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शुक्रवार, 5 जून 2015

एक अधूरी चाह !!!






















सोचता हूँ,अपना बचपन अपने बच्चे को दे दूँ, 
उसको भी कुछ गौरैया और कुछ तितली दे दूँ,
वो भी खूब दौड़े खुले मैदानों में मेरी ही तरह,
थके तो उसको नल से आता मीठा पानी दे दूँ। 
मेरी ही तरह उसे भी धूप न रोके खेलने से,
वो भी नहाये गंगा में,कोई न रोके तैरने से, 
हरियाली से भरी जगह भी होती है धरा पर,
वो जगह देखे,वो खुद,कोई रोके न, देखने से।
     वो भी दादी संग देखे,रात को चाँद और तारे, 
     उसको साफ़ आसमान,ठंडी बहती हवा दे दूँ।  
        (सोचता हूँ,अपना बचपन अपने बच्चे को दे दूँ, 
                 उसको भी कुछ गौरैया और कुछ तितली दे दूँ.…… )
उसे भी साफ़ सड़कें,साफ़ हवा,पानी साफ़ मिले,
घर के आँगन में उसके भी,रोज कोई गुल खिले,
वो भी सांस खुल के ले,पानी भी वो जी भर पिए,
बिना मास्क बिना फ़िल्टर की आबो हवा मिले। 
खुद के हाथों ही खत्म किया उसका बचपन,
        काश उसके बचपन को अपनी ही कहानी दे दूँ।    
     (सोचता हूँ,अपना बचपन अपने बच्चे को दे दूँ, 
               उसको भी कुछ गौरैया और कुछ तितली दे दूँ.……) 
                                         -अतुल सती 'अक्स'

सोमवार, 1 जून 2015

लघु कथा 9 : चॉकलेट सीक्रेट - अतुल सती 'अक्स'

     आपके, हमारे, हम सभी के, बचपन से कुछ न कुछ सीक्रेट होते ही हैं वैसे ही प्रिया जो कि एक आठ साल की प्यारी सी लड़की है उसके भी दो सीक्रेट हैं और दोनों ही सीक्रेट चॉकलेट हैं।  क्या आप जानना चाहते हो उसका सीक्रेट?  
१) चॉकलेट (उम्र सात साल) 
२) चॉकलेट (उम्र आठ साल)
पहली चॉकलेट बड़ी ही स्वादिस्ट है और प्रिया की फेवरेट। ये चॉकलेट उसे उसके दादा जी ला कर देते थे जो कि उसे बहुत पसंद थी।  प्रिया चॉकलेट के बिना रह ही नहीं सकती थी। वो जब भी गाँव से आते तो उसके लिए उसकी फेवरेट चॉकलेट लाते थे, उसके माँ पापा के सामने एक चॉकलेट देते और बाकी चॉकलेट छुपा देते थे एक सीक्रेट बॉक्स में।  जिसे वो दोनों रात को जब दादा उसे कहानियां सुनाते थे, सुलाते थे, तब चुपके चुपके खाते थे। दादा जी को शुगर था लेकिन वो अपनी पोती के साथ चॉकलेट शेयर करते थे। और ये उन दोनों का टॉप सीक्रेट था। हर दिन वो बॉक्स खाली हो जाता था और फिर हर दिन उसमे कुछ चॉकलेट दादा जी डालते थे और फिर वो दोनों खाली कर देते थे खा खा कर। दादा जी वापस गाँव चले जाते जब तो प्रिया अगले साल के इंतज़ार में दादा जी और चॉकलेट  के, अपने सीक्रेट के इंतज़ार में ही रहती थी।   

लेकिन दूसरी चॉकलेट का स्वाद बड़ा ही कसैला सा है, प्रिया को नफरत है बुरी तरह।  वो अब चॉकलेट नहीं खाती, हरगिज नहीं जबकि उसका सीक्रेट बॉक्स चॉकलेट से भरा पड़ा है। उसके मामा जो कि उसे बहुत प्यार करते हैं और रोज उसे एक सीक्रेट चॉकलेट देते हैं। मामा जी आजकल उन्ही के साथ रह रहे हैं और प्रिया को पढ़ाई में मदद करते हैं। वो बहुत ही ज्यादा कठोर शिक्षक हैं। वो जब भी उसे पढ़ाते हैं तो किसी का भी अंदर आना मना है। वो जब भी उसे पढ़ा कर रूम से बाहर निकलते तो प्रिया कराहती ही रहती। वो अपने मामा के सामने बस कांपती ही रहती।  कुछ भी नहीं कह पाती।  बस अपने कपड़े समेटती और अटैच्ड बाथरूम में नहाने चली जाती। उसने एक बार मामा जी के हाथ से अपनी पसंदीदा चॉकलेट खाई थी और तब से मामा जी और उसका एक गन्दा घिनौना सीक्रेट बना, जो हमेशा के लिए एक डार्क सीक्रेट रहा। मामा जी रोज उसे एक चॉकलेट देते और वो रोज उसे उस डिब्बे में फेंक देती और अपने टॉप को अपने हाथों से मरोड़ते हुए कसमसाते हुए बस रोती रहती।

ये भी एक सीक्रेट है उसका जो वो किसी को बता नहीं पाती है, खुद को भी नहीं।                        
                                                                                -अतुल सती 'अक्स'  

लघु कथा 8: रास्ते के भगवान -अतुल सती 'अक्स'


"अरे चलो न जल्दी यहाँ क्यों रुक गए? पहले ही बड़ी देर हो रही है और तुम हो की जगह जगह रुक रहे हो।"
संध्या आज बड़ी ही जल्दी में थी,आज शिवरात्रि जो थी। वो हर सोमवार को व्रत रखती थी और शिव को बहुत मानती थी।

" अरे ये भी तो मंदिर है ये बेर और दूध यहीं शिवलिंग पर चढ़ा देते हैं। फल,पैसा जो भी दान करना है वो इन बाबा को दे देंगे।" मैंने अपनी कार सड़क के किनारे बने एक छोटे से मंदिर के पास रोक दी थी।

वो मंदिर सड़क पर एक छोटा सा मंदिर था जिसकी देखरेख एक वयोवृद्ध बाबा करते थे।वो किसी से कोई बात नहीं करते थे बस चुपचाप मंदिर में ही रहते थे। लोग उन्हें पागल बाबा कहते थे।

" अरे दान करने को ये ही पागल बाबा ही मिले क्या तुम्हे? और ये..... ये भी कोई मंदिर है भला? रास्ते के भगवान ही मिले थे तुम्हे?" बड़े ही गुस्से में संध्या ने कहा।
"हम मल्लिकार्जुन जा रहे हैं..... क्या तुम्हे इतना भी ध्यान नहीं? १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है वो, मैं तो वहीँ दान पुण्य करुँगी और वहीँ दूध चढ़ाऊँगी अपने भोले बाबा को। मैं रास्ते के भगवान पर दूध नहीं चढ़ाऊँगी। अब चलो भी।"

संध्या की जिद के आगे मेरी एक न चली और हम मल्लिकार्जुन में ही पूजा अर्चना कर के घर लौटने लगे। रास्ते में संध्या अपनी सहेलिओं को बड़े ही नाज़ से बता रही थी कि वो आज मल्लिकार्जुन को दूध चढ़ा कर आयी है। उसकी तपस्या सफल हुई। और ठीक उसी वक़्त हमारी कार उसी 'रास्ते के भगवान' के मंदिर के पास से गुजर रही थी और मैं सोच रहा था "शायद भगवान भी बड़े घरों में रह कर बड़ा हो जाता है। रस्ते में बने छोटे मंदिर का भगवान छोटा ही है।
हम इंसानों ने भगवान को भी इंसान ही बना कर रख दिया है।"
               

-अतुल सती 'अक्स'

                       
                               

रविवार, 31 मई 2015

लघु कथा 7: 'तमाचा ' -अतुल सती 'अक्स'




 " अरे क्या है??? अंधे हो क्या? अनपढ गंवार कहीं के। कहाँ घुसे जा रहे हो भैया? यहाँ कहाँ जगह है?" एक सज्जन चिल्ला रहे थे मेट्रो में। हमेशा ही की तरह आज भी बहुत भीड़ थी। धक्का मुक्की कर के किसी तरह वो सज्जन "Seats reserved of Ladies" महिलाओं के आरक्षित सीट की ओर आकर खड़े हो गए। उम्र अधेड़ अवस्था में पहुँच चुकी थी। सर का चाँद चमक रहा था। ऐनक लगाये काफी ज्यादा पढे-लिखे व्यक्ति लग रहे थे। 

"अरे !!! ये तो राहुल जी हैं।" सुनीता बोली। 
"कौन राहुल जी?" मैंने भी उत्सुकतावश अपनी मित्र सुनीता से पूछ लिया।
"अरे वही राहुल जी!!! हमारे इलाके के काफी नामी गिरामी समाज सुधारक!!! अरे जो 'स्त्री दशा उत्थान' नाम की संस्था चलाते हैं। "
" मैं तो इनकी बहुत बड़ी फैन हूँ। इनका एक लेख पढा था - 'नारी और आज का समाज' उसमे इन्होने बताया था कि किस तरह से आज का समाज में नारी के साथ बदतमीजी होती है। परसों इनका इंटरव्यू भी देखा था जिसमे ये बता रहे थे की आजकल बस, मेट्रो और पब्लिक प्लेसेस में स्त्रिओं के साथ कितनी बदसलूकी होती है किस तरह से लोग बदतमीजी करते हैं। ऐसे लोगों को सबक सिखाना चहिये। बहुत इज्ज़त है इनकी इस शहर की स्त्रिओं में। बहुत मान सामान कमाया है राहुल जी ने!!!"
सुनीता ने ये सब एक ही सांस में कह दिया। पता चल रहा था की वो राहुल जी से बहुत प्रभावित थी। 

मैं भी मेट्रो में रोज ही सफ़र करता हूँ और ये सब देखता हूँ। खुशकिस्मती से आज मुझे सीट मिल गयी थी। अखबार को पड़ते पड़ते मेरा ध्यान बार बार ही राहुल जी की ओर जा रहा था। 
राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर काफी सारी भीड़ उतरी और चढ़ी,जिनमे काफी ज्यादा लड़कियां भी थी। वो सब की सब आरक्षित सीट के पास खड़ी हो गयीं। 
लेकिन मैंने गौर किया तो पाया की अभी कुछ देर पहले भीड़ पर चिल्ला रहे ये सज्जन, अब चुप चाप थे। जबकि इनके आसपास इतनी जगह थी कि ये कहीं और शिफ्ट हो जाते जिससे लड़किओं को दिक्कत नहीं होती, पर ये टस से मस नहीं हुए। मैंने सुनीता की और देखा और उसे बताया कि मैं क्या देख रहा हूँ के तभी एक जोरदार तमाचे की आवाज़ आई। 
"बदतमीज़!!! घर में माँ बहन नहीं हैं क्या? मेट्रो में लड़कियां ही छेड़ने के लिए चढ़ते हो क्या??" एक लड़की राहुल जी पर चिल्ला रहीं थी। राहुल जी का गाल लाल हो चुका था और वो अगले मेट्रो स्टेशन पर चुपचाप उतर गए। 
मैं और सुनीता एक दुसरे का मुहं ताकते रह गए। मन में बहुत सारे सवालों को गुंजायमान करता ये तमाचा अब तक सुनायी देता है जब भी मैं अखबार में, समाचार में तथाकथित पुरुषत्व की स्त्रीत्व के लिए पाशविक हरकतें सुनता हूँ। 

                                                                                   -अतुल सती 'अक्स'

शनिवार, 30 मई 2015

लघु कथा 6: बातें -अतुल सती 'अक्स'


 राहुल, शीतल के लिए उसके जन्मदिन पर फूलों का एक गुलदस्ता और एक तोहफा ले कर आया था और बाहर दरवाजे को खुला देख चुपचाप उसके कमरे की और बढ  रहा था, कि अचानक उसको शीतल की आवाज़ सुनायी दी
वो अपनी पक्की सहेली गुंजन से फोन पर बातें कर रही थी।    

"मैं राहुल से शादी नहीं कर सकती गुंजन !!!"

शीतल और गुंजन की ये बातें सुन कर राहुल के पाँव तले ज़मीन खिसक गयी, उसकी कुछ समझ मैं नहीं आ रहा था कि शीतल ये सब क्यूँ कह रही थी। उसने चुपचाप उनकी बातें सुनने का फैसला लिया।
राहुल के दिल की धड़कन बढती ही जा रही थी।  माथे पर बहुत खींचाव सा महसूस हो रहा था।  एक अनजानी सी  भावना जिसमे क्रोध, शंका और भय सम्मिलित था।
बहुत ध्यान से वो उनकी बातें सुन रहा था की आखिर पिछले पांच सालों से उसको प्रेम करने वाली लड़की अचानक ऐसा क्यूँ कह रही है? जबकि वो खुद अपनी और उसकी शादी की बात, दोनों की मर्ज़ी से अपने घर में कर आया है। और आज तक कभी शीतल ने शादी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, तो फिर आज ऐसा क्यूँ कह रही है? उसके दिमाग में बवंडर सा चल रहा था की तभी उसने शीतल की आवाज़ सुनी।

" मेरी माँ ने मेरे लिए २० तौला सोना लिया है, १५ रेशमी साड़ी हैं, और एक कार का भी इंतज़ाम किया है मेरे पापा ने !!!. कुल मिला कर लगभग ६० लाख रूपये तक का दहेज़ मिलेगा मुझे!!!"
बहुत ख़ुशी सी झलक रही थी उसकी आवाज़ में.….
"लेकिन अगर मैं राहुल से शादी करुँगी तो ये सब तो गया यार हाथ से। वैसे भी  मैं अपने खानदान में इकलौती हूँ आजतक बड़े नाज़-ओ-प्यार से पाला है मुझे।  मैं उनकी इच्छा के खिलाफ नहीं जा सकती।"
"राहुल के पास है ही क्या??? न तो उसके पास कोई कार है न ही फ्लैट ??? न ही इतनी सैलरी की मेरे नाज़ नखरे उठा सके।  उससे शादी कर के मैं क्या पाउंगी??? उल्टा ये सब जो मुझे मिलना है ये सब भी गवाउंगी। गुंजन सिर्फ प्यार से ही घर नहीं चलता है, पैसा भी  चाहिए होता है, पैसा!!!"

"और जहाँ तक बात है राहुल की तो यार!!! I actually Love Him but cannot Marry Him......!!!"
ये बातें सुन कर राहुल फूलों का वो गुलदस्ता और वो तोहफा वहीँ दरवाजे पर रख कर, बिना बताये वहां से चला गया.… अपनी प्यार की नाकामी देख कर वो बहुत निराश था और उसने वो शहर ही छोड़ दिया और चला गया …… जाने कहाँ ??? किसी को नहीं पता ….
                                                                                                             
-अतुल सती 'अक्स'

शुक्रवार, 29 मई 2015

लघु कथा 5: उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम। --अतुल सती 'अक्स'

सन १९९० में एक दिन : मैं अपने घर को साग सब्जी ले कर आ रहा था कि अपने ही मोहल्ले के दो लड़कों को सिगरेट पीते देखा। राहुल खुद कुणाल को माँ बहन कि गाली दे कर कह रहा था, "अबे *&%^%^$^$$%^$, ये ले एक कश मार और ज़िन्दगी का मजा ले।"कुणाल डरते डरते कश मार रहा था। और छल्ले उड़ा रहा था। मुझे उसकी गाली देना अजीब नहीं लगा क्यूंकि अब तक तो मैंने मान लिया था कि ये तो समाज का हिस्सा है, दोस्ती में गाली चलती है। हर कोई देता है। लेकिन मन में मैंने बस इतना सोचा ' उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम।' और फिर मैं वहाँ से आगे बढ़ गया। आज पालक पनीर जो बनना था। बहुत भूख लगी थी।

सन २००० में एक दिन: 
मेरे ही पड़ोस कि छत पर खूब हल्ला गुल्ला हो रहा था।
राहुल और कुणाल और उनकी गर्ल फ्रेंड्स सिगरेट के धुएं में शराब के नशे में धुत्त थे। गालियां तो जैसे हेल्पिंग वर्ब बन गयी थीं। वो लोग विदेश से आए थे और लिव इन में थे। मैंने बड़े अचरज से उन्हें देखा, उस वक़्त उनका गाली देना, सिगरेट,शराब पीना तो अजीब नहीं लगा लेकिन लिव इन में रहना अजीब लगा।
और मैंने बस इतना सोचा ' उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम।" और दरवाजा बंद कर के सो गया। बहुत थका हुआ था न.

सन २०१० में एक दिन: 
अखबार, चोरी, लूट, हत्या, घाटालों, रेप कि घटनाओं से पटा पड़ा था, मैंने पढ़ा, देखा और कोई अचंभा नहीं हुआ। तब तक मैं इसे इतना सुन चुका था और समाज का हिस्सा मान चुका था। बस इतना कहा ' उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम।' और टीवी पर पिक्चर देखने लगा, मदर इंडिया आ रही थी बड़े दिनों बाद।

सन २०१३ में एक दिन: 
मन बहुत खराब था निर्भया कांड के बाद। आंदोलन को देखा टीवी पर,बहुत कुछ कहा लिखा। हालांकि अब तक बलात्कार की घटनाओं को बहुत ही कॉमन मान चुका था। पर वो कांड बहुत ही नया था और वीभत्स था। गैंग रेप और इतना बुरा। बहुत मन व्यथित था। बस एक ही बात सोचता था "उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम।"

सन २०१४ में एक दिन: 
अखबार में सोशल मीडिया में आये दिन एक के बाद एक कई निर्भया काण्ड सुनने को देखने को मिलते हैं। अपने ही मोहल्ले कि एक लड़की कि व्यथा जब अखबार में पड़ी तो मन बड़ा व्यथित हुआ। लेकिन अचम्भा नहीं हुआ। आदत पड़ गयी थी ना। मैंने बस इतना कहा ' उफ़!!! ये समाज को क्या हो गया है? कहाँ जा रहा है ये ? राम राम।" और चाय की चुस्की लेने लगा। आज चाय बहुत ही बढ़िया बनी थी इलायची वाली। 

                                                                                -अतुल सती 'अक्स'

गुरुवार, 28 मई 2015

लघु कथा 4 : क्रॉस्ड अँगुलियाँ: -अतुल सती 'अक्स'


"वाइफ स्वैपिंग ???" कह क्या रहे हो तुम ? तुम्हारा दिमाग ठिकाने पर तो है न? एक पल के लिए तुमने सोचा भी है कि तुम क्या कह रहे हो और उसके परिणाम क्या हैं?
अनुराधा लगभग चीख ही रही थी राहुल पर।
"डोंट बि सो डाउन मिडिल क्लास अनु, इसमें हर्ज़ ही क्या है? मेरे सारे दोस्त जो कि मेरे बिज़नेस पार्टनर्स हैं कुछ तो मेरे क्लाइंट भी हैं, सभी ये करते हैं। और आज कल तो ये सब हायर मिडिल क्लास में चलता ही है।"
"तुम तो जानती ही हो इन सब लोगों के बिना हमारा सरवाइव करना मुश्किल हो जायेगा। अमन  इस बार पार्टी को होस्ट कर रहे हैं, और मुझे स्पेशली बोला है इसमें पार्टिसिपेट करने को। पूरे ६० करोड़ की डील होनी है, क्या पता हमें ही वो डील मिल जाये। और वैसे भी ये सब तो मैं बोल रहा हूँ तुम्हे करने को, कौनसा तुम मुझे कोई धोखा दे रही हो या मैं तुम्हे? सब कुछ हमारी जानकारी में ही तो होगा। बाकी सब भी तो ये ही करते हैं। राकेश, अमन , अनिरुद्ध ये सब कैसे इतने आगे बढे?कभी सोचा है?"
राहुल एक ही सांस में अनुराधा को मानाने की,समझाने की कोशिश कर गया।              
राहुल और अनुराधा दोनों लगभग पांच साल से दाम्पत्य जीवन में थे। शादी की, जवानी की सारी खुमारी घर, गाड़ी, लोन में काफूर हो गयी थी।  दोनों का एक ही बिज़नेस था और वो भी कुछ ढीला ढाला ही चल रहा था। अनु जानती थी की अगर ये डील मिलती है तो हालात सुधर जायेंगे।  लेकिन किसी गैर मर्द के साथ सोना??? उसका मन गवारा नहीं कर रहा था?
राहुल के रोज के इमोशनल अत्याचार से परेशान हो कर या फिर उस डील की खातिर अनु मान गयी।  और इस संडे वो तय समय पर तय पांच सितारा होटल में पहुँच गए। वहां ये चारों युगल मिले। साथ साथ खाया-पिया, जाम पर जाम के दौर चले। महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर मदिरापान किया।  डिस्को थेक में नाचे कूदे। और अब वो घड़ी आ ही गयी जिस घडी के लिए अनु घबरा रही थी।
...........
अगले दिन राहुल और अनु साथ साथ घर तो आये लेकिन नज़रें नहीं मिला पाये, न ही कोई बात ही हुई। चुप चाप रहे।  उस घर का सन्नाटा चीख चीख कर रिश्तों की हत्या की गवाही दे रहा था। तभी उस सन्नाटे तो तोड़ती हुई मोबाइल की घंटी बजी। राहुल ने पिक किया और उसकी आँखों में चमक आ गयी। राहुल और अनु को वो डील मिल गयी थी। राहुल ने जैसे ही ये बात अनु को बताई दोनों ख़ुशी के मारे नाचने लगे और गले लग कर ख़ुशी का इज़हार करने लगे।
अंततः किसी तरह से बात चीत शुरू हुई तो अनु बोली
"अमन जी बड़े भले आदमी हैं। और तुम्हे पता है वो  कवि भी हैं।  कल रात तो उन्होंने मुझे इतनी कवितायेँ सुनायी कि पूछो मत। और तुम तो जानते ही हो मुझे कवितायेँ कितनी पसंद हैं। उनकी कविता सुनते उल्टे कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला।"
"अरे यार मैं तो बहुत ही बुरा फँसा, मिसेज अमन को तो तुम जानती ही हो ज्ञान, धरम, ज्योतिष में ऐसी डूबी रहती हैं कि कोई होश ही नहीं रहता। पूरी रात मुझे अपनी भविष्वाणी की कहानी सुनाती रही। कभी मेरा भविष्य बताती तो कभी देश का।  उस औरत ने तो पागल ही कर दिया। बाई गॉड!!!"
राहुल जब ये सब बोल रहा था तो उसने अपनी अंगुलियां क्रॉस कर रखी थी। राहुल और अनु, दोनों ही जब भी झूठ बोलते हैं तो अपनी अँगुली क्रॉस करके ही बोलते हैं।
राहुल अपने कमरे की और जाने लगा तो पीछे से अनु बोली " राहुल मैं अभी भी वैसी ही हूँ जैसी पार्टी से पहले थी।  मुझे अमन ने हाथ भी नहीं लगाया। उस रात कुछ भी नहीं हुआ, कसम से ।"
राहुल बस अनु को निहारे जा रहा था और मुस्कुरा रहा था, के तभी उसकी नज़र अनु के पीछे दीवार पर लगे आईने पर गयी। अनु की अँगुलियाँ भी क्रॉस थीं।
                             -अतुल सती 'अक्स'

ज़िन्दगी ऐसी क्यों है तू?


बहुत कम ज़िन्दगी मिली है जीने को,

और काम बहुत हैं करने को, 
क्यों ज़िन्दगी ऐसी क्यों है तू?
जिम्मेदारी का बोझ,
और अपने अस्तित्व की खोज,
नाते दारी, रिश्तेदारी उफ्फ,
दिखावे के लिए केवल प्यार,
मतलब के लिए यार,
इतनी निर्जीव जैसे कोई बुत, 
क्यों ज़िन्दगी ऐसी क्यों है तू?
मैं रंग नया भरना चाहता हूँ,
गीत नया गाना चाहता हूँ,
रिश्ता खुद से सच्चा,
बनाना चाहता हूँ,
दोगले समाज की बेड़िओं को,
गलाना चाहता हूँ,
पर फिर तू मुझे रोक लेती है,
दुहाई दे कर किसी न किसी की, 
क्यों ज़िन्दगी ऐसी क्यों है तू?
मैं तुझे अपने तरीके से,
अपना बना कर सजाना चाहता हूँ,
दूसरों की नकली ज़िन्दगी देख कर नहीं,
अपने से, अपने प्यार से,
तेरा श्रृंगार करना चाहता हूँ,
किसी किनारे नदी के बैठ कर,
कभी घंटो बतियाना तो,
कभी बस लम्बी ख़ामोशी चाहता हूँ,
बस तू और मैं,
कहीं बैठ के कुछ कहें,
कुछ सुनें एकदूजे की,
थोड़ा सुकून से रहे,
कभी तो कहीं तो मिल मुस्कुराके मुझे,
बैठे मेरे साथ, पर तू तो भागती ही जाती है,
क्यों ज़िन्दगी ऐसी क्यों है तू?

लघु कथा 3 : हैप्पी मदर्स डे !!! ----अतुल सती 'अक्स'


"चलो कम से कम साल में एक बार तो अपनी माँ को याद किया और 'आई लव यू मॉम !!!' कहती हुई स्टेटस से अपने FB को अपडेट किया। बहुत होता है जी साल में एक बार अपनी माँ को याद करना।
अब शर्मा जी को ही देखो कितना अच्छा स्टेटस अपडेट किया है फेसबुक पर, के 'भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसीलिए तो माँ बनाई'।
आज मदर्स डे पर चीफ गेस्ट थे हमारी सोसाइटी में। बहुत ही अच्छा कहा उन्होंने माँ के बारे में, लोगों के तो आंसू आगये थे।" 
"कौन शर्मा जी?" मैंने बड़ी ही असमंजसता भरी नज़रों से पुछा। 
" अरे वही शर्मा जी यार!!! जिनके घर का नाम "मातृ कृपा" है"" कौन राम कुमार शर्मा जी?" मैंने पूछा। 
"अरे यार!!! श्रवण कुमार शर्मा जी, अरे जिनका केस चल रहा है अपनी माँ से कुछ जायदाद पर। भूल गए क्या?""अच्छा वो जिन्होंने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में रखा हुआ है। एक दिन पागल कह कर निकाल दिया था अपने घर से।"मुझे याद आ गया था।" हाँ वही ठीक पहचाना। तुम्हारी याददाश्त तो कमाल की है। बस इन शर्मा जी की ही कुछ खराब लगती है मुझे। क्या कहते हो? वैसे हैप्पी मदर्स डे !!! "


                                                                                  -अतुल सती 'अक्स'