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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

क्यों है?

















ये सिक्का खरा है तो वो खोटा क्यों है?
ये धागा रिश्ते का महीन,वो मोटा क्यों है?

सदा खामोश रह कर ही सुनता है वो तुझे, 
पर नज़रों में तुम्हारे ही वो झूठा क्यों है?

उम्र में बड़े लोग बड़े ही होते हैं अक्सर,
गर वो कद में छोटा है तो वो छोटा क्यों है?

लहू रिसने लगा है अश्कों की शक्ल में अब,
कोई ये न कहे इश्क में आंसू का टोटा क्यों है? 

बड़ी ही वफ़ादार कौम सुनी है मर्दों की 'अक्स',
गर ये सच है तो हर शहर में ये कोठा क्यों है?
                                    -अतुल सती '#अक्स'

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

ख़्वाबों से मरासिम


सुबह सुबह जब,
मेरी नींद के दरवाज़े पर,
एक ख्वाब ने दस्तक दी।
मैं चौंक सा गया।
किवाड़ खोले तो देखा के एक ख्वाब खड़ा है। 

लगा ऐसे मानो वो कुछ कहना चाह रहा था,
शक्ल उसकी जानी पहचानी तो थी, पर,
दिमाग पर बहुत जोर देकर भी ना पहचान पाया।
जैसे बाद मुद्दतों के कोई छुटपन का यार मिलता है,
ख़ुशी सी लगती तो है दिल को,
पर दिमाग परेशान सा करता है।
कौन है ये? जानता तो हूँ पर पहचान नहीं पा रहा।
उसका मुस्कुराता चेहरा,
मानो पुकार रहा था मुझे,
ले जाने आया था संग अपने,
मुझे इस नीले फ़लक में एक बेफिक्र परिंदे की मानिंद उड़ाने को।
घबरा के में उठ गया और पेशानी पर मेरी ठंडी कुछ बूँदें चमक उठी।
कौन था ये जाना पहचाना सा ख्वाब?
फिर याद आया कि मैंने ख्वाब देखने कबके बंद कर दिए थे।
हँसते हुए ख्वाब, ऊंची उड़ान लिए हुए ख्वाब।
इस ज़िन्दगी में ख़ुशी तो खो ही दी थी जागते हुए,
पर,
अब नींद में भी हँसते ख़्वाबों से कमबख्त मरासिम न रहा

                            - अतुल सती 'अक्स'- Atul Sati 'aks'

दौर



इतनी भीड़ इकठ्ठा हो गयी है,
मेरे इर्दगिर्द कि,
अब खुद का ही अक्स अज़नबी लगता है, 
खुद से ही नफरतों का,
जो अब दौर निकल पड़ा है,
वो दौर अब कहीं थमता नहीं।


समझते हैं मुझे, 
ऐसा कहते तो हैं,
पर मेरे एहसासों को नज़रअंदाज़ करते हैं,
जो दौर मेरे जज़्बात के नज़रअन्दाज़ी का,
शुरू हुआ है, 
वो दौर अब कहीं थमता नहीं।

इश्क भी है, 
रश्क भी है मुझपर,
जिगरी भी हूँ,
हबीब भी,
लेकिन तन्हाई के सलीब पर,
टांगने का जो दौर शुरू हुआ है,
वो दौर अब कहीं थमता नहीं।

चीखती हैं, 
चिल्लाती हैं,
मेरे भीतर की खामोशियाँ,
उन खामोशियों का तेज़ बहुत तेज़ शोर,
वो शोर अब कहीं थमता नहीं।
                                -अतुल सती अक्स https://www.facebook.com/AtulSati.aks

सोमवार, 21 सितंबर 2015

सफर

इस ज़िन्दगी की दौड़ में मैंने इज़्ज़तें पायी, शोहरतें पाईं, 
पर इनको पाते पाते कुछ खो भी दिया।    
दूसरों को खुश रखने को अपना अक्स खोया, 
अक्स खोया तो धीरे धीरे जूनून खो दिया,
दौलतमंद हूँ शोहरत मंद भी हूँ,
लेकिन ऐ दोस्त सुकूनमंद नहीं,
कहते हैं सुकून जिसको ए 'अक्स',
उसी एक लफ्ज़ को जाने कहाँ खो दिया। 

आँख खुल जाती है सुबह,
तो अब उठना ही पड़ता है बेमन,
उधारी चुकानी है,
तो काम पर भी जाना ही होता है बेमन,
आलम ये है कि जवानी शुरू होती है,
बस बुढ़ापा ठीक करने को केवल, 
और बचपन का तो बचपन में ही क़त्ल कर दिया जाता है।
थकान का इस ज़िन्दगी में कोई मतलब नहीं,
मौत भी कोई अब मुक्कमल  नींद नहीं। 
बिस्तर खरीद लिया है पर नींद नहीं,
नींद का वक़्त ही खो दिया।
मकान बनाने की दौड़ में अपना घर खो दिया। 
कहते हैं सुकून जिसको ए 'अक्स',
उसी एक लफ्ज़ को जाने कहाँ खो दिया। 
                          -अतुल सती 'अक्स'  
  
         
        

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

दर्द

जो भी ये ज़िन्दगी दे, तू उसका तराना ना बना,
दिल में दिमाग रख कर,तू  उसे दीवाना ना बना।     

दर्द जो मिला है,अश्क बन कर बहने दे उसे,
रोक कर उसको  यूँ जख्मों का निशां ना बना। 

ये क्या अब उसके किस्से लोगों को सुनाता है,
इश्क को अपने यूँ, बेवजह अफसाना ना बना। 

दिल तो दिल है, दिल को दिल ही रहने दो,
इसको बेवजह यूँ, ग़म का ठिकाना ना बना। 

ख़ुशी मिली तो जी भर के जिया था, ऐ दिल,
ग़म-ए-दौर में यूँ,मरने का  बहाना ना बना। 

जो हुआ सो हुआ, उसे तो होना ही था  'अक्स',
अब नफरतों से भरा यूँ तो, ये जमाना ना बना। 
                    -अतुल सती 'अक्स'    

त्वेसे ही मेरी य दुनिया...अनंतनाद !!!



त्वेसे ही मेरी य दुनिया 
त्वेसे ही मेरी य माया 

तू मेरा मन मा यन बसीं च,
जन जून हो ये आसमां मा 

त्वे देखि की कुजणि कख ख्वे जांदु मी,
सुध बुध हर्चे की जणि कख डबड्यान्दु मी 

तेरी माया मा...तेरी माया मा...तेरी माया मा...तेरी माया मा...

जून ते तकदूँ रातों  मा,
निंद भी नि च अब आँख्यों मा,

मेरी य सेरी दुनिया बसीं च 
तेरी सुरम्यलि आँख्यों मा। 

त्वेसे ही मेरी य दुनिया 
त्वेसे ही मेरी य माया 

तू मेरा मन मा यन बसीं च,
जन जून हो ये आसमां मा 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

इतिहास

जिस दिन अपना इतिहास,
हम लोग जान जायेंगे,
किस तरह खुद से,
हम लोग,
अपनी नज़रें मिलाएंगे ? 
सत्य उसी को मानते हैं, 
जो हमें लगे है अच्छा,
जब सत्य सचमें हम जानेंगे, 
तब बोलो,
कैसे अपना सत्य भुलायेंगे?      
याद रखो अपना सच,
खोजो जानो समझो उसको,
भूलो मत जो कुछ भी हुआ,
अपने किये धरे का, 
लेकिन माफ़ी माँगो,
और माफ़ी देदो,
नहीं तो ऊपर वाले को बोलो फिर,
क्या अपना मुख दिखाएंगे?     
जिस दिन अपना इतिहास,
हम लोग जान जायेंगे,
किस तरह खुद से,
हम लोग,
अपनी नज़रें मिलाएंगे ?     
                                                 -अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

धै !!! मेरा घौरे की

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
यख बस असमान ही असमान च, 
कखि न त धरती च, न पहाड, न कोई बौण, 
न कोई डाली बोठली,
कु जाणि वख घोर मा, बौण कण होला?
पन्देरा कण होला वु घुघूती कण होली?  

सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वखि वे बौण मा, 
जू जलणु छौ ये जेठ मा, जू जेठ बारो मासी छौ,
वखि जख हमारू अपरू घौर छौ,
वे बौण मा जू वु बरगदो डालु च,
जू फुकेगी ये विगास मा, 
हमारा बरगदे का विनाश मा,
वे मा मौल्यार ए जाली,
मेरी लाटी, मेरी चखुली,
तू जु एक बार घोर ऐ जाली।         

देख दी वे बौण मा सब्बि डाली सूखी गेन,
वेका सारा पोथ्ला फुर्र करी के उड़ी गेन,
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
बोड़ी की जू घौर हम जोला,
यु अमर जेठ खत्म हुए जालु,
तेरा मेरा अर ये बोण का, ये बरगद का,
आँख्यों का बस्ग्याला का बाद,
जू बसंत औलू,
वू ही सदानि रेलू,       
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब,
वु पुरखों कू घौर,
हम पोथ्लों कु ठौर,
धै लगौणु च हमते,
चल अपरा जोड़ों ते खोजदन  अब, 
सुन मेरी चखुली, मेरी लाटी,
चल अपरा घोर चलदन अब। 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

एक अकेला ठूँठ


सुबह सुबह एक ख्वाब आया, 

देखा कि मैं किसी बंज़र सूखी जमीन पर खड़ा हूँ,
मैं हूँ,एक अकेला ठूँठ किसी पेड़ का,
सूखा और हर किसी से रूठा हुआ,
जमीन के भी माथे पर शिकन नुमा,
दरारें थी, न जाने कितनी गहरी। 
एक दम सूखी टूटी फूटी, 
उन दरारों देख कर जमीन की,
मुझे अपने कुछ रिश्ते याद आ गए। 
उनमें भी यूँ ही सूखा पड़ा था। 
उनमें भी कुछ यूँ ही दरारें थीं।

कुछ दरारें माँ बाप के साथ की दिखी,
जिनके बिना बचपन में मुझसे रहा नहीं जाता था। 
और आज उनका बोझ भी सहा नहीं जाता। 
हर दिन बात करना तो बहुत बड़ी बात है,
पर हफ्ते में कभी फ़ोन पर बात हो भी जाती है,तो, 
समझता हूँ कि,एक बड़ा एहसान कर दिया मैंने उनपर। 
भाई का हाल तो पता ही नहीं मुझे,
अब उसकी फैमिली अलग और मेरी अलग हो गयी है न। 
कभी हम भी एक ही फैमिली का हिस्सा थे। 
साथ साथ खेले थे कभी,
और आज हाल भी नहीं पूछते कभी।
याद है बचपन में कभी भाई कहीं फंस जाता था मुसीबत में,
तो मैं हाथ बढ़ा कर उसे थामता था, गले लगाता था,
आज तो भाई से हाथ भी नहीं मिलाया जाता,
गले लगाना तो बड़ी बात है। 

मेरे पर एक सूखी बेल भी लिपटी हुई थी,
शायद मेरी बीवी थी वो, सूखी हुई मुरझाई हुई,
शिकायत से भरी हुई कि, मैंने उसे पनपने ही नहीं दिया,
खुद की दुनिया में इतना फैला कि उसे भी सोख लिया,
वो लिपटी तो थी मुझसे वो, 
पर कहीं कहीं पर कुछ फासले थे,
जो दिखने में तो,बाल बराबर ही थे, 
पर यूँ महसूस होते थे, गोया हम दूर हों इतना कि,
लाख सदायें दें एकदूसरे को, 
पर ना तो मुझे वो दिखती ही है,ना मैं ही उसे सुनायी देता हूँ। 
हम तो जमीन से पानी सोखने में,सूरज से रौशनी लेने में, हवा लेने में, 
इतना ज्यादा खो गये थे कि,पता ही नहीं चला कि कब ये, 
पलों की दूरी, सदिओं के फासले हो गए।

दोस्ती भी मतलब से ही की थी मैंने,
हवा, जमीन, पानी से कि मेरा मतलब निकल जाये,
और आज हकीकत ये ही है कि,
वो सब साथ तो हैं मेरे, पर जमीन सूख गयी,
हवा रूठ गयी, पानी का पता ही नहीं है अब,
मैंने तो कभी कोशिश भी नहीं की, कि, ये दूरी क्यों हैं,
मैं तो जमीन से नीचे भी था, और ऊपर भी,
लगा था आकाश छू लूंगा, मुझे इनकी क्या जरूरत।
कदर नहीं कर पाया, पर, 
आज बहुत याद आते हैं ये सब,
जहाँ मैं दरारों की जमीन पर खड़ा हूँ,
एकदम तन्हा, एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह। 
आँख खुली तो देखा कि वाक़ई में ये दरारें हैं,
वाक़ई में मैं एकदम तन्हा हूँ ,एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह।
मैंने तो दरारों को वक़्त रहते पाटा नहीं,
पर आप पाट लो इनको वक़्त रहते,
नहीं तो कहीं किसी जमीन पर खड़े होंगे,
मेरी ही तरह, 
एकदम तन्हा, एक सूखे हुए दरख्त के ठूँठ की तरह।