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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कखि तुम भी अखबार (जन वोटर) तो नहीं?


अखबार सुबेर सुबेर सबसे पहले चाहिए होता है। सर माथे पर होता है। एक एक बात जो जो वो अखबार बोलता है सब पढ़ते हैं बल हम। सब बींग्ते हैं, कखि खुटु लगी ता वीते उठै कि अपर बरमंड मा छुएकी शिरोधार्य करते हैं। सुबेर सुबेर वो सबसे ज्यादा प्रिय होता है और सर्वोच्च सम्मान पाता है। (रिजल्ट याद है? बोर्ड एग्जाम का)
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कुछ समय बाद जब वो पुराना हो जाता है और अखबार पूरा पूरा यक़ीन करने लगता है अपने रीडर पर तो उसकी हम जिल्द बनाते हैं, उस अखबार की आड़ में हम अपने कर्मों की किताबों को, कॉपियों को छुपाते हैं। उस अखबार की आड़ में हमारे सारे राज़ छुप जाते हैं। बींगै बल आप कुछ?
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अब भैजी अखबार हुयगी कुछ पुराणु मतलब सरकार बणी, रीडर नेता हुयगी, मंत्री हुयगी, अब क्या? अब अखबार ते काट पीटि की कखि कै रैक मा बिछौंदा छन। अर नेता की कज्याण उसी के ऊपर पकी पकाई रोटी संभालेगी। अखबार गर्मी से फुक जाता है पर बेचारा कर भी क्या सकता है, अब तो उसने चुन लिया था न कि किसके घर जाना था?
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अब यन्न च भाईसाहब नेता के परिवार को भैर गार्डन मा जाना है बल। वहां थोड़ी मिट्टी थोड़ी गन्दगी ठैरी तो कौन काम आएगा बल? कौन है वो जिसे बिछाया जायेगा और किसके ऊपर उसका पूरा परिवार बैठेगा अपने ढेबरे टिका कर?
अख़बार !!! टडा !!!!!!!!!!!!!!
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वो बेचारा अखबार किसने क्या नाश्ता किया किसने नहीं? किसने क्या खाया किसको कब्ज? सब समझता है।
नेता के परिवार की जायदाद है वो, अब वो मालिक ठैरे, जैसे मन करें उनका वैसा ही तो उपयोग करेंगे बल।
पर इथा ही दुर्गति नि च अखबारे, नेता जी का परिवारन कलेऊ खैली अर गन्दगी हुयगी त अखबारन ही तो उठाएंगे बल उसे, गिरी हुई दाल, सब्जी, चटनी सब अखबार में ही समेटा जायेगा।
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अब तक अखबार की यात्रा सर से शुरू हुई, पैर लगा तो सर पर छुआ। फिर उसे काट पीट कर कभी ज़िल्द बनाया, कभी कहीं बिछाया, कभी उसी पर बैठे, कभी उसी से साफ़ सफाई की। पर आगे अभी उसके नसीब में बहुत कुछ था।
...
बल नेता जी को सर्दी लग रही थी तो गर्मी के लिए अख़बार को ही जला कर दंगे करवाये जायेंगे और शाखों, दरख्तों को जला कर जंगल में आग लगाई। बॉन फ़ायर कहते हैं इसे बल वो।
पर यथा ही होंदु त भलू छौ, पर रे निर्भगी !!! नेता जी का नातिन पॉटी कर ली बल, अब वुई अखबार, जु कभी बरमंड मा धरी छौ वेन ही अब पूठा पुंजोणा छन।
तो समझे बाबू, जब तक अखबार ने अपनी खबर नहीं सुनायी थी, उसने नहीं बताया कि रीडर के लिए उसके पास क्या खबर है तब तक वो शिरोधार्य था और अब?????
..
किसे चुना था ये भी याद रखो। कहीं तुम भी पूठा बर्थने के काम तो नहीं आरहे?
कहीं तुम भी जल जल कर अपने नेता को गर्मी तो नहीं दे रहे, दंगे करवा कर, अपने पूर्वजों (पेड़) को जला कर?
वोटर और अखबार में कोई अंतर मिले तो बताना। कहीं तुम भी वोटर के नाम पर अखबार तो नहीं बन रहे न? सोच समझ कर हाँ...... किसे अपना रीडर चुन रहे हो? रद्दी में जाने का ऑप्शन तो हमेशा ही है।
- अतुल सती 'अक्स'

https://atulsati.blogspot.in/2017/01/blog-post_31.html  

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

लघु कथा: तानसेन अर यूट्यूब !!!

एक मनखी सी दिखेन वालु आदमी मिला मुझे बल, एक बुराँस के पेड़ के नीचे बैठे काफल खा रहा था। उसके कपडे देख कर लग रहा था कि जैसे किसी नाटक मंडली से भागा हुआ है।

मैं तो वहां उस जंगल का ठेकेदार ठैरा। सो रॉब डाल कर बोला कि चल छोड़ इन काफल को और भाग जा यहाँ से।
मैंने पूछा "कौन है रे तू? और यहाँ क्या कर रहा है बाँझ बुराँस के नीचे? तेरे को ये हिम्मत कहाँ से हुई कि तू यहाँ बैठ सके और काफल खा सके।"

पेली ता वू खित्त करि की हँसी अर तब वैन मेरी तरफ देखि की बोली " मैं तानसेन हूँ। अकबर के नवरत्न में से एक। और ये काफल मुझे वन देवी ने दिए हैं। मैंने उन्हें राग मल्हार सुनाया तो उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी मुझे यहाँ आराम करने को बोला और काफल दिए खाने को।"

"तानसेन!!! कौन तानसेन??? अच्छा तुम बल वो ही हो न जो बिना लूप लगाए गाता था और वो भी बिना ऑटो ट्यून किये, ऐसा सुना है मैंने। तुम गाते ही क्या थे? अ आ इ ई जैसा ही तो गाते थे? उसमे बोल कहाँ थे बल? "                      
मैंने भी अपना सारा ज्ञान उड़ेल दिया।  कहीं बल मेरे को कच्चा खिलाड़ी न समझे। 

"अरे मैंने एक से एक राग गाये हैं, राग मालकोश, मल्हार, भैरवी और न जाने क्या क्या, यहाँ की वन देवी ने भी सुने और सराहे हैं, तभी तो मुझे ये काफल मिले। " तानसेन थोड़ा सा सकपका कर बोले। 

"अच्छा !!! अगर इतने ही बड़े कलाकार हो तो अपना यूट्यूब लिंक दो मुझे। कितने व्यूज हैं? कितने सब्सक्राइब? कोई विडियो ? कोई रिवर्ब-नेशन, साउंड-क्लाउड लिंक? " नहले पर दहला मारा मैंने, मैं भी कहाँ कम था बल? आज का युवा ठैरा सब जानता हूँ, सब कुछ।

"क्या? यू---- यू-----  यूट्यूब? व्यूज? स---- स----  सब्सक्राइब? ऐसा तो कुछ नहीं है मेरे भाई। कोई विडियो भी नहीं है। " तानसेन ने निराश हो कर कहा। 

" क्या??????????? 
यूट्यूब लिंक नहीं है???? फिर तो तुम बल कहीं से भी कोई सिंगर मतलब गायक नहीं ठैरे। काफल पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं। वापस करो और निकल जाओ। बड़े आये बिना यूट्यूब के सिंगर। न जाने कहाँ कहाँ से आ जाते हैं।" मैंने डपटते हुए तानसेन से काफल छीने और वहां से भगा दिया। 
                                          - अतुल सती 'अक्स'

बुधवार, 18 जनवरी 2017

भैजी भुल्ला की बथ: चंद्रगुप्त- घनानंद-धनानंद-नारायणानंद-बाहुबली- उत्तराखंड- भंगला-आनंद



"बल भैजी ये क्या हो रहा है हमारे उत्तराखंड में बल? मैंने सुना बल कुछ लोग, कुछ मेहनत-कश लोग जो कि अपने अपने घर के लिए, अपने आसपास के लोगों के घर के लिए नीवं खोद रहे थे, एक मजबूत घर, कॉलोनी बनाने के लिए, जिन्होंने नक्शा भी बना दिया था बल। उन्ही को ठेका नहीं मिला। अखबार में आया है बल की जन रगड़ भगड़ (लैंडस्लाइड) होंदी च और वेमा सारे मकान, नीवं अर मनखी दब जाते हैं बल ठीक वन्नी वो लोग पैराशूट के नीचे दब गए बल।" भुल्ला अखबार को पढ़ते हुए भैजी से बात कर रहा था, और भैजी थे चिलम सजा रहे थे।    
भैजी ने एक लंबा कश खींचा और कहा: "हाँ भुल्ला ! सही बोली तिन। मगध का राजा घनानंद और उसके दरबारियों को हराने को चाणक्य ने बल चंद्रगुप्त तैयार तो किया और सेना भी, पर घनानंद तो घनानंद ठैरा। वेन अपरा दरबारियों ते एक जादुई बैग दिया बल जिसका नाम है पैराशूट। और उसकी सारे दरबारी अपर बाल बच्चों सहित पैराशूट से लटक कर चंद्रगुप्त की सेना पर गिर गए। जैसे बल बाहुबली में बाहुबली ने किया था। याद है तेरे को? " 
"भैजी चिलम कुछ ज्यादा ही खींच दी तुमने बल! घनानन्द तो अपने घन्ना भाई ठैरे! वो तो धनानंद था चंद्रगुप्त वाला।" भुल्ला की समझ में कुछ नहीं आ रहा था की भैजी क्या बथ लगा रहे थे।  भैजी हँसे और फिर एक गहरा कश लेकर बोले: अरे लाटा तेरे बींगीने में नहीं आरहा। अब घनानंद मेरा मतलब धनानंद के दरबारियों के नीचे चंद्रगुप्त की सेना दफ़न।  और उनके ऊपर कौन? धनानंद के दरबारी।  अब चंद्रगुप्त की सेना जिनके खिलाफ लड़ रही थी वो तो अब बल उसकी ही सेना में ठैरे। अब लड़ेंगे किससे? और युद्ध में चाणक्य तो आता नहीं तो उसे  नहीं पता कि क्या हुआ क्या नहीं? यहाँ तक कि मैंने सुना है बल घनानंद का बोड़ा नारयणानंद अपने बेटे के साथ चंद्रगुप्त की सेना में शामिल हो गया। 
"भैजी तुमने न भंगले- गाँजे की खेती करके अपना मशरूम कर दिया बल। अब तुम बोलोगे की घनानंद भी खुद अपने किले का दरवाजा खोल कर चंद्रगुप्त की सेना में मिल जायेगा??? और चंद्रगुप्त को हटा कर फिर घनानंद ही फिर से राजा बन जायेगा? और चाणक्य ही उसे राजा बनाएगा??? "
"भुल्ला एह!!! अब बींगी न तू! मि बोल्नु छौं त्वेते तू भी भंगला उगा, बरमंड में जल्दी घुसेगी बात।"
भुल्ला को अभी भी समझ में नहीं आया था कि उत्तराखंड में सबने इतनी भांग क्यों उगाई? और घनानंद और चंद्रगुप्त चाणक्य का उत्तराखंड के ठेकेदारों से क्या लेना देना? भुल्ला पर भी भाँग का नशा हावी था। और उत्तराखंड में चुनाव का।  और आप पर????                            - अतुल सती 'अक्स'            
                        

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

कुछ गिले कुछ शिकवे ज़िन्दगी से



ज़िन्दगी! ए ज़िन्दगी! 
सुन ज़िन्दगी!   
मेरी ज़िन्दगी! 

मत खेल मेरे,
जज्बात से तू,
खफा जो हुआ तो,
तुझे भी मैं छोडूं 
---------------------ज़िन्दगी! ए ज़िन्दगी! 

किसी मोड़ पर तो,
मिल तो, मुझे तू,
कुछ मेरी सुन, 
कुछ अपनी सुना तू,
 -----------------------ज़िन्दगी! ए ज़िन्दगी!
 
ये किस बज़्म में,
ले के आ गयी तू,
यहाँ सब मुझको,
लगे अजनबी क्यूँ, 
-------------------ज़िन्दगी! ए ज़िन्दगी!  

तबाह जो हुआ मैं,
तो,होगी तबाह तू, 
तू फिर से शुरू हो,
या ख़त्म ही हो तू,
------------------ज़िन्दगी! ए ज़िन्दगी! 
                                                        -अतुल'अक्स'

रविवार, 8 जनवरी 2017

यक्ष प्रश्न: नारीत्व का पौरुष से || अक्स की बातें...






जब सृष्टि के हैं हम भाग बराबर, फिर क्यों तुम्हारा मुझपर अधिकार रहा?
और हिस्से में सदा ही तुम्हारे सम्मान?, और मेरे हिस्से बस तिरस्कार रहा।   
क्यों इतिहास के हर पन्ने पर पौरुष बस खामोश रहा?
क्यों इतिहास के हर पन्ने पर पौरुष बस खामोश रहा?

जब वस्तु समझ, मेरा दांव लगा और चीरहरण, सरे आम हुआ, 
जब भीख समझ, मुझे बाँट दिया और जीवन भर अपमान हुआ।   
जब आग तन झुलसा न सकी, पर मन भीतर भीतर झुलस गया,
और जब सुनी सुनायी बातों पर ही, मेरे मातृत्व को वनवास मिला। 

गर ये ही सब मैं, तुम संग करती, तो तुम क्या करते ?
उत्तर दो !!! 
क्यों इतिहास के हर पन्ने पर, पौरुष बस खामोश रहा?

जब चौदह बरस, बस खड़े खड़े, मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया,
और चारों नववधुओं में, सिर्फ मुझे विछोह? मेरा क्या अपराध रहा?
कह के जाते, दिन में जाते, क्यों सारे वचनों को तोड़ दिया?
और जग को जगाने हेतु तुमने, मुझको सोते में ही छोड़ दिया?


गर ये ही सब मैं, तुम संग करती, तो तुम क्या करते ?
उत्तर दो !!! 
क्यों इतिहास के हर पन्ने पर, पौरुष बस खामोश रहा?

जब एक पुरुष ने, एक पुरुष का, ये कैसा सम्मान किया?
काट शीश अपनी ही माँ का, ये कैसा ऋणदान किया?
जब विवाह ही नहीं करना था तुमने, तो क्यों था मेरा हरण किया?
और जो करे कुदशा एक स्त्री की, क्यों ऐसे प्रण का वरण किया?


गर ये ही सब मैं, तुम संग करती, तो तुम क्या करते ?
उत्तर दो !!! 
क्यों इतिहास के हर पन्ने पर, पौरुष बस खामोश रहा?
                                  - अतुल सती 'अक्स'   
              
    


मंगलवार, 3 जनवरी 2017

आप मेरी जगह होते तो क्या करते?


कल मैं एक मंदिर के आगे से गुजर रहा था प्रणाम करने के लिए जैसे ही सर झुकाया तो देखा कि एक लड़की(युवती) एकदम झीने से स्लीवलेस टॉप में और बहुत छोटे नेकर में मंदिर आयी हुई थी। एकदम गौर वर्ण की सुंदरी साक्षात् अप्सरा जैसी लग रही थी। मैं मुख से याद तो भगवान को कर रहा था लेकिन मन ही मन उस लड़की के अंग प्रत्यंग देख रहा था।
बल की खूबसूरत थी वो। लेकिन उसको देखने के चक्कर में भगवान की मूर्ति की ओर देख ही नहीं पाया। मन लगा कर, ध्यान लगा कर पूजा कर ही नहीं पाया।  
अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि
१) क्या इसमें कोई गलत बात है?
२) क्या इस घटना में किसी की गलती है?
२)और है तो गलती किसकी है?
३) और क्या गलती है?
४) और अगर आप मेरी जगह होते तो आप क्या करते?
 
अच्छा जवाब वो देना जो दिल कहे, मन कहे, दिमाग से कुछ कमेंट मत लिखना। अपना सच तो आप भी जानते ही होंगे।      

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

भैजी भुल्ला की बथ: (हिन्दू धरम पर अटैक )

भैजी भुल्ला की बथ: (हिन्दू धरम पर अटैक )
"भैजी!!! अरे ओ भैजी!!! घोर अनर्थ हो गया बल। हमारा हिन्दू धरम पर अटैक हो गया। खत्म होने वाला है हिन्दू धरम। अब क्या होगा भेजी? मेरी जिकुड़ी में तो कबलाट होने लगा है।(जी घबरा रहा है)""अरे भुल्ला!!! तू भी ना क्या हो गया हिन्दू धरम को? आज तक तो खत्म नहीं हुआ बल अब कैसे खत्म होने लग गया? मैं तो अब शास्त्री भी बन गया था वेदपाठी से, मेरे ही दाँ(वक़्त) ऐसा होना था क्या? अब मैं पैसे कैसे कमाऊँगा यार?
बता तो सही हुआ क्या है? किसने किया?"
"अरे भैजी मैंने सुना बल की कोई खान है जो बहुत अमीर है, और उसने किसी ईरानी से मिल कर हम पर हमला कर दिया है। मुग़ल जो नि कर पाये जो अँगरेज़ नि कर पाये उसने कर दिया बल। टीवी पर देखा मैंने सच्ची। बड़े बड़े पंडित लोग बोल रहे थे की उसने हमारे धरम पर हमला किया है। महादेव भी उससे भाग रहे थे। उसने बोला बल बाबा लोग पाखंडी हैं। अब क्या होगा भैजी??? उसने बल पी भी राखी है बल पी के है वो।"
"अरे लाटा!!! वो तो पिक्चर है रे!!! आमिर खान की और राजू हिरानी की। तूने भी सुध्धि-मुध्धि(बेवजह) डरा दिया था। अरे उसने गलत क्या बोला बल? बाबा लोग तब से हमें बेवकूफ ही बनाते हैं। और हम गधे उन्हें भगवान बना देते हैं। आर शिवजी वाली जो बात है वो तो एक आदमी था जिसने वेशभूषा बना राखी थी शिव जी की।
और एक बात बता सड़क पर, चौराहे पर कितने लोग मिलते हैं शिव,गणेश, काली, हनुमान बन कर भीख मांगते हैं तब कख हर्ची(कहाँ खो) जाता है हिन्दू धरम के ठेकेदारों का प्रेम? तब तो सब उन्हें पैसे देकर या डरा धमका कर भगा देते हैं। तब नी होता बल अपमान? अरे वो जो समझाना चाह रहा था वो तो समझ नहीं रहा तू और इन पोंगा पंडितों की बातों में आ रहा है। तू भी न निरपट्ट लाटा है। "
"अरे लोग बोल रहे हैं की मज़ारों की चादर नहीं दिखाई अन्य धर्मो को नहीं दिखाया ठीक है मैं मानता हूँ, पर जो दिखाया उसमे गलत क्या है? सच्च में खुद को आईने में देखो तो बल। गलत तो कुछ भी नहीं था पर काम जरूर था।"
"अरे भैजी!!! ये तो वही बात है उसके कपडे मेरे कपडे से ज्यादा सफ़ेद कैसे???,मेरे को मारा तो उसको भी मारो न।
भाजपा और कांग्रेस वाली बात हो गयी। मेरा ही भ्रस्टाचार क्यों दिखाया उसका क्यों नहीं? "

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

आंदोलन

आंदोलन वो है जो सबसे पहले मन में चले,
और उस विचार को सबसे पहले,
मन को आंदोलित करना चाहिए। 
फिर उसे जज्बात से लबरेज़ हो कर,
भाषण और जागरण के रूप में,
एक पूर्ण रूप आंदोलन में ढलना चाहिए।
जो विचार केवल दिमाग में आये,
और दिल और मन में ढल पाए,
बाण वही सही जो सीधा दिल में उतर जाये,
अगर विचार बाण आपके ही मन को न भेद पाए,
तो उस बाण का धनुष पर संधान नहीं करना चाहिए। 
और अगर मन में कोई आंदोलन चल रहा है,
कोई अथक अनवरत जागरण चल रहा है,
कोई बाण है जो ह्रदय में चुभता जा रहा है,
तो उस बाण का तरकश में रहना अपमान है,
अपने हुनर के धनु पर उसका संधान करना चाहिए,
और भेद जाए सारे लक्ष्य एक ही बार में,
कुछ इस तरह से उसे लक्ष्य पर चला देना चाइये,
ऐसे विचारों को अटल अतुल आंदोलन में ढलना चाहिए।
क्योंकि,
आंदोलन वो है जो सबसे पहले मन में चले,
और उस विचार को सबसे पहले,
मन को आंदोलित करना चाहिए। 
फिर उसे जज्बात से लबरेज़ हो कर,
भाषण और जागरण के रूप में,
एक पूर्ण रूप आंदोलन में ढलना चाहिए। - अतुल सती 'अक्स'

उत्तराखंडी ही दोषी हैं और उन्हें माफ़ी माँगनी ही चाहिए ।


सही ही तो कहा है कि मुज्जफ़रनगर कांड में जो हुआ उसके लिए उत्तराखंडी ही दोषी हैं और उन्हें माफ़ी माँगनी ही चाहिए। इसमें क्या गलत कहा है?
अब क्यों उबल रहे हो अब ये बातें सुन कर। उत्तराखंडी मुख्यमंत्री को उत्तराखंडियों ने ही तो चुना है।   
मैं तो कहता हूँ कि उत्तराखंड की इस दुर्दशा के लिए सिर्फ और सिर्फ उत्तराखंडी ही दोषी है और कोई नहीं। और आज भी वक़्त है हर उत्तराखंडी को सच में माफ़ी मांगनी चाहिए, माफ़ी मांगनी चाहिए उत्तराखंड से(केदार खंड और मानस खंड से), उन लोगों से जिन्होंने खटीमा, मसूरी, श्रीनगर और मुजफ्फरनगर में गोली खाई, जिनके बलात्कार हुए, उन शहीदों से माफ़ी मांगो। मांगो माफ़ी अपने पापों के लिए जिन लोगों ने कहा कि मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा, उनको जिताया भी और मुख्यमंत्री भी बनाया। जिन्होंने उत्तराखंड लूटकर बाहर अपने महल बनाये उन्हें किसने चुना? क्यों चुना? 
वो लोग भी तो उत्तराखंडी ही हैं बल जिन्होंने खुद को क्रांति कारी बोलके खुद को सत्ता के लिए गिरवी रख दिया। वो क्रांतिकारी अपना दल तक एक नहीं रख पाए। और आजकल हुंकार भर रहे हैं उनको १६ साल लग गए नींद से जागने में बल।  उत्तराखंड बनके सुनिन्द स्वेगये थे वो।  
उत्तराखंडियों को इस बात के लिए भी माफ़ी माँगनी चाहिए जब उत्तराखंड बना और मैदानी इलाकों को इसमें जोड़ दिया गया और उत्तराखंडियोँ ने उसे क्यों स्वीकार कर लिया। आज का उत्तराखंड ये कैसा पहाड़ी राज्य है जहाँ विधान भवन में पहाड़ से ज्यादा गैर पहाडियों का प्रतिनिधित्व है। उत्तराखंडियों ने ही तो ये किया ये अनर्थ, मौन सहमति किसकी थी? क्या इसके लिए माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए?
    
उत्तराखंड से ढ़ाई लाख परिवार बल पलायन कर गए वो भी तो उत्तराखण्डी ही ठैरे।अब जिन्होंने पलायन किया बल वो भी उत्तराखंडी ठैरे और जिसकी वजह से पलायन हुआ वो भी उत्तराखंडी ठैरे। तो बल अब कौन माफ़ी मांगेगा और किस किस से?              

बल कोदा झंगोरा खाएँगे उत्तराखंड बनाएँगे। सोलह साल बाद कोदा झंगोरा उगाने लायक भी नहीं रहा उत्तराखंड। डैम डैम से डामिली ये पहाड़ो बरमंड। आज प्रधानमन्त्री बोलते हैं बल उत्तराखंड गढ्ढे में है उसे निकालो बल, पर इसे खाड़ उन्द केन डाली? कोई मेरे को भी बथाओ बल, इसके लिए उत्तराखंडी क्यों न मांगे बल माफ़ी? पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ी ही नहीं बन पायी अभी तक बल कौन जिम्मॆदार है इसके लिए? देबता भी दोष हो हो कर थक गए पर उनको न नचाने का और दोष लगाने के लिए क्यों नहीं माफ़ी मांगनी है बल?
हमने खुद ही तो बल धकिया धकिया कर इस उत्तराखंड को खंड खंड कर के खाड़ उंद डाला। पलायन पर रोने वालों, भेर देस वालों ते कैन अपरी जमीन बेचीं? किले बेची? जेन बेची वो भी तो उत्तराखंडी ही ठैरे बल। अपरी पितरों की कूड़ी, पुंगड़ी बेचने वालों माफ़ी मांगो!    
पर माफ़ी कैसे मांगे और किससे मांगे बल अब। कौन बताएगा की कौन जिम्मेदार है? कौन बचाएगा अब बल? अब तो बल मवासी घाम लगी ही जाएगी क्योंकि उत्तराखंड में दो किस्म की प्रजाति रहती हैं( कुमाउँनी गढ़वाली नहीं रे !, सवर्ण दलित नहीं रे ! जजमान बामण भी नहीं रे ! गंगाड़ी सारोला भी नई बल! छि भै रावत नेगी भी नि रे !) बल वो प्रजाति हैं गंगाधर और शक्तिमान।
सारे नेता, सारी पार्टियाँ, सारे वोटर, NRU(नॉन रेजिडेंट ऑफ़ उत्तराखंड) और उत्तराखंडी (बेचारे जो पलायन नहीं कर पाए) सब या तो गंगाधर हैं, या फिर शक्तिमान।
और ये एक ओपन सीक्रेट है बल गंगाधर ही शक्तिमान ठैरा। और ये बात अगर तुमको नहीं पता है तो माफ़ी मांगो!!! मांगो माफ़ी !!!              
                                               - अतुल सती 'अक्स'