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शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

इतिहास

जिस दिन अपना इतिहास,
हम लोग जान जायेंगे,
किस तरह खुद से,
हम लोग,
अपनी नज़रें मिलाएंगे ? 
सत्य उसी को मानते हैं, 
जो हमें लगे है अच्छा,
जब सत्य सचमें हम जानेंगे, 
तब बोलो,
कैसे अपना सत्य भुलायेंगे?      
याद रखो अपना सच,
खोजो जानो समझो उसको,
भूलो मत जो कुछ भी हुआ,
अपने किये धरे का, 
लेकिन माफ़ी माँगो,
और माफ़ी देदो,
नहीं तो ऊपर वाले को बोलो फिर,
क्या अपना मुख दिखाएंगे?     
जिस दिन अपना इतिहास,
हम लोग जान जायेंगे,
किस तरह खुद से,
हम लोग,
अपनी नज़रें मिलाएंगे ?     
                                                 -अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

धै !!! मेरा घौरे की

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
यख बस असमान ही असमान च, 
कखि न त धरती च, न पहाड, न कोई बौण, 
न कोई डाली बोठली,
कु जाणि वख घोर मा, बौण कण होला?
पन्देरा कण होला वु घुघूती कण होली?  

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वखि वे बौण मा, 
जू जलणु छौ ये जेठ मा, जू जेठ बारो मासी छौ,
वखि जख हमारू अपरू घौर छौ,
वे बौण मा जू वु बरगदो डालु च,
जू फुकेगी ये विगास मा, 
हमारा बरगदे का विनाश मा,
वे मा मौल्यार ए जाली,
मेरी लाटी, मेरी चखुली,
तू जु एक बार घोर ऐ जाली।         

देख दी वे बौण मा सब्बि डाली सूखी गेन,
वेका सारा पोथ्ला फुर्र करी के उड़ी गेन,
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
बोड़ी की जू घौर हम जोला,
यु अमर जेठ खत्म हुए जालु,
तेरा मेरा अर ये बोण का, ये बरगद का,
आँख्यों का बस्ग्याला का बाद,
जू बसंत औलू,
वू ही सदानि रेलू,       
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वु पुरखों कू घौर,
हम पोथ्लों कु ठौर,
धै लगौणु च हमते,
चल अपरा जोड़ों ते खोजदन  अब, 
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब। 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

एक अकेला ठूँठ


सुबह सुबह एक ख्वाब आया, 

देखा कि मैं किसी बंज़र सूखी जमीन पर खड़ा हूँ,
मैं हूँ,एक अकेला ठूँठ किसी पेड़ का,
सूखा और हर किसी से रूठा हुआ,
जमीन के भी माथे पर शिकन नुमा,
दरारें थी, न जाने कितनी गहरी। 
एक दम सूखी टूटी फूटी, 
उन दरारों देख कर जमीन की,
मुझे अपने कुछ रिश्ते याद आ गए। 
उनमें भी यूँ ही सूखा पड़ा था। 
उनमें भी कुछ यूँ ही दरारें थीं।

कुछ दरारें माँ बाप के साथ की दिखी,
जिनके बिना बचपन में मुझसे रहा नहीं जाता था। 
और आज उनका बोझ भी सहा नहीं जाता। 
हर दिन बात करना तो बहुत बड़ी बात है,
पर हफ्ते में कभी फ़ोन पर बात हो भी जाती है,तो, 
समझता हूँ कि,एक बड़ा एहसान कर दिया मैंने उनपर। 
भाई का हाल तो पता ही नहीं मुझे,
अब उसकी फैमिली अलग और मेरी अलग हो गयी है न। 
कभी हम भी एक ही फैमिली का हिस्सा थे। 
साथ साथ खेले थे कभी,
और आज हाल भी नहीं पूछते कभी।
याद है बचपन में कभी भाई कहीं फंस जाता था मुसीबत में,
तो मैं हाथ बढ़ा कर उसे थामता था, गले लगाता था,
आज तो भाई से हाथ भी नहीं मिलाया जाता,
गले लगाना तो बड़ी बात है। 

मेरे पर एक सूखी बेल भी लिपटी हुई थी,
शायद मेरी बीवी थी वो, सूखी हुई मुरझाई हुई,
शिकायत से भरी हुई कि, मैंने उसे पनपने ही नहीं दिया,
खुद की दुनिया में इतना फैला कि उसे भी सोख लिया,
वो लिपटी तो थी मुझसे वो, 
पर कहीं कहीं पर कुछ फासले थे,
जो दिखने में तो,बाल बराबर ही थे, 
पर यूँ महसूस होते थे, गोया हम दूर हों इतना कि,
लाख सदायें दें एकदूसरे को, 
पर ना तो मुझे वो दिखती ही है,ना मैं ही उसे सुनायी देता हूँ। 
हम तो जमीन से पानी सोखने में,सूरज से रौशनी लेने में, हवा लेने में, 
इतना ज्यादा खो गये थे कि,पता ही नहीं चला कि कब ये, 
पलों की दूरी, सदिओं के फासले हो गए।

दोस्ती भी मतलब से ही की थी मैंने,
हवा, जमीन, पानी से कि मेरा मतलब निकल जाये,
और आज हकीकत ये ही है कि,
वो सब साथ तो हैं मेरे, पर जमीन सूख गयी,
हवा रूठ गयी, पानी का पता ही नहीं है अब,
मैंने तो कभी कोशिश भी नहीं की, कि, ये दूरी क्यों हैं,
मैं तो जमीन से नीचे भी था, और ऊपर भी,
लगा था आकाश छू लूंगा, मुझे इनकी क्या जरूरत।
कदर नहीं कर पाया, पर, 
आज बहुत याद आते हैं ये सब,
जहाँ मैं दरारों की जमीन पर खड़ा हूँ,
एकदम तन्हा, एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह। 
आँख खुली तो देखा कि वाक़ई में ये दरारें हैं,
वाक़ई में मैं एकदम तन्हा हूँ ,एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह।
मैंने तो दरारों को वक़्त रहते पाटा नहीं,
पर आप पाट लो इनको वक़्त रहते,
नहीं तो कहीं किसी जमीन पर खड़े होंगे,
मेरी ही तरह, 
एकदम तन्हा, एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

बचपन


सूरज, चाँद, बादल और तारे,
कुछ शफ़क, कुछ अँधेरा,
कुछ मिट्टी और कुछ फूल,
सब कुछ एक ही जेब में  रख कर,
नादानी और प्यार मिलायें तो। 
फिर इस बेमतलब जीवन में हम ,
बचपन वाला वो धनुक लाएं तो,   
बचपन की कोई सीमा नहीं है,
उसको अनंत बनाएं तो,  
इस जीवन में क्या नहीं है,
जवानी बुढ़ापा भुला कर,      
खोजने जरा आप जाएँ तो। 
            -अतुल सती 'अक्स'  

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

कलाम !!!


"अबुल" परदादा की बेल, 
"पकीर" दादा से होते हुए,
"जेनुलआब्दीन" पिता के कंधे से,
जब आकाश की और पहुंची, 
तो "अब्दुल कलाम" आज, 
आसमान की अनंत शिखर की ओर,
आज़ाद हो गए। 
पर, 
वो बेल यहीं पर खत्म नहीं होती है,
बल्कि वो जिस्म जब सुपुर्दे ख़ाक होगा,
तब उस मीट्टी से अनेक अँकुर निकलेंगे,
उसकी सौंधी मिटटी से तीनों जग महकेंगे,  
गर कुछ खिलौने उस मिटटी से बनेंगे,
तो भी वो बच्चों के हाथों में चमकेंगे,
आसमान तक भी आज फूट फूट कर रोया है,
भारत माँ ने अपना सच्चा सपूत खोया है,
भारत ने आज अपना महा रत्न खोया है,
लेकिन ये मत कहना कि कलाम मर गए,
ऐसा कहा नहीं करते हैं,
सुनो बच्चों!!!
ऐसे गुदड़ी के लाल,
कलाम कभी मरा नहीं करते हैं।
                          - अतुल सती 'अक्स'   

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

मृत्यु मेरी एक प्रेयसी


हर पल मुस्कुराती हुई दिखती है,
आलिंगन का रोज आग्रह करती,
नृत्य करती, हँसती इठलाती,
बाहें फैलाये मुझे बुलाती,
मुझे वो रोज नृत्य करती सी दिखती है, 
मुझे तो मृत्यु मेरी एक प्रेयसी लगती है।     

मृत्यु पश्चात् ही तो शुरू है जीवन,
एक अनंत नभ में होगा विचरण,
लेखा जोखा, पुण्य पाप,
सब बातों का होगा हिसाब,
मुझे इस जग की हर बात पराई लगती है 
मुझे तो मृत्यु मेरी अपनी, सगी लगती है। 

हर दिन हर पल सम्मुख मेरे,
प्रश्न करे जीवन बड़े गहरे,
रिश्ते नाते, जीवन और मरण,
कौन शैतान, कौन भगवन?
हर एक सवाल का जवाब लगती है,
मुझे तो मृत्यु अंतिम शराब लगती है।

तिलक टोपी पगड़ी क्रॉस वालों का,
हर मजहब की अपनी रंजिशों का,
उनके जूठे,
और झूठे हर एक साजिशों का,
एक एक करके पर्दाफाश करती है,
मुझे तो मृत्यु जीवन का सार लगती है।
                 
                     -अतुल सती 'अक्स'
      


                
  



सोमवार, 6 जुलाई 2015

बचपन

अभी थोड़ी देर ही सही,
बचपन को,
बचपने में ही रहने दो। 
चाँद तारों को तोड़ कर,
अपनी जेबों में इन्हे रखने दो। 

भरने दो अभी कुछ और देर तक,
मनमर्जी के रंग इस आसमान में,
इनकी दुनिया को अभी,
कुछ और देर तो सजने दो।
फिर,
फिर तो ये भी हम जैसे हो जायेंगे, 
ये नादानी कहीं छूट जाएगी पीछे, 
ये भी जल्दी सयाने हो जायेंगे। 
कुछ कागज पढ़ लिख कर,
कुछ कागज कमाने को,
ये भी हम जैसे दीवाने हो जायेंगे। 
अभी थोड़ी देर ही सही,
बचपन को बचपने में ही रहने दो। 
चाँद सितारों को तोड़ कर,
इन्हे अपनी जेबों में रखने दो।

गुरुवार, 18 जून 2015

बातें

ये दीनो धरम की बातें, 
ये राम की रहीम की बातें, 
ये राजनीती, इज़्ज़त बेइज़्ज़ती की बातें,
ये देश की, जात की, धर्म की चिंता की बातें,
ये ऊँच नीच, सुन्दरता  बदसूरती की बातें,
ये सबक सीखाने की, युद्ध की बातें,  
ये,
                     भरे पेट वालों के मनोरंजन की होती हैं ये बातें,             
खाली पेट,
कभी ???
  कहीं ????
किसी से??? 
कब ???
             हो पाती हैं, ये बातें??? 
                               -अतुल सती 'अक्स'

सोमवार, 8 जून 2015

त्वे ते अपरी माया मा


(त्वे ते अपरी माया मा 
जन्मो जन्मा बंधन मा)---2
बंधण चांद च मी,-----------2  
बोल तेरी हाँ च की ना ?----4
                       
ई दुनिया बटीं दूर नई  दुनिया बसोला
जख हर रंगा,हर मौसमा का फूल खिलोला            
जख बारामास बसंत ऋतू होलि 
चखुला डालियों मा  प्रेम गीत गौला,गीत गौला 
          
 मेरा  मन मा यु ही च 
आन्ख्यों तिन जू बोली च )---2        
तेरा भी जिकुड़ी मा कखी ,-----2    
यू  बथ छे च की ना?------------४ 


जुन्याली रात मा,हाथों मा हाथ होला 
चाँद तारों का संग, प्रेम गीत हम गोला 
जू सौं खाई हमुन मिली के,
वेते, जन्मो जन्म, हम निभोला,हम निभोला 

(बसगी तू यन मेरा मन मा
मेरा मन का मंदिर मा)-----------2 

जन जल्णु हो  कुई दिवु --------2     
भगवती का मंदिर मा,----------4  
                                 -अतुल सती 'अक्स'

A song of Anant Naad...