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मंगलवार, 20 जून 2017

खुद


यख बिजाम जड्डु च माँ,
यन त रजै भी च अर कम्बलु भी च मेरा काख पर,
पर माँ तेरी खुखली की निवति ते,
मि आज भी खौजणु छौं।
यन त पिताजि यख सब्बि साधन छन,
सुख सुबिधा मनोरंजना का,
पर पिताजि जू सुख घुघूति बसूदी मा छे, घुघ्घी मा छे,
मि आज भी वैते खौजणु छौं। 
अब मि नि करलू जिद्द घुघूति बसूदी की, 
नि करलू जिद्द खुखलि की,
रैण द्या मैंते अपरा काख मा तुम, 
थौक गयुँ मि यख यखुलि यखुलि रैकि।
तुम तै भि त खुद लगदि ह्वालि म्यारि, 
त क्या पै बोला हमुन दूर रैकि? 
-अक्स 

हिंदी अनुवाद ------------------------------------------------------------------------------------------------

यहाँ बहुत ठंड है माँ,
वैसे तो रजाई भी है और कम्बल भी है मेरे पास,
पर माँ तेरे गोद की गर्माहट को,
मैं आज भी खोज रहा हूँ। 
वैसे तो पिताजी यहाँ सभी साधन हैं, सुख सुविधा मनोरंजन के,
पर पिताजी जो सुख "घुघूती बसूदी" में था, आपकी पीठ की सवारी में था, 
मैं आज भी उसे खोज रहा हूँ। 
मैं अब नहीं करूँगा जिद घुघूती बसुदी खेलने की, 
न ही गोद में बैठने की जिद करूँगा। 
मेरे को बस अपने पास रहने दो आप, 
मैं थक गया हूँ यहाँ अकेले अकेले रह कर। 
आपको भी तो मेरी याद आती होगी, 
तो बोलो क्या पाया हमने एकदूसरे से दूर रह कर। 
-अक्स  

मंगलवार, 13 जून 2017

मेरी बैक क्लीवेज और उसे ताड़ती तुम लड़कियाँ


क्यों मेरी बैक क्लीवेज को ताड़ती हो तुम लड़कियाँ,
जब भी मैं झुकता हूँ कुछ उठाने को या
फिर बाइक पर बैठा होता हूँ किसी के साथ?
क्या मेरा अंडरवियर पहनना है तुम्हे?

क्यों मेरी बनियान पर हरदफा अटक जाती है,
तुम लड़किओं की निगाहें?
अगर झांके वो टीशर्ट के गले से? 
क्या तुम पहनोगी मेरी बनियान?

क्या अटका है मेरी छाती के बालों में तुम्हारा?
जो घूरती रहती हो तुम लड़कियां,
मेरी शर्ट के खुले हुए तीसरे बटन को?
कुछ खो गया है क्या वहां? 

क्यों मेरे पेट के उभार पर बैठती हैं निगाहें,
क्यों मेरे हर उभार को देखकर,
तुम्हारा शरीर जड़वत होजाता है?
क्या उन पठारों पर घर बनाना है तुम्हे?

क्यों नहीं तुम अपनी निगाहों पर पर्दा करती? 
क्यों हम मर्दों को बुर्का पहनाती हो?
क्यों बुर्क़े के भीतर भी हमें झांकती हो?
क्या तुम्हे भी अपना जीवन स्याह करना है?    

बोलो लड़किओं हरदफा, हरजगह, हरउम्र में,
क्यों हम मर्दों के जिस्मों को नोचती हो तुम?
क्या मर्द होना गुनाह हो गया?
या तुम्हे भी स्त्री से मर्द होना है?

शनिवार, 10 जून 2017

मेरा जिस्म और तुम लड़कियों की नज़र

मैं और मेरा जीवन किस तरह इस जनानी प्रधान दुनिया में गुजरता है ये बस मैं ही जानता हूँ।
मेट्रो में, ऑफिस में, बाजार में यहाँ तक कि मंदिर तक में, मैं जब भी जाता हूँ तो मेरे पेट के उभार को घूरती निगाहों के बीच खुद को समेटने का प्रयास करता हुआ बहुत ही असहाय महसूस करता हूँ।
जब मेरी टीशर्ट से मेरी बनियान थोड़ा सा भी बाहर झांकती है तो मेरे आसपास की लड़कियों की दरिंदगी उनकी आँखों से टपकने लगती है। अपनी टीशर्ट को सँभालने में तो कभी शर्ट के बटन को बंद करने में ही मेरी रूह कांप जाती है पर मैं अपने हाथों को नहीं कांपने देता। अपने कंधे और छाती को मैं बड़ी ही निडरता से ढक लेता हूँ।
कभी कुछ गिर जाए उसे उठाने के लिए झुकूँ, या कभी जब मैं अपने मित्र के साथ उसके पीछे बैठकर बाइक पर सैर करूँ और अगर मेरी टीशर्ट थोड़ा उठ जाए तो मुझे पता है तुम लड़कियों की नज़र कहाँ अटक जाती है। बताओ तुम, मैं,  मेरी बैक क्लीवेज को कैसे छुपाऊं? एक सेकंड के लिए भी तो तुम लड़कियां मुझसे और मुझ जैसे तामाम मर्दों के जिस्म से अपनी गिद्ध जैसी नज़रें नहीं हटाती हो। मुझसे छोटी या बड़ी या हमउम्र हो बस तुम घूरती ही जाती हो।
किस तरह और कहाँ कहाँ मैं खुद को बचाऊँ? इसीलिए शायद मुझे ही बुरका पहनना होगा, शायद इसीलिए ही तुम जनानिओं ने हम मर्दों के लिए बुरक़ा बनाया होगा, क्योंकि तुम लड़कियों की नज़रें तो हम मर्दों के जिस्म को नोचेंगी ही नोचेंगी। हम मर्दों का जिस्म तुम्हारी आँखों के लिए ही तो होता है। है न?    
- अतुल सती अक्स

बुधवार, 31 मई 2017

हक़ीक़त

(1)
जब वक़्त का बरसना ख़त्म हुआ,
तब उम्र भी खुदको सुखा ही गयी।

(2)
जब पानी, पानी-पानी हुआ,
तब आग भी आग बुझा ही गयी।

(3)
जब शहर में खुदा का क़त्ल हुआ,
तब उसकी भी हक़ीक़त आ ही गयी।
(4)
जब रंजिश को इश्क से इश्क हुआ,
तब वो भी मुहब्बत निभा ही गयी।

मंगलवार, 2 मई 2017

पकिस्तान को एक सन्देश!!!


           (१)
कह दो देश के दुश्मन से,  
डरते नहीं हैं हम रण  से,
बदला हर  शहीद का लेंगे,
तेरी जमीं  के हर तृण  से।

           (२)
तुम हमको उकसाओ नहीं, 
यूँ   हमको धमकाओ नहीं, 
देश है.…  वीर सपूतों  का, 
यूँ हमको   आजमाओ नहीं,
धरती  का    श्रृंगार  करेंगे,
तेरे लहू के कण कण से।     कह दो देश के दुश्मन से ………….   

           (३) 
युद्ध  अब विकराल जो होगा ,
महाकाल हर एक वीर होगा,  
ना  भड़का तू इस ज्वाला को,
तेरा काल अब भारत होगा,
तेरा      तो     संहार करेंगे,
वीरों  के  रण  गर्जन से।    कह दो देश के दुश्मन से ………….  
 
           (४)  
ना  कश्मीर को झड़पेगा,
न कुछ और कभी हड़पेगा,
गर इस बार जो युद्ध हुआ,        
तू लाहौर को      तडपेगा,
ऐसा  तेरा     होम  करेंगे,
भस्म हो जायेगा रण से।  कह दो देश के दुश्मन से ………….   

           (५) 
नक़्शे से ही    मिटा  देंगे,
दुनिया से ही    हटा   देंगे,
नापाक इरादे ही        तेरे,
हैसियत तेरी     मिटा देंगे,
बचाव तेरा नहीं       करेंगे,
शस्त्र तुझे मिले जो ऋण से।     कह दो देश के दुश्मन से ………….   
           
                     -अतुल सती 'अक्स'   

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

किताब के पन्ने और वो गुलाब

जब भी ये मन उदास होता है 
मैं उस किताब के पन्ने पलटने लगता हूँ,
जिसमे कभी मैंने वो गुलाब रखा था, 
जिसे तूने अपने लबों से कभी छुआ था। 

तेरे ही रुखसार को छू कर वो गुलज़ार हुआ था। 
तुम मुस्कुराई थी, बहार बनके छाई थी।   
तेरी आँखों की वो चमक आज भी याद है मुझे। 

किस तरह से सीने से लिपट गयी थी तुम,
और ये बेकार के रिवाज़ों,
दरकते समाजों की ये,बेबस दुनिया, 
कहीं हो गयी थी गुम।      

कुछ नहीं कहा तुमने, कुछ नहीं कहा हमने,
बस साँसों का ही गीत,
गुनगुना रहे थे हम, मन में। 

न शब का ही पता था,न ही सहर का कोई इल्म। 
इब्तेदा उस इश्क की इस कदर हुई,
के अब तक उसी खुमारी में हूँ। 
पर,
कभी कभी यूँ ही दौड़ते भागते,
इस ज़िन्दगी के ख़्वाबों को पकड़ने की चाह में,  
ये  'अक्स' थक जाता है, 

तब,

जब भी ये मन उदास होता है 
मैं उस किताब के पन्ने पलटने लगता हूँ,
जिसमे कभी मैंने वो गुलाब रखा था, 
जिसे तूने अपने लबों से कभी छुआ था। 

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

मोहल्ला

मैं अब जब अपने घर जाता हूँ तो,
मेरा घर तो मिल जाता है,
पर अब मेरा वो मोहल्ला नहीं मिलता। 

बड़े हो गए हैं मोहल्ले में खेलने वाले बच्चे, 
हाथ मिलते हैं, गले भी मिल लेते हैं,
पर अब कोई दिल से नहीं मिलता।         

हर शाम की औरतों की बैठक, मर्दों की बैठक, 
वो अब सब, बस वाट्सएप्प पर मिलते हैं,
वहां अब छतों पर कोई नहीं मिलता।  
     
कभी जहाँ कभी खीर बने, या कोई ख़ास खाना,
वो एक कटोरी जो कभी पड़ोसी के घर तक आती-जाती थी,
वो कटोरी वाला प्यार नहीं मिलता।        

कभी जो जवान था मोहल्ला वो अब बूढ़ा हो गया है,
तन्हा रहकर बच्चों की तारीफ़ करते, सब बूढ़े ही दिखते हैं,
खाली घौंसलों में अब कोई पंछी नहीं मिलता।     
  
जाने वो घर हैं कि कोई क़ैदख़ाने, सब कैद हैं वहां,
नाम तो वही है जगह का, पर वहां अब जेल है,   
वहां अब वो पुराना मोहल्ला नहीं मिलता।      
                         - अतुल सती 'अक्स'
                 https://atulsati.blogspot.in/2017/04/blog-post.html

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

चल मन बावरे !!!



चल मन बावरे !!!
चल चलें एक बार फिर। 
गंगा जी का छाला(1) एकबार फिर। 
वहीँ जहाँ अभी तक गंगा का दम नहीं घुटा,
फाँस(2) तो लगाई है पर अभी भी कुछ ज़िंदा है वो,
यहाँ तो जहर दे कर मार दिया है हमने उसे।   


चल मन बावरे !!!
चल चलें एक बार फिर। 
उन पहाड़ों के पास, जो हैं बस मिट्टी के ढ़ेर,
जो बिना अपनों के साथ के, दरक रहे हैं,
उन्हीं त्यागे हुए पुरखों के पास,  
कुछ पराये से अपनों के पास,
यहाँ तो अपने को भी मैं अपना नहीं कह सकता।

चल मन बावरे !!!
चल चलें एक बार फिर।
जँगलों की छाँव में एक बार फिर से।  
जो बस अब चिता से धूं धूं कर जल उठेंगे,
उन्ही सुलगते सवालों के जलते जवाबों के बीच,
यहाँ तो बाँझ बुराँस के बौण(3) बस कविताओं गानों में ही हैं। 


चल मन बावरे !!!
चल चलें एक बार फिर। 
अपने झूठे और जूठे चिंताओं का नकली बोझ लिए,
फिर से अपनी खोयी पहचान को,
जबरदस्ती की एक पहाड़ी पहचान देने को। 
एक बार फिर अपने मुल्क अपने गाँव,
यहाँ तो मैं पहाड़ों से बड़ा हो गया हूँ पहाड़ों को छोटा दिखा कर। 

चल मन बावरे !!!
चल चलें एक बार फिर। 
1 - किनारे 
2 - फाँसी 
3 - जँगल  

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

मैं शिव रात्रि नहीं मनाता।


एक शिव भक्त होने के भी बावजूद। केदार भूमि से होने के बावजूद मैं शिवरात्रि या सावन अभिषेक नहीं करता। क्यूंकि मैं उस लायक ही नहीं हूँ। मैं पांच साल की उम्र से शिव रात्रि के व्रत लेता रहा हूँ और पिछले चार सालों से मैंने कोई व्रत नहीं लिया। क्यूंकि मैं उसके लायक ही नहीं हूँ। 
1)प्रकृति का मान ही नहीं रखता हूँ। जब भी जहाँ कहीं भी जाता हूँ पोलीथीन, कचरा फैलाता हूँ। जब माँ का मान नहीं होता तो पिता कभी खुश नहीं रह सकते।

2)पानी शिव लिंग पर चढ़ा कर सोचता था कि बड़ा पुण्य मिलेगा लेकिन कभी अपने घर का टपकता पानी नहीं बचाया।
कभी जल संरक्षण नहीं किया। तो मैं शिव लिंग पर जल चढ़ाने का अधिकारी नहीं रहा।

3)शिव ऊर्जा के स्त्रोत हैं, और मैंने कभी भी कोई भी ऊर्जा नहीं बचाई। उसका संरक्षण नहीं किया। तो किस मुख से मैं धूप दिया बाती करूँ?

4)शिव वन में रहते हैं, और मैंने कभी वन संरक्षण में कोई काम नहीं किया। हमारे पहाड़ों में वन जलते हैं उन्हें बचाने के लिए कभी कोई काम नहीं किया। जब शिव का घर ही जला दिया तो किस मुख से उसके सामने जाऊं? बेल पत्री कैसे चढाउँ?

5)गौ हत्या रोकने पर कभी कुछ काम नहीं किया, माँ बोला उसे पर बस झूठा या कचरा ही खिलाया, पोलीथीन खिलाई, किस मुहं से उसके संतान वाला दूध मैं अपने पिता पर चढाउँ? न ही माँ का सम्मान किया न ही पिता का, तो किस मुहं से माँ का दूध पिता पर चढाउँ।

6)मेरी दुनिया में सब कुछ तो उसी शिव का है मैंने कुछ भी तो कभी अर्जित नहीं किया, तो जिस धन को मैं सबसे ऊपर मानता हूँ(जितना ज्यादा चढ़ावा उतना ही बड़ा मैं, इसे श्रद्धा समझता हूँ और भक्ति भी भाव भी) उसी धन को मैं कैसे शिव को अर्पित करूँ?

तो मैं क्या अर्पित करूँ परम पिता परमेश्वेर को जो मुझे कोई ग्लानि से न भरे। मेरा प्रेम निश्छल है उसी को अर्पित करता हूँ।
आप लोग धन, दूध, जल, बेल पत्री अर्पण करो, क्यूंकि मुझे पूरा यक़ीन है आप मेरी तरह लापरवाह तो कतई नहीं होंगे है ना।
ॐ नम: शिवाय !!!
                                            -अतुल सती 'अक्स'