते हैं।

अरे !!! महंगाई ने कमर तोड़ दी,
और,
छठे बच्चे के वक़्त, उसने दुनिया छोड़ दी।

अरे !!! ये शिक्षा हमारी संस्कृति नहीं,
तो,
खुजराहो, कामसूत्र क्या हमारी कृति नहीं?

अरे !!! तो क्या करूँ? 
कैसे करूँ? 
कुछ तो सुझाईये !!!
......तो आप,
मत शर्माइये, 
कहते जाइये, 
सुनते जाइये।
एड्स, यौन रोग, 
असुरक्षा से सबको बचाइये।
बड़े, छोटे, 
सब को बात खुल कर बताइये।
कंडोम लगाइये, 
परिवार को बचाइये।
                      - अतुल सती 'अक्स'

बुधवार, 30 नवंबर 2016

बोलो कौन ?

अफरातफरी बदहवासी में, 
वो कह रहे हैं कि हम शांति चाहते हैं,
जो खुद ही दंगे करा रहे हैं। 

दुश्मन छाती पर चढ़ आया है, 
वो कह रहे हैं मुहँतोड़ जवाब दिया जायेगा,
जो असल में मुहँ छुपा रहे हैं।

स्त्री सशक्तिकरण होगा,
वो कह रहे हैं स्त्री सम्मान सर्वोपर्रि है,
जो शहर में कोठे चला रहे हैं। 

देश फिर होगा सोने की चिड़िया,
वो कह रहें हैं गरीबी, बेरोजगारी मिटाएँगे, 
जो विदेशी खाते छुपा रहे हैं। 
                    - अतुल सती 'अक्स'

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अखबार

आज सुबह एक ख्वाब में,
मैं पढ़ रहा था कुछ खबर,
आज ही के अखबार में। 

खबर तरक्की की,
खबर खुशहाली की,
आज कहीं डाका न पड़ा,
आज कहीं कोई न मरा,
न कहीं कोई कोई बहु जली,
न ही कहीं कोई शहीद हुआ,

हँसते हुए इंसानों के चेहरे,
न हिन्दू और न मुसलमानों के चेहरे,
खेत खलिहानों के सुंदर रंग,
पहाड़ों जंगलों समुंदरों की उमंग,
नहीं आज कोई सड़क पर मरा,
न ही कोई ठण्ड से अकड़ कर मरा,
बिना स्मोग के, गुनगुनी धूप में,
कभी ठंडी बयारों के रूप में,
           
आज सुबह एक ख्वाब में,
मैं पढ़ रहा था कुछ खबर,
आज ही के अखबार में। 
          
नहीं तो हमेशा दुर्गंध ही थी आती,
कूड़े के जलने की,
बहुओं के जलने की,
खून से लिपटा आता था,
हर रोज़,
मेरे घर अख़बार आता था,
हर रोज,
शहीदों की ख़बरों से पटा हुआ ,
अस्मतों की लूट से लिपटा हुआ,
डरा डरा खुद और मुझको डराता हुआ,
हर रोज़।   
वही खबरें पढ़ो बार बार, 
पढ़ो !!! डरो !!! मरो !!!
हर रोज। 

जब भी खोलता था मैं,
अख़बार,
बेहिसाब चीखता,
सिसकता वो,
लगातार,
कहीं कोई मरा,
रोता बिलखता,
परिवार,
कहीं नेता चोरी करते पकड़ा,
कहीं कोई चोर नेता बनके निकला,
पहनता हार, 
बाबा जी के चमत्कार, 
बाजार से किसानों की हार,
लहू से भीगी,
सूखें खेतों की,
कातर पुकार,
कान फटने लगते थे,
सुन सुन के ये ख़बरें,
हर रोज, 
लगातार,  
बार बार। 

हर बार हर रोज ख्वाब में,
हर रोज के इस डरावने एहसास में,
बेतरतीब दुनिया के,
बेतरतीब खाव्ब में,  
आज आया कुछ सुकून,    
जब,  
आज सुबह एक ख्वाब में,
मैं पढ़ रहा था कुछ खबर,
आज ही के अखबार में।           
  
पर तभी नींद टूटी,
सुनके अखबार  घंटी,
ख्वाब कहीं हक़ीक़त तो नहीं हुआ?
ये सोच कर, अखबार खोल लिया,
के तभी  कुछ बूँद लहु की टपकी फिर आज,
फिर वही चींखें, वही ख़ामोशी,
फिर वही लाश जलने की गंध,
लूट खसोट हत्या की दुर्गन्ध, 
फिर वही आँसुओं की कहानी,
कोड़ियों के दाम बिकती जवानी,
फिर हो गया मासूम बच्ची का बलात्कार,
फाड़ के, जला के, राख मिटटी में दबा के,
दफ़न कर दिया मैंने वो बाजार,
जो लाता था मनहूसियत मेरे घर,
कहते हो जिसे तुम अखबार। 

कुछ भी नहीं बदला,
आज के समाचार में,
झूठ निकला सबकुछ,
जो भी, 
आज सुबह एक ख्वाब में,
मैं पढ़ रहा था कुछ खबर,
आज ही के अखबार में।       
                    

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

किले नि होन्दु?


थक गयूं मी यखुलि रै रै की, क्वी चमत्कार किले नि होन्दु?
रोज सुबेर, मी बीजी त जांदू छौं, पर मी ज़िंदू किले नि होन्दु?

अपणो का दियां दर्द मा जी जी कर, अब यन आदत हुएगी मैते,
अब जब कोई बिराणू दर्द भी देन्दुं च, त दर्द किले नि होन्दु ?

मेरा भीतर अब भी कोई ज़िंदू छैं त च, पर मी अब ज़िंदू नि छौं,     
वैध जी नाड़ी टटोली की सोचणा छाँ कि मी ज़िंदू किले नि होन्दु?         

सरी उम्र ब्याज मा ब्याज ही देण लग्युं च मी,तेरी माया का कर्जा मा,  
मी खुद खत्म हुएगी, पर तेरु यु माया कु कर्ज़ खत्म किले नि होन्दु?   
     
यु समाज च जज ,मेरा आँसू छन गवाह,अर दिल च मेरु वकील,
मिन हार जाण यु मुकदमा 'अक्स', यु रफा दफा किले नि होन्दु?
                                                               -अतुल सती  'अक्स'

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

काश!!!

काश!!! दूसरों की बेमानी पर, 
हम जान कर अन्जान न होते।
माना कि सब ईमानदार नहीं हैं,
पर अगर ये कुछ बेईमान न होते,
तो हम यूँ कतारों में लगे लगे,
हैरान न होते,यूँ परेशान न होते।

काश!!! दूसरों की बेमानी पर, 
हम जान कर अन्जान न होते।

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

मेरे जवाब - आपके सवाल

बेफजूल बातों से, लोगों को,बहकाता क्या है?
क्या तू खुद है,और लोगों को,बताता क्या है?

कब का बाहर,कर चुका है,तू  खुदा को,दिल से,
तो अब अज़ानो में,उसे आवाज़,लगाता क्या है?

यूँ तो भेजा था,तुझे उसने, बना के तो इंसान,
पर नाम-ए-दीन पर तू,खुद को,बनाता क्या है?

एक जावेदा सी ज़िन्दगी बक्शी है तुझको उसने,
तू इश्क छोड़,नफरत के, कांटे उगाता क्या है?

सियासत से,सरेआम क़त्ल कर,इंसानियत का,   
लाशों ढेर पर, बैठ,अब ये अश्क बहाता क्या है?

धीरे धीरे तू भी इस शहर सा बन रहा है 'अक्स',
दिल तेरा क्या कहता है और तू सुनाता क्या है?
                                      -अतुल सती 'अक्स'

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में


रामायण काल के घटनाक्रम: मेरी दृष्टि में 

रावण ब्राह्मण पुत्र था और माता रक्ष कुल की जो ब्राह्मण कुल से ब्याहता हो कर ब्राह्मण हो गयी थी, फिर भी रावण को रक्ष कहा गया। जबकि संतान हमेशा ही पितृ पक्ष कुल का प्रतिनिधित्व करती है, मेरी दृष्टि में रावण सदैव ही ब्राह्मण कुल श्रेष्ठ रहा है जो आर्य समाज के लिए सदैव चुनौती रहा और आर्य सभ्यता के अनुसार पथ भ्रष्ट हो गया था, क्योंकि रावण खुद एक आर्य पुत्र था और उसने आर्यों का साथ देने के बजाय रक्ष जाति के उत्थान के बारे में सोचा।

ठीक वैसे ही जैसे बाली और सुग्रीव जो की इंद्र-आरुणि  और सूर्य-आरुणि पुत्र होते हुए भी वानर कुल श्रेष्ठ कहलाये और वो भी आर्य नहीं थे, वानर जाति में जो बलवान होता था समूह का नेतृत्व करता था समस्त स्त्रियां उसकी दासी होती थी ये आज भी वानर जाती में होता है किन्तु ये आर्य सभ्यता के अनुरूप नहीं था इसीलिए श्री राम को क्षत्रीय धर्म को त्याग कर छिप कर बाली संहार करना पड़ा।
विभीषण भी रावण और कुम्भकरण की तरह ब्राह्मण-रक्ष पुत्र था किन्तु उसे सम्मान ब्राह्मण रूप में मिला क्योंकि उसने आर्य सभ्यता के सबसे प्रतापी राजा योद्धा श्री राम का साथ दिया किन्तु धर्म का साथ देने के पश्चात् भी उसने अधर्म किया, अपने ही अग्रज के साथ छल किया और मृत्यु द्वार तक पहुँचाया। लेकिन श्री राम का साथ देने के बाद भी आज तक किसी और का नाम विभीषण नहीं रखा गया। 

रामायण में अगर माली-सुमाली और मंथरा की बहस न हुई होती और मंथरा का क्रोध रक्ष जाति के प्रति न होता, नारद-कैकयी और मंथरा अन्य रानिओं द्वारा राम के वनवास की सुनियोजित उपक्रम न करते, देवता दंडकारण्य में अलग अलग जातियों में अपनी संतान उत्त्पन्न न करते और अगस्त्य ऋषि ने अभूतपूर्व समन्वयन का कार्य न किया होता आर्य और अनार्य जातियों के बीच, तो संभवतः रामायण कुछ अलग प्रकार की होती।       
असल में रामायण का प्रचार जितना ज्यादा अच्छाई और बुराई के युद्ध के रूप में दिखाई देता है उससे कई अधिक ये आर्य-अनार्य सभ्यताओं का युध्द था।        
                                                                        - अक्स 


सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।



काश!!! पढ़ लिख कर कोई समझदार हो पाता।

मेरे ऑफिस के पास (सेक्टर ६२ नॉएडा ) रस्ते में कुछ गाय आवारा घूमती रहती हैं और लोग रुक रुक कर (पड़े लिखे अनपढ़ - आपके मेरे जैसे) गाय को घर से बचा हुआ खाना देते हैं और साथ में पॉलिथीन मुफ्त।
मैंने कई बार रुक कर पॉलिथीन उठा कर उन सज्जनों को वापस देता हूँ, पॉलिथीन उठाने को कहता हूँ, वो लोग हाँ तो कहते हैं पर खुद नहीं उठाते तो खुद ही उठा कर उन्हें देता हूँ और पूछता हूँ की पूण्य कमाने के चक्कर में कहीं पाप तो नहीं कमा रहे? गाय को पॉलिथीन भी खिला रहे हो और सड़क पर कचरा भी फैला रहे हो ???
कुछ लोग तो रोटी ऐसे फेंक कर जाते हैं जैसे उस रोटी की कोई वैल्यू ही न हो, न किसी ने कोई मेहनत की उसे उगाने में, न ही किसी ने पीसने में आपके घर तक लाने में, और शायद जो फेंक रहा है उसने भी पैसा कमाने में कोई मेहनत नहीं की।
सब बड़े ही खतरनाक ढंग से घूरते हैं मुझे और फिर वो पॉलिथीन लेते हैं, लेकिन आज तो हद्द ही हो गयी, आज वाले आदमी ने भागने की कोशिश की लेकिन गायों ने रास्ता रोक रखा था ,आज मेरे साथ मेरा दोस्त अनूप Anoop Aswal भी था, अनूप को अपना स्कूटर पकड़ा कर मैंने उस आदमी को उसकी पन्नी पकड़ाई ,उसने ले लिया लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो पन्नी फेंक दी वहीँ सड़क पर और भाग गया।
असल में हमारा बेसिक ही गलत है :( शिक्षा तंत्र की नाकामी से ज्यादा हमारे संस्कारों की नाकामी है, सभ्यता संस्कृति और प्रकृति का समन्वयन हम नहीं कर पाते।
(इन सब लोगों के गले में लगे पट्टों से पता चलता है कि ये बी.टेक्, एम बी ए प्रजाति के हैं और किसी बहुदेशीय कंपनी के पालतू हैं।)
कैसे लोग हैं ये ??? कौन हैं ये???
कहीं आप तो नहीं हैं न?

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