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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

मैं-मेरा बचपन- मेरा आज - मेरा कल

मैं और मेरे गाँव का लाटा चाँद 
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मेरी ज़िन्दगी के बचपन का हर दिन,
आसमान का एक तारा लगता है,
उस ज़माने में फ्लैट नहीं थे, सोसाइटी नहीं थी,
बस कुछ घर थे, कुछ मोहल्ले थे, और थे कुछ मैदान। 
मैदानों से खेलकर जब बचपन घर आता,
तो अपना खुद का एक नन्हा सा मैदान पाता। 
उस ज़माने में हर घर में आँगन थे,
उन्ही में बचपन खेलता था,
उसी आँगन में कुछ ख्वाब बनते थे बिगड़ते थे। 
वहीँ कुछ छोटे छोटे गड्ढे कंचों के लिए थे,
गोया चाँद की जमीन अपने आँगन में उतार दी हो। 
उस वक़्त घरों पर जो छत हुआ करती थी,
उसकी अक्सर बाउंड्री नहीं होती थी,
जैसे कोई आज़ादी दे रखी हो छत को, 
जैसे कोई बंधन ही न हो जीवन में,
वहीँ उसी छत पर कुछ तारे बिखरे हुए रहते थे,
किस्से-कहानियों के हिस्से बिखरे रहते थे,
मैं अक्सर अपने भाइयों से साथ उस आसमान को बाँट दिया करता था,
और चाँद को एक बूढ़ी दादी के सूत कातने को छोड़ दिया करता था।


जब कभी हम रूड़की से अपने गाँव झालीमठ जाते थे,
तो वो चाँद भी मेरे गाँव पहुँच जाता था,
और वहां वो और बड़ा, और साफ़ हो जाता था। 
तारे भी जैसे बड़े ही खुश होते थे,
कुछ ज्यादा ही आसमान में चमकते थे, 
जैसे मेरी घर की छत से उड़ कर आसमान में बिखर गए हों। 
वहां गाँव में मेरी नन्ही चचेरी बहनें भी आती थीं,
शायद इसीलिए तारे कुछ ज्यादा हो जाते थे, क्योंकि अब हिस्से भी ज्यादा होते थे। 
हम भाई बहन खेलते,पंदेरे से पानी लाते, छोटे से छोटे बर्तन से, बड़े से बड़े बर्तन तक। 
पर मैं बंठा नहीं उठा पाता था, बंठा उठाने को अभी थोड़ा छोटा था न। 
लेकिन इतना बड़ा तो था कि चाचा,दादा और पापा संग गदेरे जा सकूँ,
हाथों से ही मछली पकड़ सकूँ, 

दोस्तों संग भैंसे नहला सकूँ। 
गाय चराते चराते, कालिंका धार गया था एक बार जब, 
करौंदे और तिम्ले के पत्तों का पान बना कर खाया था तब,
वो लाल काले बीज होते थे न कुछ तो, बड़े सुंदर से, 
उन्हें आँखों में डाल कर आँखों को रिन्गाना,
साली में जाकर अपनी गौड़ी से मिलकर आना,
दादी का मार्खा गौड़ी को पिजाना, 
कोदे की रोटी और पिसयुं लोण के संग,
ताज़ा घी वाला खाना खाना। 
और फिर शाम को आसमान के तारों के हिस्से करना, 
और, 
और उस बड़े से खुश मिज़ाज़ चाँद को,
बूढ़ी दादी के सूत काटने को फिर से छोड़ दिया करना।


पर उस चाँद पर रहने वाली वो बूढ़ी दादी, 
मेरी दादी की भी बूढ़ी दादी थी,
हाँ !!! मैंने पूछा था एक बार,

वो भी मेरी ही तरह उनसे नहीं मिली थी। 
बड़ा ही भारी समय होता था, 
जब हम वापस अपने घर रुड़की को आने लगते थे,
दादा दादी, चाचा चाची और भुल्लिओं के विछोह से,
पर अगली बार जल्दी मिलने के वादे पर,
चाचा चाची से मिले पैसों पर,
और पुल छोड़ने तक दादा दादी की भुक्कीयों से,
मन बहलाते जाते थे। 
पुल पार करके, जितनी भी बार,वापस मुड़ कर देखो, 
दादा दादी वहीँ नज़र आते थे।

वो वहां तब तक होते थे जब तक हम ओझल न हो जाएं।  


मैंने अपने गाँव के दोस्तों को बताया था कि हम जा रहे हैं, 
सबको बताया था पर चाँद को बताना भूल गया, 
ऋषिकेश पहुँचने से पहले ही रात हो जाती थी, 
और वो चाँद, वो लाटा, वो बोल्या चाँद,
हमारी गाड़ी के पीछे पीछे, 
हर बार रोता बिलखता, मेरे गाँव, मेरे दादा दादी,
और अपनी दोस्ती की दुहाई देता,
वापस लौट आने की जिद्द करता,
कभी किसी पहाड़ी से ठोकर खाता, 
कभी किसी बिल्डिंग से टकराता, चोट खाता,
हमारे पीछे पीछे रुड़की पहुँच जाता। 


गर्मी की छुट्टियों की दोस्ती हर बार बरसात में टूट जाती थी। 
मैं अक्सर बारिश को, चाँद, गाँव और दादा दादी के आँसू समझता था,
तब रातों को चाँद नाराज़ हो कर बादलों के पीछे छुप जाता था। 
वो मुझसे बात ही नहीं करता था,

बस रोता जाता था। 
  
अब आज अगर सालों साल में कभी, मैं गाँव जाता भी हूँ तो 
तो मुझे, वहां वो, गाँव, नज़र नहीं आता, 
रातों को, अब वो चाँद, नज़र नहीं आता, :(
अब मेरी छत पर बस टूटे हुए ख्वाब बिखरे रहते हैं,
वहां कोई कहानी नहीं होती,
वहां कोई तारा नज़र नहीं आता।    
दादा दादी को तो गुजरे हुए जमाना हो गया,
अब वो चाँद भी मेरे छत से गुजरता नज़र नहीं आता, 
वो मेरे साथ अब खेलता नहीं है,

अब वो मेरे पीछे दौड़ता नज़र नहीं आता।  
वो अब भी नाराज़ है मुझसे, मेरे गाँव की ही तरह,
शायद !!! मेरी ही तरह, अब वो भी, नाउम्मीद है,
अब वो भी मेरे वापस आने की राह देखता नज़र नहीं आता।

अब वो भी मेरे वापस आने की राह देखता नज़र नहीं आता।
                           - अतुल सती 'अक्स'                             
   







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