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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

कहानी पहाड़ी वाले बाबा की



आओ तुम्हे सुनाऊँ एक कहानी,
पहाड़ी वाले बाबा की कहानी। 
ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में रहने वाला था वो,
अब रहता था ऊँचे ऊँचे मकानों में,
विकास की नदी में बह गया था वो,
पहाड़ी से कबका मैदानी बन गया था वो। 
मैदान की भाग दौड़ लूट गयी उसकी जवानी। 
बस यहीं से शुरू होती है हमारी कहानी।  

वो बूढ़ा अकेले अकेले ही,    
रोज इकठ्ठा करता मिट्टी, एक जगह,
बनाता टीला उनका,
सजाता घास और टहनिओं से उन्हें। 
देसिओं के बीच का वो पहाड़ी,
बल ठैरा वो एकदम अनाड़ी। 
नौकरी की बाढ़ में बगा था वो,
खुद की ही बनायी  हुई,
मजबूरी के हाथों, गया ठगा था वो। 
कहने को उसका नॉएडा में टॉप फ्लोर था,
पन्द्रवीं मंजिल में ,
जन किसी डांडा के टुख्खू का एक छोर था। 

अपने वगत जो सही लगा किया उसने,
अपने माँबाप छोड़े तरक्की को,
और आज उसका बेटा तरक्की कर गया ,
अपनी ईजा को भी अपने दगड़ ले गया, 
बाल बच्चों दगड़ी विदेश बस गया। 

वो अपने आखिरी दिन उन मिट्टी के टीलों पर,
जिन्हे वो अपना पहाड़ कहता था,
अपना घर कहता था,
उन्ही टीलों पर वो बैठ वो सबको अपनी कहानी सुनाता।
बच्चों को बुलाता और सुनाता,  

"वो बताता कि वो एक पहाड़ी था कभी,
अपनी पहचान खो कर,
उसे वहीँ पहाड़ों में दफना कर,
यहाँ मैदान में आया था। 
पर यहाँ उसके उस त्याग को कोई समझा ही नहीं,
यहाँ सभी तो ,
अपनी पहचान दफ़न कर आये थे अपने गाँव से,
कोई कार चलाता, तो कोई उसकी कार साफ़ करता। 
कोई सड़क बनाता तो कोई सड़क पर चलता,
कोई मजदूर तो मकान मालिक,
सभी अपनी पहचान दफ़न कर आये यहाँ,
सबकी थी एक ही कहानी,
पलायन पलायन पलायन की कहानी।   
सब आये अपना घर बार छोड़ छोड़ कर, 
और फिर यहाँ एक पहचान बनाई,
पहचान साहब की, नौकर की, गार्ड की,
कुक की, मालिक की, सर की,  
छोटू की जो कभी बड़ा नहीं होगा,
मैडम की, ऊँचे लोगों की, नीचे लोगों की,         
असल गँवा एक नकली पहचान बनाई, 
लेकिन इस पहचान में अपनी ज़िन्दगी गंवाई। 
पर, 
तुम बच्चों अपनी पहचान मत गँवाना,
तुम,
हाँ तुम मिलकर बच्चों,
स्मार्ट सिटी की जगह स्मार्ट गाँव बनाना।
ताकि किसी को अपनी पहचान न पड़े गँवाना।"

वो बूढ़ा ता-उम्र बस बातें करता रहा,
पहाड़ों की, पहाड़ों की वापसी की,
ये थी कहानी पहाड़ी वाले बाबा की,
कहानी अतुल नाम के शख़्स की, 
अतुल के जैसे हर एक 'अक्स' की। 
                             - अतुल सती अक्स  
 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

पहाड़ी वाले बाबा और उसका अतीत।



आज एक कहानी सुनाता हूँ मैं आपको। एक कहानी एक दाना मनखी(बूढ़ा व्यक्ति) की। एक पहाड़ी वाले बाबा की। 
वो बाबा अक्सर बैठे रहते थे, नॉएडा के एक हाई -राईज  सोसाइटी के एक पार्क में, एक टीले नुमा जमीन पर। उन बूढ़े आदमी की उम्र रही होगी कुछ ८०-८५ साल। उस बड़ी सी पहाड़ सी ऊँची ऊँची बिल्डिंग की उस सोसाइटी में वो अकेले  ही रहते थे। उनकी पत्नी उनके एकलौते बेटे के साथ अमेरिका बस गयी थी। बेटा खूब तरक्की कर चुका था और अमेरिका में रहता था और उसकी माँ वहां रहती थी उसके साथ क्यूंकि वहां उसे अपने नाती नतीने भी तो संभालने थे। 

५-६  साल हो गए थे न तो उस बूढ़े से मिलने कभी कोई आया न ही वो कहीं गया। उसे सब पहाड़ी वाले बाबा कहते थे। वो बाबा हमेशा उन टीलों पर ही सारा दिन -शाम रहते थे। उस टीले पर कुछ कुछ घास उगी हुई थी। कहीं कहीं पर किसी पेड़ के पत्ते तोड़ कर पेड़ जैसा अकार देकर कुछ टहनियां गाड़ रखी थीं।कहीं कहीं पर उन "पहाड़ी बाबा" ने पानी जमा किया हुआ था।  कहीं कहीं उन्होंने नदी जैसी कुछ धार बना राखी थी। वो रोज वहां पानी लाते और पानी को एक छोटी नदी सी बहाते और वहां खड़े बच्चे खूब खुश हो कर उनकी इन हरकतों का मजा लेते। एकदम असली सा पहाड़ लगने वाले टीले को ही वो अपना घर कहते थे। वो कहते थे कि ये मेरा घर है, ये उत्तराखंड है।  मेरा उत्तराखंड।   
शाम को बाबा बच्चों को और उनके माता पिता को अक्सर अपने किस्से सुनाते थे  और वो किस्से कहानी थी उत्तराखंड की। उनके कहानी में, किस्सों में अक्सर एक युवा का जिक्र होता था, जो हमेशा ही अपने पहाड़ पर जाना चाहता था। अपने माता पिता के साथ रहना चाहता था लेकिन उसके उस उत्तराखंड में केवल शिक्षा थी पर रोजगार नहीं। उसे पलायन कर नॉएडा में आना पड़ा और फिर कभी वापस न जा पाया। बस बातें ही करता रहा वापस जाने की। उत्तरप्रदेश से उत्तराखंड अलग हुआ तो था पर वो युवा हमेशा उत्तरप्रदेश का ही बनकर रह गया। जैसा उसने अपने राज्य और अपने माँबाप के साथ किया, वही उसके बेटे ने उन बाबा के साथ किया। इसीलिए अब उन्होंने अपना पहाड़ इस टीले पर बसा लिया। उसमे नकली बौण(जंगल), धारा, गाड़, गदना, नदी बना कर, एक नकली उत्तराखंड बना कर, बस अपने आखिरी दिन गिन रहे थे।  
                             
वो बाबा अपने आपको NRU (नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड ) कहते थे और आज उनका बेटा NRI बन चुका था। पहाड़ी वाले बाबा जी बताते थे कि बचपन में उन्होंने उत्तराखंड आंदोलन में भाग भी लिया था और वो जब जवान थे तो वो हमेशा ही वापस जाना चाहते थे लेकिन उनकी तमाम मजबूरिओं और परिस्थिओं के कारण उनके कथनी और करनी में अंतर ही रहा। जिस मजबूरी को उन्होंने अपना ढाल बनाया था वो ही अब उनके बेटे की ढाल है। 

शायद ये ही जीवन का चक्र है। 
बाबा का नाम पूछा तो बोले कभी लोग उन्हें "अक्स" कहते थे।        
                                   - अतुल सती 'अक्स'

मंगलवार, 20 जून 2017

खुद


यख बिजाम जड्डु च माँ,
यन त रजै भी च अर कम्बलु भी च मेरा काख पर,
पर माँ तेरी खुखली की निवति ते,
मि आज भी खौजणु छौं।
यन त पिताजि यख सब्बि साधन छन,
सुख सुबिधा मनोरंजना का,
पर पिताजि जू सुख घुघूति बसूदी मा छे, घुघ्घी मा छे,
मि आज भी वैते खौजणु छौं। 
अब मि नि करलू जिद्द घुघूति बसूदी की, 
नि करलू जिद्द खुखलि की,
रैण द्या मैंते अपरा काख मा तुम, 
थौक गयुँ मि यख यखुलि यखुलि रैकि।
तुम तै भि त खुद लगदि ह्वालि म्यारि, 
त क्या पै बोला हमुन दूर रैकि? 
-अक्स 

हिंदी अनुवाद ------------------------------------------------------------------------------------------------

यहाँ बहुत ठंड है माँ,
वैसे तो रजाई भी है और कम्बल भी है मेरे पास,
पर माँ तेरे गोद की गर्माहट को,
मैं आज भी खोज रहा हूँ। 
वैसे तो पिताजी यहाँ सभी साधन हैं, सुख सुविधा मनोरंजन के,
पर पिताजी जो सुख "घुघूती बसूदी" में था, आपकी पीठ की सवारी में था, 
मैं आज भी उसे खोज रहा हूँ। 
मैं अब नहीं करूँगा जिद घुघूती बसुदी खेलने की, 
न ही गोद में बैठने की जिद करूँगा। 
मेरे को बस अपने पास रहने दो आप, 
मैं थक गया हूँ यहाँ अकेले अकेले रह कर। 
आपको भी तो मेरी याद आती होगी, 
तो बोलो क्या पाया हमने एकदूसरे से दूर रह कर। 
-अक्स  

मंगलवार, 13 जून 2017

मेरी बैक क्लीवेज और उसे ताड़ती तुम लड़कियाँ


क्यों मेरी बैक क्लीवेज को ताड़ती हो तुम लड़कियाँ,
जब भी मैं झुकता हूँ कुछ उठाने को या
फिर बाइक पर बैठा होता हूँ किसी के साथ?
क्या मेरा अंडरवियर पहनना है तुम्हे?

क्यों मेरी बनियान पर हरदफा अटक जाती है,
तुम लड़किओं की निगाहें?
अगर झांके वो टीशर्ट के गले से? 
क्या तुम पहनोगी मेरी बनियान?

क्या अटका है मेरी छाती के बालों में तुम्हारा?
जो घूरती रहती हो तुम लड़कियां,
मेरी शर्ट के खुले हुए तीसरे बटन को?
कुछ खो गया है क्या वहां? 

क्यों मेरे पेट के उभार पर बैठती हैं निगाहें,
क्यों मेरे हर उभार को देखकर,
तुम्हारा शरीर जड़वत होजाता है?
क्या उन पठारों पर घर बनाना है तुम्हे?

क्यों नहीं तुम अपनी निगाहों पर पर्दा करती? 
क्यों हम मर्दों को बुर्का पहनाती हो?
क्यों बुर्क़े के भीतर भी हमें झांकती हो?
क्या तुम्हे भी अपना जीवन स्याह करना है?    

बोलो लड़किओं हरदफा, हरजगह, हरउम्र में,
क्यों हम मर्दों के जिस्मों को नोचती हो तुम?
क्या मर्द होना गुनाह हो गया?
या तुम्हे भी स्त्री से मर्द होना है?

शनिवार, 10 जून 2017

मेरा जिस्म और तुम लड़कियों की नज़र

मैं और मेरा जीवन किस तरह इस जनानी प्रधान दुनिया में गुजरता है ये बस मैं ही जानता हूँ।
मेट्रो में, ऑफिस में, बाजार में यहाँ तक कि मंदिर तक में, मैं जब भी जाता हूँ तो मेरे पेट के उभार को घूरती निगाहों के बीच खुद को समेटने का प्रयास करता हुआ बहुत ही असहाय महसूस करता हूँ।
जब मेरी टीशर्ट से मेरी बनियान थोड़ा सा भी बाहर झांकती है तो मेरे आसपास की लड़कियों की दरिंदगी उनकी आँखों से टपकने लगती है। अपनी टीशर्ट को सँभालने में तो कभी शर्ट के बटन को बंद करने में ही मेरी रूह कांप जाती है पर मैं अपने हाथों को नहीं कांपने देता। अपने कंधे और छाती को मैं बड़ी ही निडरता से ढक लेता हूँ।
कभी कुछ गिर जाए उसे उठाने के लिए झुकूँ, या कभी जब मैं अपने मित्र के साथ उसके पीछे बैठकर बाइक पर सैर करूँ और अगर मेरी टीशर्ट थोड़ा उठ जाए तो मुझे पता है तुम लड़कियों की नज़र कहाँ अटक जाती है। बताओ तुम, मैं,  मेरी बैक क्लीवेज को कैसे छुपाऊं? एक सेकंड के लिए भी तो तुम लड़कियां मुझसे और मुझ जैसे तामाम मर्दों के जिस्म से अपनी गिद्ध जैसी नज़रें नहीं हटाती हो। मुझसे छोटी या बड़ी या हमउम्र हो बस तुम घूरती ही जाती हो।
किस तरह और कहाँ कहाँ मैं खुद को बचाऊँ? इसीलिए शायद मुझे ही बुरका पहनना होगा, शायद इसीलिए ही तुम जनानिओं ने हम मर्दों के लिए बुरक़ा बनाया होगा, क्योंकि तुम लड़कियों की नज़रें तो हम मर्दों के जिस्म को नोचेंगी ही नोचेंगी। हम मर्दों का जिस्म तुम्हारी आँखों के लिए ही तो होता है। है न?    
- अतुल सती अक्स

बुधवार, 31 मई 2017

हक़ीक़त

(1)
जब वक़्त का बरसना ख़त्म हुआ,
तब उम्र भी खुदको सुखा ही गयी।

(2)
जब पानी, पानी-पानी हुआ,
तब आग भी आग बुझा ही गयी।

(3)
जब शहर में खुदा का क़त्ल हुआ,
तब उसकी भी हक़ीक़त आ ही गयी।
(4)
जब रंजिश को इश्क से इश्क हुआ,
तब वो भी मुहब्बत निभा ही गयी।

मंगलवार, 2 मई 2017

पकिस्तान को एक सन्देश!!!


           (१)
कह दो देश के दुश्मन से,  
डरते नहीं हैं हम रण  से,
बदला हर  शहीद का लेंगे,
तेरी जमीं  के हर तृण  से।

           (२)
तुम हमको उकसाओ नहीं, 
यूँ   हमको धमकाओ नहीं, 
देश है.…  वीर सपूतों  का, 
यूँ हमको   आजमाओ नहीं,
धरती  का    श्रृंगार  करेंगे,
तेरे लहू के कण कण से।     कह दो देश के दुश्मन से ………….   

           (३) 
युद्ध  अब विकराल जो होगा ,
महाकाल हर एक वीर होगा,  
ना  भड़का तू इस ज्वाला को,
तेरा काल अब भारत होगा,
तेरा      तो     संहार करेंगे,
वीरों  के  रण  गर्जन से।    कह दो देश के दुश्मन से ………….  
 
           (४)  
ना  कश्मीर को झड़पेगा,
न कुछ और कभी हड़पेगा,
गर इस बार जो युद्ध हुआ,        
तू लाहौर को      तडपेगा,
ऐसा  तेरा     होम  करेंगे,
भस्म हो जायेगा रण से।  कह दो देश के दुश्मन से ………….   

           (५) 
नक़्शे से ही    मिटा  देंगे,
दुनिया से ही    हटा   देंगे,
नापाक इरादे ही        तेरे,
हैसियत तेरी     मिटा देंगे,
बचाव तेरा नहीं       करेंगे,
शस्त्र तुझे मिले जो ऋण से।     कह दो देश के दुश्मन से ………….   
           
                     -अतुल सती 'अक्स'   

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

किताब के पन्ने और वो गुलाब

जब भी ये मन उदास होता है 
मैं उस किताब के पन्ने पलटने लगता हूँ,
जिसमे कभी मैंने वो गुलाब रखा था, 
जिसे तूने अपने लबों से कभी छुआ था। 

तेरे ही रुखसार को छू कर वो गुलज़ार हुआ था। 
तुम मुस्कुराई थी, बहार बनके छाई थी।   
तेरी आँखों की वो चमक आज भी याद है मुझे। 

किस तरह से सीने से लिपट गयी थी तुम,
और ये बेकार के रिवाज़ों,
दरकते समाजों की ये,बेबस दुनिया, 
कहीं हो गयी थी गुम।      

कुछ नहीं कहा तुमने, कुछ नहीं कहा हमने,
बस साँसों का ही गीत,
गुनगुना रहे थे हम, मन में। 

न शब का ही पता था,न ही सहर का कोई इल्म। 
इब्तेदा उस इश्क की इस कदर हुई,
के अब तक उसी खुमारी में हूँ। 
पर,
कभी कभी यूँ ही दौड़ते भागते,
इस ज़िन्दगी के ख़्वाबों को पकड़ने की चाह में,  
ये  'अक्स' थक जाता है, 

तब,

जब भी ये मन उदास होता है 
मैं उस किताब के पन्ने पलटने लगता हूँ,
जिसमे कभी मैंने वो गुलाब रखा था, 
जिसे तूने अपने लबों से कभी छुआ था। 

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

मोहल्ला

मैं अब जब अपने घर जाता हूँ तो,
मेरा घर तो मिल जाता है,
पर अब मेरा वो मोहल्ला नहीं मिलता। 

बड़े हो गए हैं मोहल्ले में खेलने वाले बच्चे, 
हाथ मिलते हैं, गले भी मिल लेते हैं,
पर अब कोई दिल से नहीं मिलता।         

हर शाम की औरतों की बैठक, मर्दों की बैठक, 
वो अब सब, बस वाट्सएप्प पर मिलते हैं,
वहां अब छतों पर कोई नहीं मिलता।  
     
कभी जहाँ कभी खीर बने, या कोई ख़ास खाना,
वो एक कटोरी जो कभी पड़ोसी के घर तक आती-जाती थी,
वो कटोरी वाला प्यार नहीं मिलता।        

कभी जो जवान था मोहल्ला वो अब बूढ़ा हो गया है,
तन्हा रहकर बच्चों की तारीफ़ करते, सब बूढ़े ही दिखते हैं,
खाली घौंसलों में अब कोई पंछी नहीं मिलता।     
  
जाने वो घर हैं कि कोई क़ैदख़ाने, सब कैद हैं वहां,
नाम तो वही है जगह का, पर वहां अब जेल है,   
वहां अब वो पुराना मोहल्ला नहीं मिलता।      
                         - अतुल सती 'अक्स'
                 https://atulsati.blogspot.in/2017/04/blog-post.html