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मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

भैजी भुल्ला की बथ:(मोदी अर उत्तराखंड)

भैजी भुल्ला की बथ:(मोदी अर उत्तराखंड) 
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"भैजी भैजी !!! मी भि आज गयुं छौं मोदी जी ते सुणनो, तुम किले नि आये बल?" भुल्ला अपनी साँसों को संभालते हुए बोल रहा था।  
भैजी : क्या बोला बल मोदी जी ने? चाहिए की नहीं चाहिए? होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए?
    
"अरे भैजी तुम भी न ! मोदी जी ने कहा बल अब पहाड़ का पानी अर पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आएँगे। बल ऐसी सड़क बनाई जाएगी बल सीधा चारधाम चम्म करिकी पहुँच जाएँगे बल। सड़क बनेंगी तो बल काम आएगा, पर्यटन आएगा गड्ढे खुदेंगे, बोझा ढोएंगे, दूकान खोलेंगे हर उत्तराखंडी को बल उत्तराखंड में ही काम मिलेगा बल।"

भैजी: " अरे वाह !!! यु त भिजाम सुंदर बथ च। पर सिरोबगड़ जन रगड़ भगड़ ते कणके रोकला? पाणी बल पहाड़ का डाम पर डाम बणेकी रुका हुआ ही है, जु यु डामन डमयान छन हम जु यु टाइमबम च हमारा मुण्ड मा वेका बारा मा भी कुछ बोली क्या कैन मोदी जी थें? 
जवान जु अगर रूक्यां छन कुई पहाड़ पर, उनको तो बल "डेनिस" "भांग" और "गाँजा" उगा कर तो सरकार काम ला ही रहे हैं।  पहाड़ का पानी और पहाड़ का जवानी डेनिस को पीने के काम आ रही है, ये भी बताया किसी ने उन्हें बल?
गड्डा खोदने को बिहारी हैं, हम पहाड़ी कहाँ काम करते हैं? बोझा ढोने को बल डुटियाल हैं यहाँ, पर्यटन के लिए बाहर के भू माफिया हैं, दूकान-बिज़नस के लिए देसी हैं, उत्तराखंड के विकास के लिए उत्तराखंडी कहाँ से लाएंगे? वो तो बल दिल्ली सजा रहे हैं, मुम्बई सजा रहे हैं, देस सजा रहे हैं विदेश सजा रहे हैं। प्रवासी हैं, NRU (नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड) हैं।         उत्तराखंड के विकास के लिए उत्तराखंडी कहाँ से लाएंगे? ये भी बताया बल किसी ने मोदी जी को। 
बल ५-५ सांसद भेजे उन्हें उनमे से किसी ने तो बोला होगा? उत्तराखंड में उत्तराखंडी कहाँ हैं बल? जो हैं वो पहाड़ी कहाँ हैं बल, और जो पहाड़ी भी हैं तो वो भी त बल देस जाने की फ़िराक में हैं बल "

भुल्ला: बथ तो सही बोली बल भैजी तुमुन। यख उत्तराखंड मा उत्तराखंडी कहाँ से लाएंगे? अपरा जगदम्बा चमोला जीन भालू ही बोली छौ " जु छन वु उंद गया छन, यख सुख्यां मुंगरौट रयां छन"
दिव्या रावत जन काम करना पड़ेगा, शेखर पाठक जैसा असकोट-आराकोट ( पहाड़ ) करना पड़ेगा क्या? कर्नल कोठियाल जैसा कुछ करना पड़ेगा क्या? 
माधोसिंह भंडारी बन के खुद ही कूल खोदनी पड़ेगी क्या? मतलब मैं भङ्गलु नहीं उगाऊँ? डेनिस न पिलाऊँ? 
वो रावत भैजी नाराज़ हो जायेंगे, अर अगर मोदी भैजी की बात नहीं मानूँ तो मोदी नाराज़ हो जायेंगे।             
बोला भै !!!तब क्या कारला भैजी? 

"अरे भुल्ला हम लोग न ग्यों छन, अर राजनीतिक पार्टी चक्का। पिसना त हमको ही ठैरा बल।" 
                                                       

                                 https://atulsati.blogspot.in/2016/12/blog-post_27.html
     

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

पुराण- कुरान-अक्स की बातें


मुझे भगवान् का पुराण स्वीकार है, 
मुझे अल्लाह का कुरान स्वीकार है। 
ढोंगी पोंगा पंडित का पुराण पुराण नहीं,
अढ़ियल दढ़ियल मुल्ले का कुरान कुरान नहीं।
जो कल हुआ, वो कल था, वो कहीं से भी आज नहीं, 
ईश्वर मेरा तुम्हारे किसी भी कर्मकांड का मोहताज़ नहीं,
अल्लाह मेरा झूठी अज़ानों के हल्ले का मोहताज़ नहीं।
तुम मन से उसकी पूजा करो, इबादत करो,
हर दफ़ा उठ कर गर सो जाओ  
हर दफ़ा गर सो कर उठ जाओ,
तो उसका धन्यवाद करो,
उसके तुम शुक्रगुज़ार रहो,
याद रखो इस अक्स की बातें,  
तुम उसके मोहताज़ हो, वो तुम्हारा मोहताज़ नहीं। 
जो कल हुआ, वो कल था, वो कहीं से भी आज नहीं, 
ईश्वर मेरा तुम्हारे किसी भी कर्मकांड का मोहताज़ नहीं,
अल्लाह मेरा झूठी अज़ानों के हल्ले का मोहताज़ नहीं।  
   
- अतुल सती 'अक्स'- Atul Sati 'aks'

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

अक्स कु एक सवाल

 

जै ते तुम घौर बोल्दा छन,वू घौर कख च?
जथा तुम बोलणा छन, उथा शोर कख च?
वू त भुखू छौ चार दिनों कू, वू चोर कख च?
मिठै चोरी करी जेन ,वू मिठै मिलावटी छै,
खूनों रिश्ता छैं त च पर अब, वू जोर कख च?
कख हर्चीगिन भैजि की डाँट, भुल्ले की जिद्द, तुमुन त अपरा ही भै की जमीन छीनी ल्याई,
ज्यूँन अपरा बच्चों ते सब धणी त्यागी 'अक्स',
जै मकाना का हिस्सा होन्दा, वू घोर कख च? ऊं बुए बुबा ते त्यागण वालु, कमजोर कख च?
-अतुल सती 'अक्स' 

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

भैजी भुल्ला की बथ:(हनीफ़ रावत अर उत्तराखंड)

भैजी भुल्ला की बथ:(हनीफ़ रावत अर उत्तराखंड)  
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भैजी!!! तुमुन भी सुणी बल हनीफ़ रावत भैजीन हर जुम्मा मा डेड़ घंटो अवकाश घोषित कर दिया है। कहीं अपना उत्तराखंड उत्तराखंडिस्तान तो नहीं बन रहा बल? कभी छठ की छुट्टी त अब जुम्मे की। 
हम पर भी तो वो देबता ढुकाया था उसको नचाने की छुट्टी देंगे बल जेई साहब??? अच्छा हर मंगल अर शनिबार ते हमें पूछ भी करानी होती है पुछेर से, छुट्टी देंगे बल क्या बड़े साहब? देबता तूशता ही नहीं है। 

भैजी: अरे भुल्ला तू भी न लाटा है, हम भोटर थोड़े न हैं जो हमें छुट्टी मिलेगी बल। अच्छा एक जजमान को भोट कौन बामण देगा? ऊपर से वो कुमैं है गढ़वाली किले देंगे भोट? हम सरोले भी हैं रे हम गंगाड़ी को भी भोट नहीं देते और त और अपर ही गौं के मल्ले खोले वालों को भी हम भोट नहीं देते। अर हाँ बोड़ीन वू नरसिंग ढुकाया था न हम पर जिस पर माँ ने अपना भैरव पुकारा था तो भोट त हम अपरा ही भैजी को भी नहीं दे पाएंगे। 

भुल्ला: पर भैजी देबता को तो तुषाना ही है, हमने जो लगोठीया लाया है उसका क्या? छुट्टी नि मिलेगी त कण के नचै होगी? दोष लगेगा देबता का?

भैजी: अरे देबता को टक्कर देने के लिए सैद (पीर बाबा) भी त आजकल नचा रहे हैं, वो भी तो दोष लग रै हैं।
सब्बिया सब्बि दोष छन हुयां ये पहाड़ पर। जनि कण हँकार लगयूं च कण उत्तणदंड हयूं च?

भुल्ला: त भैजी ये दफा चुनाव मा बल बिगास की बथ नहीं होगी बल? स्थायी राजधानी, विकास, केदार आपदा का गबन, भू-शराब-शिक्षा-खनन  माफिया राज, पलायन, बेरोजगारी की बात नहीं होगी बल? 

भँगलू ज्यादा ही खै ली ये मास्तन!!!

गढ़वाली कुमाउँनी जौनसारी भाषा संस्थान तो बनाया नहीं उर्दू अकादमी बना दी बल नकली राजधानी देहरादून में। 
इस्कूल त बनाया नहीं, डोबरचान्ठी पल बने नहीं टेहरी में मदरसा बना दिया बल।   
देबभुमी भी बल अस्साम अर बंगाल जन हुएजालु? मिन सुणी बल उत्तराखंड तीसरा नंबर पर है मुस्लिम जनसँख्या को सबसे तेजी से बढाने में।   

भैजी: सही सुनी भुल्ला तिन। तीसरू च उत्तराखंड भारत मा मुसलमानों की बढ़ती आबादी ते। पर हम यखुली यखुली क्या कर सकते हैं? जो कर सकते हैं वो तो बल NRU बने हुए ठैरे बल !!! इन्टरनेट पर ही ता बल हो हल्ला करेंगे। आंदोलन भी बल फेसबुक पर चलाएंगे। मजबूर जो ठैरे बल। 
साला हम उत्तराखंडी(पहाड़ी) मजबूर बड़े हैं यार जो NRU हैं वो बल मजबूर हैं फ्लैट के कुमचरे के लोन के लिए नाच रहे हैं और हम यहाँ हंकार-जनकार के लिए नाच रहे हैं। कोई बल दारु पी कर नाच रहा है त कोई बल पहाड़ छोड़ कर प्लैन (पलाइन) के लिए नाच रहा है।  यु कण देबता ढुकाया है इन नेताओं ने बल सब्बिया सब्बि झम्म जकड़ियाँ छन अर सब्बियाँ सब्बि नाचना छन। 

और उसके बाद दोनों भैजी और भुल्ला ने पव्वा गटकाया और सो गए, कुछ देर पैले वो जिस पुछेर से मिलने गए थे वो भी बल देहरादून शिफ्ट हो गया। 

        
 

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

जख्म

तेरा दिया जख्म बिल्कुल इस मौसम सा ही है,
सर्द ही रहता है,हमेशा हरा हरा सा ही है।
खाली खाली सी है तेरे बिन मेरी ये जिन्दगी,
सभी कुछ खाली है,दिल पर भरा भरा सा ही है।
ये किस तरह के दरिया-ए-इश्क़ में हूँ मैं,
दिल डूबा हुआ है,जिस्म पर तरा तरा सा ही है।
उम्र तमाम तेरे साथ ही गुजारने की हसरत है,
एक ही अरमान है और वो भी धरा धरा सा ही है।
नब्ज़ टटोलकर मेरी वो कहने लगा अक्स,
मरा ही नहीं,अभी जिन्दा है, पर जरा जरा सा ही है।
                                       -अतुल सती अक्स

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

मैं और मेरा मित्र


मैं अपने परम मित्र के धाम,
खाली हाथ, बिना किसी काम।
भीतर मैं था और बाहर बैठा वो, 
मैं बाहर आया तो भीतर आया वो,
कौन अब कौन है भूला सब नाम, 
पहुँचा जब, 
मैं अपने परम मित्र के धाम, 
खाली हाथ, बिना किसी काम।


सोमवार, 12 दिसंबर 2016

मैं और मेरा अक्स

नाराज़ हूँ बहुत मैं तुझसे,
मेरे अक्स,   
तू वो क्यों नहीं बन पाया,
जो मैं चाहता था, 
जैसा मैं चाहता था। 
तुझे कहा था कि,
तू ये करना,
ऐसा करना, 
ये मत करना,
ऐसे नहीं, वैसे करना,
ये नहीं वो अच्छा है, 
ये झूठा है वो सच्चा है,
इसकी कोई औकात नहीं ,
उसका बड़ा रुतबा है,  
तू वो ही बनना।
क्या क्या कहा था,
क्या क्या चाहा था ,
तुझे मैं सूरज बनाना चाहता था,
इस अँधेरे से आसमान का। 
लेकिन,         
नाराज़ हूँ बहुत मैं तुझसे,  
मेरे अक्स,
तू वो क्यों नहीं बन पाया,
जो मैं चाहता था, 
जैसा मैं चाहता था। 
पर,
सच कहूँ तो, 
झूठा है मेरा ये गुस्सा तुझ पर,
मैं खुद ही वो न बन पाया,
जो मैं चाहता था, 
जैसा मैं चाहता था।
फिर कैसे तुझ पर नाराज़ हो सकता हूँ मैं,
मैं जो खुद चाहता था होना,
वो न हो सका,
जैसा मैं बनना चाहता था, 
जो बनना चाहता था,     
जो करना चाहता था,
जो सही था मेरे लिए,
जो अच्छा था, सच्चा था,
वो मैं न बन सका। 
नाराज़ हूँ बहुत मैं खुदसे,
मेरे अक्स,  
मैं वो क्यों नहीं बन पाया,
जो मैं चाहता था, 
जैसा मैं चाहता था। 

इश्क

इश्क में,
सजा भी है, 
और, 
इसका इक
मजा भी है।

सुरूर है,
गुरूर है
इश्क़ में,
तेरे,
'अक्स',
जरूर है,
जरूर है।

निगाह में,
तेरी हैं,
सनम,
बला बला की,
शोखियां।

देखती हैं,
जब मुझे,
गिराती हैं,
ये,
बिजलियाँ।

के बस,
तुझे ही
देख के,
मेरी,
सुबह औ,
शाम हो।

तेरी ही,
मस्त,
निगाह से,
मेरे,
इश्क का,
हर जाम हो।

अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

परिवार को बचाइये

अरे !!! हम शरमाते हैं,
पर,
जनसँख्या खूब बढ़ाते हैं।

अरे !!! हम लिहाज करते हैं,
और,
खुद को लाइलाज करते हैं।

अरे !!! महंगाई ने कमर तोड़ दी,
और,
छठे बच्चे के वक़्त, उसने दुनिया छोड़ दी।

अरे !!! ये शिक्षा हमारी संस्कृति नहीं,
तो,
खुजराहो, कामसूत्र क्या हमारी कृति नहीं?

अरे !!! तो क्या करूँ? 
कैसे करूँ? 
कुछ तो सुझाईये !!!
......तो आप,
मत शर्माइये, 
कहते जाइये, 
सुनते जाइये।
एड्स, यौन रोग, 
असुरक्षा से सबको बचाइये।
बड़े, छोटे, 
सब को बात खुल कर बताइये।
कंडोम लगाइये, 
परिवार को बचाइये।
                      - अतुल सती 'अक्स'