अभी तक इस ब्लॉग को देखने वालों की संख्या: इनमे से एक आप हैं। धन्यवाद आपका।

यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, 27 मई 2015

लघु कथा 2: मानव सभ्यताएं और उसकी मान्यताएं

---------मानव सभ्यताएं और उसकी मान्यताएं----------

प्रथम घटना:(कुछ साल पहले, अार्यवृत देश के एक छोटे से गाँव में)
-----------------------------------------------------------------------------------
एक गाँव था जहाँ १० लोग रहते थे। उस गाँव में एक पेड़ था। उन १० में से १ व्यक्ति ने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की तो अचानक से बिजली कड़की और बहुत तेज़ बारिश होने लगी। उनके जीवन में पहली बार बारिश हो रही थी।  बारिश के दौरान ही बाकी ९ लोगों ने उस व्यक्ति को मारना शुरू कर दिया जो पेड़ पर चढ़ा था। और कुछ देर बाद बारिश रुक गयी। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या? क्यों बारिश हुई? क्यों रुक गयी? उस आदमी को इसीलिए मार क्यूंकि सिर्फ वही वो काम कर रहा था जो कि बाकी ९ लोगों से अलग था।

द्वितीय घटना:
--------------------
अब एक दिन एक और व्यक्ति ने उस पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की। उसको चढ़ता देख प्रथम प्रयास करने वाले व्यक्ति ने जो कि तब से खुन्नस खाया हुआ था उसे धर दबोचा और मारने लगा उसकी देखा देखी बाकी लोग भी उसको मारने लगे।  उन्हें डर था की कहीं इस बार भी बिजली न कड़के और कहीं बारिश ना हो।

तृतीय- दशम घटना:
-------------------------
इस तरह से हर बार जब भी कोई पेड़ पर चढ़ने की कोशिह्स करता तो सब के सब मिल कर पेड़ पर चढ़ने वाले को धर दबोचते और बहुत ही बुरी तरह पिटाई करते। मजेदार बात ये थी कि हर कोई एक बार प्रयास जरूर करता था पेड़ पर चढ़ने की। लेकिन मार भी जरूर खाता था। उनका ये मानना था कि पेड़ पर चढ़ने से बिजली कड़कती है और बारिश होती है।

एकादश घटना:
-------------------
अब एक व्यक्ति वो गाँव छोड़ के चला गया लेकिन एक नया व्यक्ति किसी और गाँव से उस व्यक्ति की जगह आया।  उसके लिए ये गाँव एकदम नया था।  उसने वो पेड़ देखा और उस पर चढ़ने ज्यूँ ही कोशिश की उन ९ बचे हुए लोगों ने उसे पीट डाला।
एक दिन एक और पुराना आदमी गाँव छोड़ गया और उसकी जगह फिर से एक नया आदमी गाँव में आया।  उसने भी पेड़ पर चढ़ने का प्रयत्न किया और उससे पहले आये नए व्यक्ति समेत बाकी सबने उसे भी धुन दिया।

ये सिलसिला चलता रहा और एक दिन ऐसा आया जब सारे पुराने लोग गाँव छोड़ कर जा चुके थे और उनकी जगह सब के सब नए लोग थे। ये सब नए लोग हर उस व्यक्ति को पीटते थे जो पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करता था बावजूद इसके कि ये लोग कभी भी उस बारिश का हिस्सा नहीं थे जो कि पहली बार आयी थी।
पहले १० लोगों ने कभी भी इन नए १० लोगों में से किसी को कभी भी नहीं बताया कि वो क्यों पेड़ में चढ़ने वाले व्यक्ति को मारते थे और न ही इन १० लोगों ने कभी इस बात को जानने का प्रयास ही किया कि वो भी क्यों मारते थे एक दुसरे को।

आज उस गाँव में २ हज़ार से ज्यादा लोग हैं और सबके सब किसी को भी उस पेड़ पर नहीं चढ़ने देते हैं और सबके सब मार खाए हुए हैं लेकिन कारण किसी को नहीं मालूम कि क्यों? बस भेद चाल पर देखा देखि पीट डालते थे उस व्यक्ति को जो पेड़ पर चढ़ने की कोशिह्स करता था।

बस मान्यताएं हैं धारणाएं हैं।  कुछ ऐसा ही है मानव। अपनी दुनिया वो जैसा समझे वैसा ही बनाता है।  आज उस गाँव का वो पेड़ तो गिर गया। लेकिन उसके बगल में उगे उस जंगल में जितने भी पेड़ हैं उस गाँव के लोग उन पेड़ों पर भी कभी नहीं चढ़ते।
क्यों???????कारण किसी को भी नहीं पता।
क्या आपको पता है????
       

-अतुल सती 'अक्स'


नोट:- (अमेरिका में बंदरों पर हुए एक प्रयोग जिससे पता चला कि हम इंसान कैसे कुछ मान्यताओं को मानते हैं, से प्रेरित)

लघु कथा 1: "रुई का बोझ" -अतुल सती 'अक्स'


"हमने कह दिया तो कह दिया, हम तुम्हारे साथ दिल्ली शिफ्ट नहीं हो सकते। अब इस उम्र में कहाँ हमसे वहां एडजस्ट हो पायेगा?"
अवधेश जी की कांपती आवाज़ में रुआसापन साफ़ झलक रहा था। क्रोध और मजबूरी की मिश्रित भावना उनकी आवाज़ में घुली हुई थी।    

"हमने अपनी सारी ज़िन्दगी यहीं, इसी शहर में गुजारी है। यहाँ हम सबको जानते हैं, सब हमको जानते हैं। वहां दिल्ली में तो हम किसी को जानते भी नहीं …."
कुछ देर चुप रहने के बाद अवधेश जी अपने बेटे राकेश से  बोले "तुम और बहू तो ऑफिस चले जाओगे, हम तो वहां भी अकेले ही रह जायेंगे।"

कमरे में एकदम सन्नाटा पसर गया था। बेटा राकेश, बहू  सुनंदा एकदम खामोश हो गए थे।  ये दोनों के दोनों अवधेश जी के रिटाएर होने के बाद उन्हें और पत्नी सीता को लेने आये थे।    

"वैसे भी पिछले १५ सालों से हम दोनों अकेले ही तो थे। पहले तुम पढ़ाई करने घर से बाहर चले गए, फिर नौकरी के लिए।  और अब तो शादी कर के तुम वहीँ बस गए हो। जब से तुमने अपने लिए  फ्लैट और कार ली है, और जब से तुम माँ बाप बने हो, तभी से तुम दोनों मेरे रिटाएर होने के बाद हम दोनों को अपने साथ रखने और पुरखों की जमीन और घर को  बेचने की जिद्द लिए बैठे हो।"  बहुत बड़ी बात बोल दी थी अवधेश जी ने।  राकेश और सुनंदा नज़रें झुकाए खड़े थे।

"नहीं पिताजी!!! आप और माँ ये मत समझना की हम आपको सिर्फ मुन्ना की देख रेख के लिए ले जा रहे हैं और यहाँ की जमीन और ये घर बेच कर लोन चुकाना चाहते हैं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बल्कि हम दोनों को तो आपकी बहुत चिंता होती है, आप लोग हमारे आँखों के सामने रहेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।"   - राकेश ने घबरहट के साथ बात को सँभालने की कोशिश की।

माँ और पिता जी की आँखों में दुःख और गुस्से से लबरेज़ सवालों को देख कर राकेश जान गया था कि उसने 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाली बात कर दी है।

"बेटा !!! माँ बाप जब तक समर्थ होते हैं और कमा रहे होते हैं हैं तब तक वो सूखी रुई की तरह लगते हैं, मुलायम,गद्देदार और हल्के। लेकिन जब वो बूड़े, असमर्थ और रिटाएर हो जाते हैं तो वो ही रुई, भीगी हुई लगती है, चिपचिपी,गीली और बहुत भारी। ऐसी रुई का बोझ तुमसे न उठाया जाएगा …. तुमसे न उठाया जाएगा"
                                                                       -अतुल सती 'अक्स' 

माँ बाप: आजकल

निकल आते हैं जब पर परिंदों के, तो वो तो उड़ जाते हैं,
पाल पोस कर बड़ा करने वाले अक्सर तन्हा रह जाते हैं। 

बड़ी शिद्दत से, बड़ी उम्मीद से बनाते हैं वो जो घोंसला,
 बच्चे बड़े होते हैं, तो वो घर अजीब वीराने में ढल जाते हैं।

खून पसीने से जो बनाते हैं, बसाते हैं, सजाते है, घर को,
              वो जब बुजुर्ग हो जाते हैं तब वो घर के कोने बन जाते हैं।          

कभी फैला रहता था खुशिओं का आँचल पूरे ही घर में,
बच्चे बड़े होते हैं तो घर में ही कुछ और घर बन जाते हैं। 

बच्चों को सहारा देने को, हमेशा हाथ दिया,छड़ी नहीं दी,
      वो हाथ बूढ़े होते हैं,तो सब सहारे छड़ी तक ही थम जाते हैं     
   
अपने बच्चों को पाला, अब बच्चों के बच्चों को पालते हैं,
माँ बाप जब दादा दादी होते हैं 'अक्स',नौकर बन जाते हैं।
                      -अतुल सती 'अक्स' 

मंगलवार, 5 मई 2015

तुम और बुराँश का फूल


तुमको जब भी देखता हूँ तो कुछ याद आता है,    
याद आता है मेरे गाँव में खिलने वाला वो एक फूल,
जो एक दम तेरे होंठों के जैसा कोमल है,
जिसे लोग कहते हैं बुराँस। 
जैसी ठंडी जगह पर ये उगता है,
कुछ वैसी ही ठंडक मिलती है,
तुमसे जब भी मिलता हूँ मैं। 
बुराँस के वन की ऊँचाई तक,
तुम मेरे प्रेम को उड़ा के ले चलती हो,
और सबसे ऊंचे बुराँस के दरख्त पर,
उसकी सबसे ऊंची शाख पर, 
जो अनछुआ सा फूल,    
जो तेरी ही तरह मुस्काता है,
वही बुराँश का फूल मुझे लगती हो,
और जब मैं भटक रहा होता हूँ,
यूँ ही तनहा पहाड़ों में,
तेरी याद लिए हुए,
तब,
हाँ तब मेरी प्रेयसी,      
वो बुराँश मुझे तेरी याद दिलाता है। 
तेरे होंठो के रस सा रसीला,
मीठा तो कुछ खट्टा,
चखता हूँ जब इसकी पँखुडिओं को,
तो ताजा हो जाता है वो पहला एहसास,
के जब तुमने लबों से लबों को छुआ था,
और मेरे इज़हार-ए-इश्क पर,
हौले से कानों में मेरे,
अपना इकरार-ए-मुहब्बत का 'हाँ'  कहा था। 
भीनी भीनी खुशबू बुराँश के जंगल की,
एहसास करा जाती है तेरा इन पहाड़ों में,
और खो जाता हूँ मैं फिर से यादों में,
जब पहली बार तुमने मुझे छुआ था,               
और मेरे इज़हार-ए-इश्क पर,
हौले से कानों में मेरे,
अपना इकरार-ए-मुहब्बत का 'हाँ'  कहा था। 

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

तुम्हारी ये बेड़ियाँ

जितना ज्यादा बंधन किया जाता है न, 
और जितना ज्यादा कसा जाता है किसी वस्तु को,
तो दो ही बातें हो सकती हैं,
या तो वो बंधन टूट जाएगा 
और आज़ादी मिलेगी,
नहीं तो,
जिसे कसा जा रहा है न वो टूट जायेगा, 
बिखर जायेगा,
और तब भी दो ही बातें हो सकती हैं, 
या तो वो बिखर कर मृत्यु को प्राप्त होगा, 
नहीं तो जितना बिखरा है न,
उतने टुकड़ों में फिर से नया जीवन आएगा, 
और तब,
हाँ तब तुम्हारी ये बेड़ियाँ कम,
बहुत कम पड़ जाएँगी,
किसी को फिर से बाँधने के लिए। 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

मेरु आखिरी वखत

मैते पता च माँ मेरी, 
आज त्वेते बतौणू छौं।   
मेरा आखिरी वखत मा मिन नी रोण,
मेरा आँखोन  कोई  आंसू नी बगोण। 
मैते जथा मिली, 
जू भी मिली, 
वू भोत छौ,
दुःखे रात भी छे त सुखो घाम भी छौ। 
मिन अफ्फु ते पछाण ल्याई। 
अफ्फु ही अफ्फु ते जाण ल्याई। 
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी,
मेरा सुख, मेरा दुःख,
सब मेरी सोच मा ही छे।
मेरा हर वखत मा,
तू मेरा काख मा ही छे।    
अर आखिरी वखत रोण किले ???
ये शरीर त खारु ही छौ,
यू खारु ही हुएजालू,
पर 
मैते पता च माँ मेरी, 
आज त्वेते बतौणू छौं।   
मेरी आत्मा सदानि,
चम्म चमकती रेली। 
                 -अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आप आप , तू तू , मैं मैं !!!

सुणा  सुणा !!!
ट्रिंग ट्रिंग !!!
स्टिंग, वालों कू हुएगी स्टिंग !!!

मेरु मेरु !!! 
तेरु तेरु !!! 
गहरु, सच्चों कू झूठ बडू च गहरु !!!     

सच सच !!!
झूठ झूठ !!!
लूट, मची च यख केवल लूट !!!

पकड़ा पकड़ा !!!
चोर चोर !!!
घोर, चोरुं कु अड्डा बण्यूं च घोर !!!

बोल बोल !!!
खोल खोल !!!
पोल, खोल देन मीन सब्बि की पोल !!!

मंगलवार, 10 मार्च 2015

मेरा सच

अच्छा सुनो!!!
अगर 
कोई जन्नत न हुई?
कोई मोक्ष न हुआ तो?
कोई नरक न हुआ?
कोई क़यामत ही न हुई तो?
कोई पैगम्बर न हुआ, 
कोई अवतार न हुआ?
सब झूठ ही हुआ तो?

मरने पर जो सुना है,
वो कुछ भी न हुआ तो?
जिसकी मज़ार पर बैठे हो,
उसमे वो पीर ही न हुआ तो?
जिस पथ्थर को पूजा,
वो बस पथ्थर ही हुआ,
कोई खुदा ही न हुआ तो?
कल ये करोगे, वो करोगे?
जो कल को तुम ही न हुए,
या कोई कल ही न हुआ तो? 



आज जो है अभी जो है,
बस वही सच है,
वही सही है,
सच यही है,
वो ....... 
वो तू है,
तू ही तो वही है,
कहीं बाकी सब झूठ,
और केवल यही सच हुआ तो?  

सोमवार, 9 मार्च 2015

अजब गज़ब अनोखी होड़।


टूटम टूट फोड़म फोड़। 
दिमाग की सुन दिल को छोड़। 
दिल अपना बचा दूजे का तोड़। 
बातों को बस तोड़ मरोड़।      
अजब गज़ब अनोखी होड़। 
भागम भाग  दौड़म दौड़। 
आगे दौड़ सब पीछे छोड़। 
मौत की जीवन से है दौड़।  
या जीवन की मौत तक दौड़?
अजब गज़ब अनोखी होड़।  
अजब गज़ब अनोखी होड़।   

               -अतुल सती 'अक्स'